जिंदगी के सफर में
सारे इम्तहान हमारे हीं हिस्से क्यों?
नतीज़े आये ना आये ,
अगला पर्चा शुरु हो जाता है
जिंदगी के सफर में
सारे इम्तहान हमारे हीं हिस्से क्यों?
नतीज़े आये ना आये ,
अगला पर्चा शुरु हो जाता है
हम गलते-पीघलते नहीं ,
इसलिये
पत्थर या पाषण कहते हो,
पर खास बात हैं कि
हम पल-पल बदलते नहीं।
अौर तो अौर, हम से
लगी ठोकरें क्या
तुम्हें कम सबक सिखाती हैं??
आईना भी इस नासमझी पर
खुद से माफी नहीं मागँने देता।
कि खुद को दर्द क्यों पहुँचाना?
जमाना बैठा है इस काम के लिये।
कहते हैं जैसा साथ, वैसी बात
संगत का असर पङता है,
पर
ना फूल को आया चुभना
ना काटों को आया महकना।
मिट्टी में दबे बीज को हीं
मालूम होता है,
शाखों पर खिले फूलों की
क्या कीमत चुकाई है उसने……….
सुनाने वालों की बातें
सुन कर
मौन को बोलने दो।
क्योंकि सही जवाब तो
समय देता है।
जंग अक्सर अपनों अौर करीबियों से लङी जाती हैं
महाभारत की कहानी में सुना था,
यही सच भी है……….
अब जिंदगी के चक्रव्यूह से जाना भी है ।
सफर-ए- जिंदगी ,
कितनी भी
खूबसूरत क्यों ना हो…
अपनी कीमत
कभी ना कभी
वसूल हीं लेती है………
सबसे गहरा दर्द तब महसूस होता है,
अपने आप को नकार कर
हर किसी को खुश रखने
की चाहत में हार जाअो।
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