996 वर्क कल्चर क्या है? 996 work culture

China steps in to regulate brutal ‘996’ work culture

Chinese tech tycoon Jack Ma famously said it was a “blessing” for anyone to be part of the so-called “996 work culture”- where people work 9am to 9pm, six days a week. 

Now, China’s authorities have issued a stern reminder to companies that such punishing work schedules are in fact, illegal.

https://www.google.co.in/amp/s/www.bbc.com/news/world-asia-china-58381538.amp

क्या सचमुच बच्चे हमारे भविष्य हैं?

कुछ कहते हैं, दुनिया को सुंदर बनाए रखने के लिए,

पॉल्युशन वालों उद्योगों को अंतरिक्ष

यानि स्पेस में ले जाना चाहिए।

पर दुनिया में बिखरी ऐसी गंदगियों को

हटाने के लिए क्या करना चाहिए?

जब  अपनी दुनिया को साफ़ कर नहीं पा रहें हैं ,

तब अंतरिक्ष की ओर कदम क्यों बढ़ाना?

 

Goa-based chef arrested for sexually abusing 25-30 children, selling videos He allegedly traded and shared photographs and films using dark web

 

Radical space: Jeff Bezos wants to shift factories to another planet

गंगा- कब हमारी नींद खुलेगी?

अभी तक इस पर समस्यापर ध्यान क्यों नहीं दिया गया? जो अब सारी दुनिया में दिखाई जा रही है। यह अफ़सोस की बात है।

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Please watch this video – Covid threat to India’s holiest river Close

 

मैं क्यों आई धरा पर? #गंगाजयंती/गंगासप्तमी 18 मई

हिमालय से लेकर सुन्दरवन तक की यात्रा करती,

पुण्य, सरल, सलिला, मोक्षदायिनी गंगा,

 हमेशा की तरह पहाड़ों से नीचे पहुँची मैदानों का स्पर्श कर हरिद्वार !

कुम्भ की डुबकी में उसे मिला छुअन कोरोना का।

आगे मिले अनगिनत कोरोना शव।

वह तो हमेशा की तरह बहती रही

कोरोना वायरस

जल पहुँचाती घाट घाट!

जो दिया उसे, वही रही है बाँट!

किनारे बसे हर घर, औद्योगिक नगर, हर खेत और पशु को।

शुद्ध, प्राणवायु से भरी गंगा भी हार गई है मानवों से।

सैंकड़ों शवों को साथ ले कर जाती गंगा।

हम भूल रहें हैं, वह अपने पास कुछ भी  रखती नहीं।

अनवरत बहती है और पहुँचाती रही है जल।

अब वही पहुँचाएगी जो इंसानों ने उसे दिया।

कहते हैं गंगा मां  के पूजन  से  भाग्य खुल जाते हैं।

पर उसके भाग्य का क्या?

  ख़्याल उसे आता होगा मगर।

स्वर्ग छोड़ मैं क्यों आई धरा पर ?

 

( एक महीना  पहले यह  कविता मैंनें लिखी थी। इस खबर पर

आप के विचार सादर आमंत्रित हैं। गंगा अौर यह देश आप सबों का भी है। )

COVID-19 vaccine for 50+

Registration for inoculation will open any day now for senior citizens.Pl keep watching the CoWin site and app linked below. As yet both are only open for viewing and login by vaccinators. But the option to register could pop up sometime after Feb 15. When it does, you can register with your PAN card no and other details as required. You will be able to opt for the hospital most convenient to you. Once accepted, you will get an SMS confirming your registration with a 14 digit registration no. In due course after that you will get another SMS giving you a date and time for vaccination at the hospital you opted for. If you are particular about which vaccine you would like to take, pl check with the hospital of your choice about which one they are allotted.
https://www.cowin.gov.in/home
Pls forward to all citizens above 50.

Received as forwarded message.

पावा कढ़ाइगल -थांगम, समीक्षा (Paava kathaigal – Thangam Netflix, Movie Review )

Heart touching story of a trans woman Sattaar who is hated and isolated by everyone in his village .

