
मेहमान

“The Whole Is Greater Than The Sum Of Its Parts”. Likewise, The Cornucopian half of this blog encompasses my blog in its entirety which otherwise is scattered into the myriad hats I wear creatively!!

पतझड़ की धूप में, सुलगती इक इबादत है,
पलाश के सुर्ख फूलों में, रब की नजाकत है।
जमीं पर आसमानी आग, मंजर सा नजर आता है
ये जंगल की खामोशी में, कविता एक सुनाता है।
जंगल-ज्वाला
पलाश, जिसे ‘जंगल की आग’ (Flame of the Forest) कहा जाता है, भारतीय प्रकृति और संस्कृति का एक अटूट हिस्सा है। पलाश जंगल की सुलगती गर्मी और प्रकृति का सुर्ख पैगाम है। जब बसंत की दस्तक होती है तब कुदरत भारतीय जंगलों के कैनवास पर एक ऐसा रंग बिखेरता है जो आँखों और रूह को सुकून देती है। यह रंग है पलाश का। इसे केवल एक फूल नहीं, टहनियों पर खिली हुई वह ‘कविता’ है जिसे तपते मौसम का गर्द भी धुंधला नहीं कर पाता।
पलाश (Butea monosperma) का खिलना महज़ एक मौसमी बदलाव नहीं, बल्कि जीवन के उस फलसफे का प्रतीक है जहाँ खाक व गर्मी से भी खूबसूरती जन्म लेती है।
पलाश का अस्तित्व: वानस्पतिक और भौगोलिक परिचय
पलाश को वानस्पतिक विज्ञान की भाषा में ब्यूटिया मोनोस्पर्मा (Butea monosperma) कहा जाता है। यह ‘फैबेसी’ (Fabaceae) परिवार का सदस्य है। इसके कई नाम इसके चरित्र की गवाही देते हैं:
• ढाक: इसके पत्तों की बनावट और सघनता के कारण।
• टेसू: इसके फूलों की मनमोहक रंग व छटा के कारण।
• केसू: विशेषकर पंजाब और उत्तर भारत के क्षेत्रों में।
बनावट और संरचना
पलाश का पेड़ मध्यम ऊंचाई का होता है। इसके पत्ते त्रिपक्षीय (trifoliate) होते हैं, यानी एक ही डंठल पर तीन पत्ते। इन पत्तों के बारे में एक प्रसिद्ध मुहावरा भी है—’ढाक के तीन पात’, जो किसी चीज़ की स्थिरता या अपरिवर्तनीय स्थिति को दर्शाता है। पलाश के फूल बिना किसी खुशबू के होते हैं, लेकिन उनका गहरा केसरिया-लाल, सुर्ख रंग इतना प्रभावी होता है कि दूर से देखने पर ऐसा भ्रम होता है जैसे जंगल में आग लग गई हो। इसीलिए इसे अंग्रेज़ी में ‘Flame of the Forest’ कहा जाता है।
रूहानियत और दर्शन: पलाश की सादगी में छिपा सबक
पलाश का खिलना एक गहरा आध्यात्मिक संदेश देता है। यह फूल तब खिलता है जब पेड़ के पुराने पत्ते गिर चुके होते हैं और टहनियाँ पूरी तरह नग्न होती हैं। यह इस बात का संकेत है कि जब हम अपने पुराने अहंकार और बेकार की यादों को त्याग देते हैं, तभी हमारे भीतर ईश्वरीय प्रकाश का उदय होता है
पलाश के फूलों को देखकर ऐसा महसूस होता है जैसे प्रकृति सजदे में झुकी हुई है। इसके फूलों की बनावट पक्षी की चोंच जैसी आकाश की तरफ होती है, जिसे ‘तोता-फूल’ भी कहा जाता है। यह बनावट हमें सिखाती है कि खूबसूरती केवल सुगंध में नहीं, बल्कि वजूद की सादगी और रंग की गहराई में भी होती है।
सांस्कृतिक और पौराणिक महत्व
भारतीय परंपराओं में पलाश को बहुत ऊँचा दर्जा दिया गया है। वेदों और पुराणों व प्राचीन ग्रंथों के अनुसार, पलाश को पवित्र वृक्ष माना गया है। इसकी लकड़ी का उपयोग यज्ञों और हवनों में ‘समिधा’ के रूप में किया जाता है। पलाश की लकड़ियां चंद्रमा ग्रह की शांति और अशुभ प्रभाव को दूर करने के लिए हवन में काम में लाई जाती हैं। इसके फूल और जड़ भी मुख्य रूप से चंद्रमा ग्रह की अशुभ प्रभाव को कम करने और शुक्र दोष निवारण के लिए काम मिलाया जाता है।माना जाता है कि पलाश के तीन पत्तों में त्रिदेवों – ब्रह्मा, विष्णु और महेश का वास व सत-रज-तम का प्रतिक होती है।
