My Magarpatta Cyber City , Pune, Maharashtra, India

Posted by Chandni Sahay

Magarpatta is a beautiful, eco-friendly, green cyber city . It has schools,  Temple,  commercial zone, residential neighbourhoods, a multi specialty hospital, Season shopping mall, multiple restaurants, a gymkhana and a large park called Aditi Garden.

Misty Mist Fountain Welcomes the visitors.

 

Clean and wide roads , trimmed grasses n hedges !!!!!

Another beautiful water fountain……..

Calm and quiet Mahalaxmi Temple.

 

Gymkhana – Gym, Beauty parlour, club  swimming pool and steam bath , all in one place.

 

Season shopping mall

 

     Greenery of Aditi Garden.

 

 famous and   beautiful Amanora Shopping mall just opposite  side of  Season’s mall

मगरपट्टा सिटी 

 

किसी  सिटी का नाम लिया जाता है, तो सामान्यतः हमारे मन में सड़कों, इमारतों और बाजारों की छवि उभरती है। किंतु कुछ स्थान केवल भौगोलिक इकाइयाँ नहीं होते, वे एक विचार होते हैं, एक दृष्टि होते हैं, और भविष्य के लिए रचा गया ऐसा प्रयोग होते हैं जो समय के साथ एक मिसाल बन जाते हैं। पुणे की धरती पर स्थित मगरपट्टा सिटी ऐसा ही एक नाम है।

 

भारत में शहरीकरण की कहानी जितनी तेज़ी से आगे बढ़ी है, उतनी ही तेज़ी से उसने अनेक चुनौतियाँ भी खड़ी की हैं—अनियोजित विस्तार, हरित क्षेत्रों का क्षय, यातायात की समस्या, प्रदूषण और सामाजिक असमानताएँ। ऐसे समय में यदि कोई नगर यह सिद्ध करे कि विकास और पर्यावरण, आधुनिकता और मानवीय संवेदनाएँ, आर्थिक प्रगति और सामुदायिक जीवन एक साथ चल सकते हैं, तो वह केवल एक आवासीय परियोजना नहीं रह जाता; वह एक आदर्श बन जाता है।

 

मगरपट्टा सिटी की कहानी –

यह केवल ऊँची इमारतों, आईटी कंपनियों और चौड़ी सड़कों का समूह नहीं है। यह उन किसानों की दूरदर्शिता का परिणाम है जिन्होंने अपनी भूमि बेचने के बजाय उसे मिलकर विकसित करने का साहसिक निर्णय लिया। यह कहानी है उस सोच की जिसने खेतों को कंक्रीट के जंगल में बदलने के बजाय एक सुव्यवस्थित, आत्मनिर्भर और हरित नगर का रूप दिया।

 

खेतों से नगर तक की यात्रा-

 

आज जहाँ आधुनिक भवन, कॉर्पोरेट कार्यालय और सुसज्जित उद्यान दिखाई देते हैं, कभी वहाँ विस्तृत कृषि भूमि थी। समय बदल रहा था। पुणे तेजी से विकसित हो रहा था। भूमि के मूल्य बढ़ रहे थे। ऐसे में अधिकांश स्थानों पर किसानों की भूमि धीरे-धीरे बिल्डरों के हाथों चली जाती है और मूल निवासी विकास की कहानी से बाहर हो जाते हैं।

 

एक अलग निर्णय –

स्थानीय कृषक परिवारों ने अपनी भूमि बेचने के बजाय साझेदारी का मार्ग चुना। उन्होंने विकास में भागीदार बनने का निश्चय किया। यह निर्णय केवल आर्थिक नहीं था; यह आत्मसम्मान और स्वामित्व का निर्णय था। परिणामस्वरूप एक ऐसी परियोजना का जन्म हुआ जिसमें भूमि के मूल स्वामी स्वयं विकास यात्रा का हिस्सा बने।

भारत में भूमि अधिग्रहण और शहरी विस्तार की अनेक कहानियाँ हैं, परंतु मगरपट्टा सिटी उन दुर्लभ उदाहरणों में से है जहाँ ग्रामीण समुदाय ने परिवर्तन का नेतृत्व किया।

 

एक विचार -‘सस्टेनेबल सिटी’

 