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मुझे लगता है  मूवी रिव्यु लिखना, किसी फिल्म की बारीकियों को समझने और अभिव्यक्त करने की कला है। इस कला में मैं अनाड़ी हूं। मैंने आज तक रिव्यु नहीं लिखा हैं। यह मेरा पहला प्रयास है। यह मैं किसी के अनुरोध पर लिख रही हूं। मुझे नहीं पता, मैं इस समीक्षा के साथ कितना न्याय कर पा रही हूं । आपके विचार सादर आमंत्रित है।

“पावा कढ़ाइगल ” मैं ने नेटफ्लिक्स पर देखी । इसकी पहली कहानी “थांगम/ सोना” ने मेरे दिल को छू लिया। सत्तार का चरित्र बिल्कुल सच्चाई के करीब और मार्मिक है। जिसे मैं भूल नहीं पा रही। इसलिए मुझे यह ख्याल अच्छा लगा कि अपने दिल की बातों को पन्ने पर उतार दूं। इसके इंट्रो में बेहद खूबसूरती से, लाल रंग को नारी  जीवन के बदलावों के प्रतीक रूप में दिखाया गया है। थंगम एक ट्रांस ग्रामीण की कहानी है। कहानी का नायक, युवा सत्तार पुरुष शरीर में फंसा नारी मन है। जिसमें नारी सुलभ ईर्ष्या, प्रेम, नारी बनने की ख्वाहिश और सजने सँवरने की लालसा है। उसका सपना है अपना ऑपरेशन करा कर एक संपूर्ण नारी बनना। वह दिल से नारी है। इसलिये किसी सामान्य युवती की तरह वह अपने बचपन के मित्र सरवनन (शांतनु ) से बेहद प्यार करता है। जिसे वह प्यार से ‘सोना’ बुलाता है। महिला ट्रांसजेंडर सत्तार समाज के क्रूर व्यवहार और बहिष्कार का सामना करता है। सत्तार का एक मार्मिक डायलॉग उसके दिल का दर्द बखूबी बयान करता है –

“जब मैं किसी को छूता हूं तो लोग मुझे गलत समझते हैं या दूर भाग जाते हैं। ऐसे प्यार से मुझे आज तक किसी ने गले नहीं लगाया।”

हम सब अपना दर्द खूब महसूस करते हैं। जरूरी यह है कि दूसरों की तकलीफें भी उतनी ही शिद्दत से महसूस की जाए। ताकि यह खूबसूरत दुनिया और खूबसूरत बन जाए। कहते हैं ट्रांसजेंडर ईश्वरीय भूल है। लेकिन हम अर्धनारीश्वर को पूजते हैं। प्राचीन संस्कृति में किन्नरों को यक्ष और गंधर्वों के बराबर माना जाता था। उन्हें मंगल या शुभ कहते थे। पर आज समाज में तीसरे जेंडर की स्थिति बेहद नाजुक है। जिसे कालिदास और सुधा कोंगारा ने थांगम में अभिव्यक्त किया है। हम भूल जाते हैं कि ट्रांसजेंडर अन्य रचनाओं की तरह हीं ईश्वर की अनोखी और दुर्लभ रचना है। उनके पास भी दिल और भावनाएं होती हैं। जिस का हमें सम्मान करना चाहिए।

तमिल कथा संकलन  ‘पावा कढ़ाइगल’ को हिंदी में ‘ गुनाहों की कहानियां या सिन स्टोरीज’ कह सकते हैं।   थांगम नेटफ्लिक्स की तमिल एंथोलॉजी, ‘पावा कढ़ाइगल’ का हिस्सा है। इस लघु फिल्म को हिंदी, इंग्लिश, तमिल या तेलुगु में देखने के ऑप्शन उपलब्ध है। इस का संगीत मधुर है अौर बहते झरने के आसपास का दृश्य मनोहर है।

गौतम मेनन, वेत्रिमरन, सुधा कोंगारा और विग्नेश शिवन की समाज की कालिमा अभिव्यक्त करती हुई लाजवाब लघु फिल्म है। जो समाज के कई पक्षों के बारे में सोचने के लिए मजबूर करती है। नायक कालिदास जयराम ने सत्तार के ट्रांस कैरेक्टर एक्टिंग में दिल जीत लिया। अगर आपके पास 45 मिनट समय है। तब इसे जरूर देखें । शायद यह आपके ख्यालात और सोचने का नजरिया बदल दे।