भारतीय संस्कृति में पेड़-पौधों को हमेशा पूजनीय माना गया है। पीपल, बरगद, तुलसी की तरह पलाश का भी विशेष स्थान है।पुराणों में यह भी वर्णन मिलता है कि पलाश का वृक्ष तप, त्याग और साधना का प्रतीक है।
ऋषि-मुनि जंगलों में पलाश के वृक्षों के नीचे बैठकर ध्यान और तपस्या किया करते थे। इसकी छाया को शांति और आध्यात्मिक ऊर्जा देने वाली माना गया है। कई कथाओं में यह उल्लेख मिलता है कि पलाश के फूल भगवान अग्नि को अत्यंत प्रिय हैं, इसलिए इसे अग्नि का प्रतीक भी कहा जाता है। इसके चमकीले लाल फूल ऊर्जा, शक्ति और जीवन के उत्साह को दर्शाते हैं। दिवासी समाज में पलाश का महत्व और भी अधिक है।
बहुत पुराने समय की बात है। घने जंगलों और शांत पहाड़ियों के बीच एक छोटा-सा गाँव बसा था। उस गाँव में पलासी नाम की एक युवती रहती थी। वह बहुत सुंदर थी, लेकिन उसकी सबसे बड़ी पहचान उसका सरल मन और सच्चा प्रेम था। गाँव के लोग कहते थे कि उसकी आँखों में नदी जैसी शांति और उसके चेहरे पर बसंत जैसी मुस्कान रहती थी।
पलासी एक युवक से प्रेम करती थी, जिसका नाम माधव था। माधव वीर और मेहनती युवक था। दोनों बचपन से साथ बड़े हुए थे। जंगलों में घूमना, नदी किनारे बैठकर बातें करना और पेड़ों की छाँव में सपने देखना उनकी आदत बन गई थी। पूरा गाँव जानता था कि दोनों एक-दूसरे के बिना अधूरे हैं।
लेकिन समय हमेशा एक जैसा नहीं रहता। एक दिन राज्य में युद्ध छिड़ गया और माधव को सेना के साथ जाना पड़ा। जाते समय उसने पलासी से कहा—
“मैं बहुत जल्दी लौट आऊँगा। तुम मेरा इंतज़ार करना।”
पलासी ने मुस्कुराकर सिर हिला दिया, लेकिन उसके मन में अजीब-सा डर था।
दिन बीतते गए। मौसम बदलते रहे। बरसात आई, फिर सर्दी भी गुजर गई, लेकिन माधव वापस नहीं आया। पलासी हर शाम गाँव के बाहर उस पहाड़ी पर जाकर खड़ी हो जाती, जहाँ से दूर तक रास्ता दिखाई देता था। उसे विश्वास था कि एक दिन माधव उसी रास्ते से लौटेगा।
धीरे-धीरे उसका इंतज़ार विरह में बदल गया। उसकी आँखों से आँसू बहते रहते। कहते हैं कि जहाँ उसके आँसू धरती पर गिरते, वहाँ मिट्टी लाल हो जाती थी। गाँव के बुज़ुर्ग कहते थे कि उसका प्रेम इतना गहरा था कि धरती भी उसकी पीड़ा महसूस करने लगी थी।
एक दिन खबर आई कि युद्ध में माधव वीरगति को प्राप्त हो गया। यह सुनते ही पलासी का मन टूट गया। वह उसी पहाड़ी पर चली गई, जहाँ वह रोज उसका इंतज़ार किया करती थी। आसमान में सांझ उतर रही थी। चारों ओर सन्नाटा था। पलासी ने रोते हुए आकाश की ओर देखा और कहा—
“यदि मेरा प्रेम सच्चा है, तो वह इस धरती पर हमेशा जीवित रहेगा।”
कहते हैं उसी रात तेज आँधी चली, बादल गरजे और बिजली चमकी। सुबह जब गाँव के लोग पहाड़ी पर पहुँचे, तो वहाँ पलासी नहीं थी। उसकी जगह एक नया वृक्ष उगा था। उस वृक्ष पर लाल-लाल फूल खिले थे, जो दूर से अग्नि की लपटों जैसे दिखाई देते थे।
लोगों ने कहा कि यह पलासी के विरह और प्रेम की अग्नि है, जिसने फूलों को इतना लाल रंग दिया है। उसी दिन से उस वृक्ष को “पलाश” कहा जाने लगा।
कहते हैं कि जब बसंत आता है और पलाश के फूल खिलते हैं, तब प्रकृति भी उस अधूरी प्रेम कहानी को याद करती है। जंगलों में फैले लाल फूल मानो विरह की जलती हुई स्मृतियाँ लगते हैं। हवा जब इन फूलों को छूकर गुजरती है, तो ऐसा लगता है जैसे कोई प्रेयसी अब भी अपने प्रिय को पुकार रही हो।