आज विश्व भर में “सस्टेनेबल डेवलपमेंट” अर्थात् सतत विकास की चर्चा होती है। मगरपट्टा सिटी ने इस विचार को व्यवहार में उतारने का प्रयास किया। यहाँ विकास का अर्थ केवल अधिक निर्माण नहीं था, बल्कि बेहतर जीवन था।

 

हरित क्षेत्र,

खुले मैदान,

वृक्षों से आच्छादित मार्ग,

पैदल चलने के अनुकूल वातावरण,

कार्यस्थल और निवास का संतुलन,

 

योजना 

जब कोई व्यक्ति सुबह की सैर के लिए निकलता है और उसे पक्षियों का कलरव सुनाई देता है, जब बच्चे सुरक्षित वातावरण में खेलते हैं, जब कार्यालय और घर के बीच घंटों की यात्रा नहीं करनी पड़ती, तब समझ में आता है कि नगर नियोजन केवल इंजीनियरिंग का विषय नहीं, बल्कि जीवन की गुणवत्ता का प्रश्न भी है।

 

आधुनिक भारत का बदलता चेहरा

 

भारत के शहरों में अक्सर दो चरम दिखाई देते हैं—एक ओर अत्याधुनिक व्यावसायिक क्षेत्र और दूसरी ओर अव्यवस्थित शहरी विस्तार। मगरपट्टा सिटी ने इन दोनों के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास किया। यहाँ आवासीय, व्यावसायिक और मनोरंजन संबंधी सुविधाओं को एकीकृत रूप में विकसित किया गया। इस दृष्टिकोण ने यह संदेश दिया कि किसी शहर को केवल रहने की जगह नहीं, बल्कि जीवन जीने की जगह बनाना आवश्यक है।

यही कारण है कि यह परियोजना नगर नियोजन, रियल एस्टेट और सामुदायिक विकास के अध्ययन में एक महत्वपूर्ण उदाहरण के रूप में देखी जाती है।

 

तकनीक और प्रकृति का संगम

 

आधुनिकता का अर्थ प्रकृति से दूरी नहीं होना चाहिए। मगरपट्टा सिटी का सबसे उल्लेखनीय पक्ष यही है कि यहाँ तकनीकी प्रगति और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाने का प्रयास किया गया। आईटी पार्क और हरित क्षेत्र साथ-साथ विकसित किए गए। कार्यालयों की व्यस्तता के बीच उद्यानों की शांति, व्यापारिक गतिविधियों के बीच प्राकृतिक सौंदर्य, आधुनिक जीवनशैली के साथ सामुदायिक जुड़ाव, ये सभी तत्व इस नगर की पहचान बन गए।

 

सामुदायिक जीवन 

किसी भी नगर की सफलता केवल उसकी इमारतों से नहीं मापी जाती। उसकी वास्तविक शक्ति वहाँ रहने वाले लोगों के सामाजिक संबंधों में निहित होती है।मगरपट्टा सिटी में सामुदायिक जीवन को विशेष महत्व दिया गया। सांस्कृतिक कार्यक्रम, उत्सव, खेल गतिविधियाँ और सामुदायिक सहभागिता के विभिन्न अवसर यहाँ के जीवन को जीवंत बनाते हैं। यहाँ रहने वाला व्यक्ति केवल एक फ्लैट का मालिक नहीं होता; वह एक समुदाय का सदस्य भी होता है।

 

आर्थिक विकास का केंद्र

 

पुणे लंबे समय से शिक्षा, उद्योग और संस्कृति का प्रमुख केंद्र रहा है। मगरपट्टा सिटी ने इस पहचान को नई दिशा दी। यह क्षेत्र सूचना प्रौद्योगिकी और कॉर्पोरेट गतिविधियों का महत्वपूर्ण केंद्र बन गया। देश और विदेश की अनेक कंपनियों की उपस्थिति ने इसे रोजगार और नवाचार का महत्वपूर्ण स्थल बना दिया। परिणामस्वरूप यहाँ न केवल आर्थिक गतिविधियाँ बढ़ीं, बल्कि आसपास के क्षेत्रों का भी तीव्र विकास हुआ।

 

एक पाठशाला

 

यदि कोई विद्यार्थी नगर नियोजन, समाजशास्त्र, अर्थशास्त्र या पर्यावरण अध्ययन का शोध कर रहा हो, तो मगरपट्टा सिटी उसके लिए एक जीवंत प्रयोगशाला की तरह है। यहाँ अनेक प्रश्नों के उत्तर मिलते हैं—

क्या विकास पर्यावरण के साथ संभव है?