Paava Kadhaigal' review: A largely effective dark anthology- The New Indian  Express

   Paava kathaigal – Thangam on Netflix

 

 

 

हिन्दी दिवस (हिन्दी सप्ताह ) Hindi Divas

 

“हिन्दी दिवस” – 14 सितंबर के शुभ अवसर पर सभी   को मेरी हार्दिक शुभकामनाएं।

Happy  Hindi Divas (Day) ! It is  celebrated on 14 September

यह गर्व की बात हैं कि  हिंदी एक वैज्ञानिक भाषा है. इसकी विशेषताएं हैं –

1. जो लिखते हैं ,वही पढ़ते हैं और वही बोलते हैं.

2.  उच्चारण सही हो, तब सुन कर लिख सकते हैं.

3. वाक्य सम्बोधन  बड़े या छोटे के लिये अलग अलग होते हैं. जैसे आप ,तुम.

4. वाक्य शुरू करनेवाले  विशेष अक्षर ( capital ) नहीँ     होते.

  वैज्ञानिक कारण –

 अक्षरों का वर्गीकरण, बोली  और उच्चारण के अनुसार हैं. “क” वर्ग  कंठव्य कहे जाता हैं , क्योंकि इसका कंठ या गले से हम उच्चारण करते हैं.बोलने के समय जीभ गले के ऊपरी भाग को छूता हैं. बोल कर इसे  समझा जा सकता हैं.

क, ख, ग, घ, ङ.

इसी तरह “च ” वर्ग के सब अक्षर तालव्य कहलाते हैं.इन्हें बोलने के  समय जीभ तालू  को छूती है ।

च, छ, ज, झ,ञ

    “ट”  वर्ग मूर्धन्य कहलाते हैं. इनके  उच्चारण के समय जीभ  मूर्धा से लगती  है ।

ट, ठ, ड, ढ ,ण

त ” समूह के अक्षर दंतीय कहे जाते हैं. इन्हें बोलने के  समय जीभ दांतों को छूता हैं.

त, थ, द, ध, न

“प ” वर्ग ओष्ठ्य कहे गए, इनके  उच्चारण में दोनों ओठ आपस में मिलते  है।

प , फ , ब ,भ , म.

इसी तरह दंत ” स “, तालव्य  “श ” और मूर्धन्य “ष” भी बोले और लिखे जाते हैं.

Happy Friendship Day to all my friends !!

Friendship Day – It falls on first Sunday of August every year. This year its on 2, August 2020 in India.

International Friendship Day is a day in several countries for celebrating friendship. It was first proposed in 1958 in Paraguay as the International Friendship Day – Thursday, 30 July, 2020

कौन नासमझ है?

#व्यंग

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बड़े नासमझ हैं ये इंसान .

शोर मचा रहें हैं,

हमें बाहर करने के लिए.

क्या पता,

ये ग़लती से आ गए हों हमारे इलाक़े में.

वरना हमें अंदर आते समय क्यों नही रोका ?

The alarming video, which presents the sorry state of the hospital, shows a bunch of 50 pigs roaming freely in the hospital, where coronavirus COVID-19 patients are admitted.

Pigs roam freely at COVID-19-designated hospital in Karnataka's Kalaburagi — Viral video

 

Shocking video emerges from Karnataka govt hospital; 50 pigs found roaming hospital corridor in Kalaburagi

आज के दधीचि

Thousands of bodies were left to decay in unsanitary conditions at The Centre for Body Donations at Paris-Descartes University, reports say.

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इन्सान की क़ीमत इतनी कम क्यों है?

युगों-युगों  से चले आ रहे रस्मों-रिवाजों को बदल कर,

अपने शरीर का दान करना सरल नहीं होगा.

जन कल्याण के लिए बॉडी डोनेशन करने वाले

इन दधीचियों का ऐसा हश्र ?

इन्सान की क़ीमत इतनी कम क्यों है?

जीवन में और जीवन के बाद भी?

किवदंति – दधीचि ने अपने शरीर / अस्थियों का दान,  इन्द्र के अनुरोध पर,  लोक कल्याण के लिये किया था। क्योंकि ब्रह्म तेज़, महर्षि दधीचि के हड्डियों से बने वज्र से राक्षस  वृत्रासुर का संहार संभव था।