क्या किसान विकास के भागीदार बन सकते हैं?

क्या आधुनिक नगरों में सामुदायिक भावना बची रह सकती है?

क्या आत्मनिर्भर और सुव्यवस्थित नगर बनाए जा सकते हैं?

मगरपट्टा सिटी इन प्रश्नों के प्रति आशावादी उत्तर प्रस्तुत करती है।

 

भविष्य की ओर संकेत

 

भारत तेजी से शहरी समाज की ओर बढ़ रहा है। आने वाले दशकों में करोड़ों लोग शहरों में बसेंगे। ऐसे में केवल नए भवन बना देना पर्याप्त नहीं होगा। आवश्यकता ऐसे नगरों की होगी जो मानव, प्रकृति और प्रौद्योगिकी के बीच संतुलन स्थापित कर सकें। मगरपट्टा सिटी इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण संकेत है।यह हमें बताती है कि विकास केवल आर्थिक आँकड़ों का विषय नहीं है। विकास वह है जो मनुष्य के जीवन को अधिक सुगम, अधिक सम्मानजनक और अधिक संतुलित बनाए।

 

किसानों की दूरदर्शिता से प्रारंभ हुई यह यात्रा आज एक आधुनिक नगर के रूप में खड़ी है, किंतु इसकी सबसे बड़ी उपलब्धि इसकी इमारतें नहीं, बल्कि वह विचार है जिसने इसे जन्म दिया।और शायद यही किसी भी महान नगर की सबसे बड़ी पहचान होती है—वह केवल स्थान नहीं रहता, एक प्रेरणा बन जाता है।

भारत का चर्चित नगर 

मगरपट्टा सिटी केवल एक आवासीय परिसर नहीं, बल्कि एक सुविचारित शहरी पारिस्थितिकी तंत्र (Urban Ecosystem) है। यहाँ निवास, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, मनोरंजन और पर्यावरण को एक-दूसरे से जोड़ा गया है। यही कारण है कि यह क्षेत्र पुणे के आधुनिक विकास का एक महत्वपूर्ण प्रतीक माना जाता है।

 

  1. किसानों द्वारा निर्मित : एक अनूठा मॉडल

 

मगरपट्टा की सबसे बड़ी विशेषता इसका स्वामित्व मॉडल है। भारत में सामान्यतः भूमि किसान से लेकर डेवलपर परियोजनाएँ विकसित करते हैं, परंतु यहाँ लगभग 120 से अधिक कृषक परिवारों ने अपनी भूमि का सामूहिक विकास किया। वे केवल भूमि विक्रेता नहीं बने, बल्कि विकास प्रक्रिया के सहभागी और लाभार्थी बने। इस मॉडल ने ग्रामीण समाज को यह संदेश दिया कि विकास का अर्थ विस्थापन नहीं, बल्कि सहभागिता भी हो सकता है।

 

  1. भौगोलिक स्थिति और रणनीतिक महत्व

 

मगरपट्टा सिटी पुणे के पूर्वी भाग में स्थित है। इसकी स्थिति इसे विशेष महत्व प्रदान करती है।

यह क्षेत्र हड़पसर के निकट है।पुणे रेलवे स्टेशन से सुगम दूरी पर है।पुणे हवाई अड्डे से जुड़ा हुआ है। कोरेगांव पार्क, कल्याणी नगर और कैंप जैसे प्रमुख क्षेत्रों के समीप है। आईटी और कॉर्पोरेट गतिविधियों का महत्वपूर्ण केंद्र है।स्थान की यह विशेषता इसे आवास और व्यवसाय दोनों के लिए आकर्षक बनाती है।

 

  1. साइबरसिटी : आईटी उद्योग का केंद्र

 

मगरपट्टा का साइबरसिटी क्षेत्र इसकी आर्थिक धड़कन है।यहाँ अनेक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय कंपनियों ने अपने कार्यालय स्थापित किए हैं। हजारों पेशेवर प्रतिदिन यहाँ कार्य करते हैं।नसाइबरसिटी की योजना इस प्रकार बनाई गई कि कार्यस्थल और निवासीय क्षेत्र के बीच संतुलन बना रहे। इससे लंबी यात्राओं की आवश्यकता कम होती है और जीवन की गुणवत्ता बेहतर होती है।यह मॉडल आधुनिक “Walk-to-Work” अवधारणा का एक सफल उदाहरण माना जाता है।

 

  1. आवासीय परिसर और जीवनशैली

 

मगरपट्टा में विभिन्न प्रकार के आवासीय परिसर विकसित किए गए हैं।यहाँ अपार्टमेंट, गेटेड कम्युनिटी, परिवार-केंद्रित आवास, वरिष्ठ नागरिकों के अनुकूल वातावरण उपलब्ध हैं।सुरक्षा, स्वच्छता और सुव्यवस्थित रखरखाव यहाँ के जीवन को सहज बनाते हैं।

 

  1. उद्यान और हरित क्षेत्र

 

यदि मगरपट्टा को “कंक्रीट के बीच हरियाली का द्वीप” कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। यहाँ अनेक उद्यान, हरित पट्टियाँ और खुले क्षेत्र विकसित किए गए हैं। सुबह के समय यहाँ पक्षियों का मधुर स्वर, वृक्षों की छाया और स्वच्छ वातावरण शहरी जीवन के तनाव को कम करने में सहायक बनते हैं। हरित क्षेत्र केवल सौंदर्य के लिए नहीं, बल्कि वायु गुणवत्ता सुधारने, तापमान नियंत्रित रखने और जैव विविधता को बनाए रखने के लिए भी महत्वपूर्ण हैं।

 

  1. मगरपट्टा के वृक्ष और उनका आयुर्वेदिक महत्व

 

किसी नगर की वास्तविक समृद्धि उसकी इमारतों से नहीं, उसके वृक्षों से भी आँकी जाती है। मगरपट्टा क्षेत्र में विभिन्न प्रकार के वृक्ष देखने को मिलते हैं। इनमें से कई आयुर्वेदिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।

 

नीम

आयुर्वेद में नीम को “सर्वरोगनिवारिणी” कहा गया है।

लाभ:

* रक्तशोधन

* त्वचा रोगों में उपयोगी

* जीवाणुरोधी गुण

* प्रतिरक्षा बढ़ाने में सहायक

 

पीपल

पीपल भारतीय संस्कृति और आयुर्वेद दोनों में महत्वपूर्ण है।

लाभ:

 

* श्वसन तंत्र के लिए उपयोगी

* वात-पित्त संतुलन में सहायक

* पर्यावरण में ऑक्सीजन संतुलन के लिए प्रसिद्ध

 

बरगद

बरगद दीर्घायु और स्थिरता का प्रतीक माना जाता है।

लाभ:

* मधुमेह संबंधी पारंपरिक उपचारों में उपयोग

* दंत स्वास्थ्य में सहायक

* आयुर्वेदिक औषधियों में उपयोग

 

अशोक

अशोक वृक्ष विशेष रूप से महिलाओं के स्वास्थ्य से जुड़ा माना जाता है।

लाभ:

* स्त्री रोग संबंधी आयुर्वेदिक उपचारों में उपयोग

* शीतल प्रभाव

* मानसिक शांति प्रदान करने वाला वातावरण

 

कदंब

कृष्ण परंपरा से जुड़ा कदंब वृक्ष सौंदर्य और पर्यावरण दोनों दृष्टियों से महत्वपूर्ण है।

लाभ:

* छाल और पत्तियों का आयुर्वेदिक उपयोग

* वर्षा ऋतु में जैव विविधता को प्रोत्साहन

 

गुलमोहर

इसका मुख्य महत्व सजावटी है, परंतु इसकी हरियाली और छाया शहरी तापमान कम करने में सहायक होती है।

 

अमलतास

स्वर्णिम पुष्पों वाला यह वृक्ष आयुर्वेद में महत्वपूर्ण स्थान रखता है।

लाभ:

* पाचन संबंधी समस्याओं में उपयोग

* शीतल प्रकृति

* प्राकृतिक रेचक गुण

 

इन वृक्षों की उपस्थिति मगरपट्टा को केवल सुंदर नहीं बनाती, बल्कि पर्यावरणीय और स्वास्थ्य संबंधी दृष्टि से भी समृद्ध बनाती है।

 

  1. जल संरक्षण और पर्यावरणीय प्रबंधन

 

आधुनिक नगरों की सबसे बड़ी चुनौतियों में जल संकट शामिल है। मगरपट्टा में वर्षा जल संचयन, जल पुनर्चक्रण तथा जल प्रबंधन की अनेक व्यवस्थाएँ विकसित की गई हैं। यह दृष्टिकोण भविष्य के शहरों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

 

  1. ऊर्जा और सतत विकास

 

ऊर्जा दक्षता आधुनिक शहरी विकास का महत्वपूर्ण भाग है। यहाँ विभिन्न स्तरों पर ऊर्जा संरक्षण, हरित पहल और पर्यावरणीय उत्तरदायित्व को प्रोत्साहित किया गया है। सतत विकास का यही दृष्टिकोण इसे सामान्य आवासीय परियोजनाओं से अलग बनाता है।

 

  1. शिक्षा सुविधाएँ

 

एक सफल नगर केवल रोजगार से नहीं बनता; शिक्षा उसकी आत्मा होती है। मगरपट्टा और आसपास के क्षेत्र में अनेक विद्यालय, प्रशिक्षण संस्थान और उच्च शिक्षा केंद्र उपलब्ध हैं। इससे परिवारों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के अवसर प्राप्त होते हैं।

 

  1. स्वास्थ्य सुविधाएँ

 

यहाँ व निकटवर्ती क्षेत्र में अनेक बहु-विशेषता अस्पताल और स्वास्थ्य केंद्र उपलब्ध हैं। आपातकालीन चिकित्सा, नियमित स्वास्थ्य सेवाएँ और विशेषज्ञ उपचार सुविधाएँ इस क्षेत्र को परिवारों के लिए उपयुक्त बनाती हैं।

 

  1. सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन

 

मगरपट्टा में विभिन्न सांस्कृतिक गतिविधियाँ आयोजित होती रहती हैं।

* गणेशोत्सव

* दीपावली उत्सव

* खेल प्रतियोगिताएँ

* सामुदायिक कार्यक्रम

* संगीत एवं सांस्कृतिक आयोजन

इन गतिविधियों से सामाजिक जुड़ाव मजबूत होता है।

 

  1. बच्चों और वरिष्ठ नागरिकों के लिए अनुकूल वातावरण

 

किसी नगर की गुणवत्ता इस बात से भी मापी जाती है कि वह अपने सबसे छोटे और सबसे वरिष्ठ नागरिकों का कितना ध्यान रखता है। मगरपट्टा में उपलब्ध हैं  —

 

* खेल क्षेत्र

* उद्यान

* पैदल पथ

* बैठने के स्थान

* सुरक्षित वातावरण

 

  1. निवेश और रियल एस्टेट महत्व

 

पुणे के विकसित क्षेत्रों में मगरपट्टा का नाम प्रमुखता से लिया जाता है।यहाँ की संपत्तियों का मूल्य समय के साथ बढ़ा है। इसके पीछे प्रमुख कारण हैं—

 

* उत्कृष्ट स्थान

* सुव्यवस्थित नियोजन

* आईटी उद्योग की उपस्थिति

* जीवन की गुणवत्ता

 

  1. 1 मगरपट्टा : एक अध्ययन विषय

 

शहरी नियोजन, समाजशास्त्र, पर्यावरण अध्ययन और अर्थशास्त्र के विद्यार्थियों के लिए मगरपट्टा 

जब किसी शहर का एक महत्वपूर्ण केस स्टडी है। यह दर्शाता है कि—

 

* सामुदायिक भागीदारी कैसे काम करती है।

* पर्यावरण और विकास में संतुलन कैसे संभव है।

* किसान विकास के भागीदार कैसे बन सकते हैं।

 

  1. चुनौतियाँ

हर सफल परियोजना की तरह मगरपट्टा के सामने भी चुनौतियाँ हैं।

 

* बढ़ता शहरी दबाव

* यातायात का विस्तार

* जनसंख्या वृद्धि

* पर्यावरण संतुलन बनाए रखना

 

  1. भविष्य की दिशा

 

आने वाले वर्षों में स्मार्ट सिटी, हरित तकनीक और सतत विकास की अवधारणाएँ और महत्वपूर्ण होंगी। मगरपट्टा पहले से ही इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जाता है। भविष्य में यह मॉडल अन्य भारतीय नगरों के लिए प्रेरणा बन सकता है।

 

साराशं 

मगरपट्टा सिटी केवल ईंट, पत्थर और कंक्रीट का नगर नहीं है। यह दूरदर्शिता, सामूहिक प्रयास और संतुलित विकास की जीवंत कहानी है। यह उन किसानों के साहस का स्मारक है जिन्होंने परिवर्तन से भयभीत होने के बजाय उसका नेतृत्व किया। यह उन योजनाकारों की कल्पना का परिणाम है जिन्होंने विकास को केवल आर्थिक लाभ तक सीमित नहीं रखा। और यह उन नागरिकों का नगर है जो आधुनिक सुविधाओं के बीच भी हरियाली, समुदाय और मानवीय मूल्यों को जीवित रखना चाहते हैं। शायद इसी कारण मगरपट्टा सिटी हमें यह विश्वास दिलाती है कि भविष्य के शहर केवल बड़े नहीं, बेहतर भी हो सकते हैं।

 

 

 

 

 

  

 

 




 

 

All images courtesy – Rekha Sahay.

कामख्या मंदिर – (यात्रा संस्मरण और पौराणिक कथायें )

क्लीं क्लीं कामाख्या क्लीं क्लीं नमः |

आसाम का गौहाटी शहर विख्यात कामख्या मंदिर के लिए जाना जाता है। यह एक शक्ति पीठ है। यह मंदिर वर्तमान कामरूप जिला में स्थित है। माँ कामख्या आदिशक्ति और शक्तिशाली तांत्रिक देवी के रूप में जानी जाती हैं। इन्हे माँ काली और तारा का मिश्रित रूप माना जाता है। इनकी साधना को कौल या शक्ति मार्ग कहा जाता है। यहाँ साधू-संत, अघोरी विभिन्न प्रकार की साधना करते हैं।

 

आसाम को प्राचीन समय में कामरूप देश या कामरूप-कामाख्या के नाम से जाना जाता था। यह तांत्रिक साधना और शक्ति उपासना का महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता था। प्राचीन काल में ऐसी मान्यता थी कि कामरूप- कामाख्या के सिद्ध लोग मनमोहिनी मंत्र तथा वशीकरण मंत्र आदि जानते है। जिस के प्रभाव से किसी को भी मोहित या वशीभूत कर सकते थे।
वशीकरण मंत्र —

ॐ नमो कामाक्षी देवी आमुकी मे वंशम कुरुकुरु स्वाहा|

 

गौहाटी सड़क मार्ग, रेल और वायुयान से पहुँचा जा सकता है। गौहाटी के पश्चिम में निलांचल/ कामगिरी/ कामाख्या पर्वत पर यह मंदिर स्थित है। यह समुद्र से लगभग 800 फीट की ऊंचाई पर है। गौहाटी शहर से मंदिर आठ किलोमीटर की दूरी पर पर्वत पर स्थित है। मंदिर तक सड़क मार्ग है।

वास्तु शिल्प – ऐसी मान्यता है कि इसका निर्माण 8वीं सदी में हुआ था। तब से 17वीं सदी तक अनेकों बार पुनर्निर्माण होता रहा। मंदिर आज जिस रूप में मौजूद है। उसे 17वीं सदी में कुच बिहार के राजा नर नारायण ने पुनर्निमित करवाया था। मंदिर के वास्तु शिल्प को निलांचल प्रकार माना जाता है। मंदिर का निर्माण लंबाई में है। इसमें पूर्व से पश्चिम, चार कक्ष बने हैं। जिसमें एक गर्भगृह तथा तीन अन्य कक्ष हैं।

ये कक्ष और मंदिर बड़े-बड़े शिला खंडों से निर्मित है तथा मोटे-मोटे, ऊँचे स्तंभों पर टिकें हैं। मंदिर की दीवारों पर अनेकों आकृतियाँ निर्मित हैं। मंदिर के अंदर की दीवारें वक्त के थपेड़ों और अगरबत्तियों के धुएँ से काली पड़ चुकी हैं। तीन कक्षों से गुजर कर गर्भ गृह का मार्ग है। मंदिर का गर्भ -गृह जमीन की सतह से नीचे है। पत्थर की संकरी, टेढ़ी-मेढ़ी सीढ़ियों से नीचे उतर कर एक छोटी प्रकृतिक गुफा के रूप में मंदिर का गर्भ-गृह है। यहाँ की दीवारें और ऊंची छतें अंधेरे में डूबी कालिमायुक्त है।

इस मंदिर में देवी की प्रतिमा नहीं है। वरन पत्थर पर योनि आकृति है। यहाँ पर साथ में एक छोटा प्रकृतिक झरना है। यह प्रकृतिक जल श्रोत इस आकृति को गीली रखती है। माँ कामाख्या का पूजन स्थल पुष्प, सिंदूर और चुनरी से ढका होता है। उसके पास के स्थल/ पीठ को स्पर्श कर, वहाँ के जल को प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है।

 

उसके बगल में माँ लक्ष्मी तथा माँ सरस्वती का स्थान/ पीठ है। यहाँ बड़े-बड़े दीपक जलते रहते हैं। गर्भगृह से ऊपर, बाहर आने पर सामने अन्नपूर्णा कक्ष है। जहाँ भोग प्रसाद बनता है। मंदिर के बाहर के पत्थरों पर विभिन्न सुंदर आकृतियाँ बनी हैं। मंदिर का शिखर गोलाकार है। यह शिखर मधुमक्खी के गोल छत्ते के समान बना है।

बाहर निकाल कर अगरबत्ती व दीपक जलाने का स्थान बना है। थोड़ा आगे नारियाल तोड़ने का स्थान भी निर्दिष्ट है। पास के एक वृक्ष पर लोग अपनी मनोकामना पूर्ति के लिए धागा लपेटते हैं। मंदिर परिसार में अनेक बंदर है। जो हमेशा प्रसाद झपटने के लिए तैयार रहते है। अतः इनसे सावधान रहने की जरूरत है।

किंवदंतियां- मंदिर और देवी से संबंधित इस जगह की उत्पत्ति और महत्व पर कई किंवदंतियां हैं।

1) एक प्रसिद्ध कथा शक्तिपीठ से संबंधित है। ऐसी मान्यता है कि यहाँ सती की योनि गिरी थी। जो सृष्टि, जीवन रचना और शक्ति का प्रतीक है। सती भगवान शिव की पहली पत्नी थी। सती के पिता ने विराट यज्ञ का आयोजन किया। पर यज्ञ के लिए शिव और सती को आमंत्रित नहीं किया था। फलतः सती ने अपमानित महसूस किया और सती ने पिता द्वारा आयोजित यज्ञ की आग में कूद कर अपनी जान दे दी।

इस से व्यथित, विछिप्त शिव ने यज्ञ कुंड से सती के मृत शरीर को उठा लिया। सती के मृत शरीर को ले कर वे अशांत भटकने लगे। शिव सति के मृत देह को अपने कन्धे पर उठा ताण्डव नृत्य करने लगे। फ़लस्वरुप पृथ्वी विध्वंस होने लगी। समस्त देवता डर कर ब्रम्हा और विष्णु के पास गये और उनसे समस्त संसार के रक्षा की प्रार्थन की। विष्णु ने शिव को शांत करने के उद्देश्य से अपने चक्र से सती के मृत शरीर के खंडित कर दिया। फलतः सती के शरीर के अंग भारत उपमहाद्वीप के विभिन्न स्थानों पर गिर गए। शरीर के अंग जहां भी गिरे उन स्थानों पर विभिन्न रूपों में देवी की पूजा के केंद्र बन गए और शक्तिपीठ कहलाए। ऐसे 51 पवित्र शक्तिपीठ हैं। कामाख्या उनमें से एक है। संस्कृत में रचित कलिका पुराण के अनुसार कामाख्या देवी सारी मनोकामनाओं को पूरा करनेवाली और मुक्ति दात्री शिव वधू हैं।

कामाक्षे काम सम्मपने कमेश्वरी हरी प्रिया,
कामनाम देही मे नित्यम कामेश्वरी नामोस्तुते||

अंबुवासी पूजा- मान्यता है कि आषाढ़ / जून माह में देवी तीन दिन मासिक धर्म अवस्था में होती हैं। अतः मंदिर बंद कर दिया जाता है। चौथे दिन मंदिर सृष्टि, जीवन रचना और शक्ति के उपासना उत्सव के रूप में धूम धाम से खुलता है।मान्यता है कि इस समय कामाख्या के पास ब्रह्मपुत्र नदी लाल हो जाती है।

2) एक अन्य किवदंती के अनुसार असुर नरका कमख्या देवी से विवाह करना चाहता था। देवी ने नरकासुर को एक अति कठिन कार्य सौपते हुए कहा कि अगर वह एक रात्रि में निलांचल पर्वत पर उनका एक मंदिर बना दे तथा वहाँ तक सीढियों का निर्माण कर दे। तब वे उससे विवाह के लिए तैयार हैं। दरअसल किसी देवी का दानव से विवाह असंभव था। अतः देवी ने यह कठिन शर्त रखी। पर नरकासुर द्वारा इस असंभव कार्य को लगभग पूरा करते देख देवी घबरा गई। तब देवी ने मुर्गे के असमय बाग से उसे भ्रमित कर दिया। नरकासुर ने समझा सवेरा हो गया है और उसने निर्माण कार्य अधूरा छोड़ दिया और शर्त हार गया। नरकासुर द्वारा बना अधूरा मार्ग आज मेखला पथ के रूप में जाना जाता है।

3)एक मान्यता यह भी है कि निलांचल/ कामगिरी/ कामाख्या पर्वत शिव और सती का प्रेमस्थल है। देवी कामाख्या सृष्टि, जीवन रचना और प्रेम की देवी है और यह उनका प्रेम / काम का स्थान रहा है। अतः इस कामाख्या कहा गया है।

4) एक कहानी के अनुसार कामदेव श्राप ग्रस्त हो कर अपनी समस्त काम शक्ति खो बैठे। तब वे इस स्थान पर देवी के गर्भ से पुनः उत्पन्न हो शापमुक्त हुए।

5)एक कथा संसार के रचनाकार और सृष्टिकर्ता भगवान ब्रह्मा से संबन्धित है। इस कहानी के अनुसार देवी कामाख्या ने एक बार ब्रह्मा से पूछा कि क्या वे शरीर के बिना जीवन रचना कर सकते हैं। ब्रह्मा ने एक ज्योति पुंज उत्पन्न किया। जिसके मध्य में योनि आकृति थी। यह ज्योति पुंज जहाँ स्थापित हुई उस स्थान को कामरूप-कामाख्या के नाम से जाना गया।

6) एक अन्य मान्यतानुसार माँ काली के दस अवतार अर्थात दस महाविद्या देवी इसी पर्वत पर स्थित है। इसलिए यह साधना और सिद्धी के लिए उपयुक्त शक्तिशाली स्थान माना जाता है। ये दस महाविद्या देवियाँ निम्नलिखित हैं– भुवनेश्वरी, बगलामुखी, छिन्मस्ता, त्रिपुरसुंदरी, तारा, घंटकर्ण, भैरवी, धूमवती, मातांगी व कमला।

कामख्ये वरदे देवी नीलपर्वतवासिनी,
त्वं देवी जगत्म मातर्योनिमुद्रे नामोस्तुते ||

Beautiful Bhigwan – A Bird Sanctuary

Bhagwan  is located on the Pune-Solapur Highway(Maharastra) around 105 km from Pune on the backwaters of Ujani dam.  Its famous for migratory birds such as Ducks, Herons, Egrets, Raptors and Waders along with flocks of hundreds of flamingos

 

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Searching for Breakfast  –    Black Headed Ibis,

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     Asian Open Billed Stork  and  Black-winged Stilt in noon.

 

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An evening in  Bhigwan with seagulls…….  lovely  seabirds  

 

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beautiful long tailed, Green Bee Eater

 

 

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Grey Heron ready to take a flight……..

 

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I wish I could fly like a bird  एक आजाद परिंदे की तरह……..

 

 

 

Image courtesy Chandni Sahay