भारतीय लोककथाओं में पलाश को प्रेम, प्रतीक्षा और त्याग का प्रतीक माना जाता है। इसके अग्नि जैसे फूल केवल सुंदरता नहीं, बल्कि उस विरह वेदना की कहानी कहते हैं, जिसने एक साधारण प्रेमिका को अमर बना दिया।
आज भी गाँवों में बुज़ुर्ग कहते हैं कि पलाश का पेड़ केवल जंगल का वृक्ष नहीं, बल्कि एक प्रेमिका के आँसुओं से जन्मी जीवित स्मृति है। इसके फूलों का लाल रंग हमें याद दिलाता है कि सच्चा प्रेम कभी समाप्त नहीं होता, वह प्रकृति में कहीं न कहीं हमेशा जीवित रहता है।
कई जनजातियाँ इसे अपने धार्मिक और सामाजिक जीवन का हिस्सा मानती हैं। विवाह, पूजा और अन्य मांगलिक कार्यों में पलाश की शाखाओं का उपयोग किया जाता है। कुछ स्थानों पर लोग इसे सौभाग्य और समृद्धि का प्रतीक मानकर अपने घरों के पास लगाते हैं। इसके फूल, छाल और बीज आयुर्वेदिक औषधियों में भी प्रयोग किए जाते हैं। इस प्रकार पलाश केवल धार्मिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि स्वास्थ्य और जीवनोपयोगी गुणों के कारण भी महत्वपूर्ण माना जाता है।
बसंत, पलाश और होली का अटूट रिश्ता
होली का त्योहार पलाश के बिना अधूरा होता है। पुराने समय में, पलाश के फूलों को उबालकर प्राकृतिक केसरिया रंग बनाया जाता था।यह प्रथा आज भी कहीं कहीं देखी जा सकती है। यह रंग न केवल त्वचा के लिए सुरक्षित है, बल्कि इसमें ठंडक भी होती है। आज के रसायनिक रंगों के दौर में, पलाश का वह ‘प्राकृतिक अक्स’ कहीं खो गया है, जिसे फिर से तलाशने की ज़रूरत है।
पलाश के औषधीय गुण: प्रकृति का चिकित्सक
पलाश का हर हिस्सा—जड़, तना, फूल, फल और गोंद—आयुर्वेद में ‘संजीवनी’ की तरह काम करता है।
फूलों के फायदे – पलाश के फूल शीतल प्रकृति के होते हैं। इनका उपयोग शरीर की जलन, प्यास और गर्मी से संबंधित रोगों को ठीक करने के लिए किया जाता है। यदि पलाश के फूलों का अर्क आँखों में डाला जाए, तो यह दृष्टि के लिए लाभदायक माना जाता है।
पत्तों और छाल का उपयोग – पलाश के पत्तों का उपयोग सदियों से ‘पत्तल’ बनाने में होता आया है। इन पत्तलों पर भोजन करना न केवल पर्यावरण के अनुकूल है, बल्कि स्वास्थ्य के लिए भी श्रेष्ठ माना जाता है। इसकी छाल का काढ़ा पेट के कीड़ों को खत्म करने (Anthelmintic) में रामबाण सिद्ध होता है।
पलाश का गोंद (कमरकस) – पलाश के तने से निकलने वाला गोंद ‘कमरकस’ के नाम से प्रसिद्ध है। यह हड्डियों की मजबूती और मांसपेशियों के दर्द में विशेष रूप से प्रभावी होता है।
पर्यावरण और पलाश: एक खामोश योद्धा
पलाश केवल सुंदर ही नहीं, बल्कि पर्यावरण का एक मज़बूत रक्षक भी है।
• मृदा संरक्षण: इसकी जड़ें मिट्टी को मज़बूती से पकड़ती हैं, जिससे मिट्टी का कटाव रुकता है।
• सूखा सहने की क्षमता: यह पेड़ बेहद कम पानी में भी जीवित रह सकता है, इसलिए इसे बंजर भूमि के पुनरुद्धार के लिए सबसे उपयुक्त माना जाता है।
• जैव विविधता: पलाश के फूल कई पक्षियों और मधुमक्खियों के लिए भोजन का मुख्य स्रोत होते हैं।
साहित्य और कला में पलाश
कवियों और लेखकों के लिए पलाश हमेशा से प्रेरणा का स्रोत रहा है। कबीर से लेकर आधुनिक कवियों तक, पलाश की ‘सुर्ख रंगत’ ने सबकी लेखनी को प्रभावित किया है।
“जंगल में जब पलाश दहकता है,
तब ऐसा लगता है
जैसे धरती का दिल धड़क रहा हो।”
पलाश का रंग विरह और मिलन दोनों का प्रतीक है। जहाँ यह एक ओर तपिश और त्याग को दर्शाता है, वहीं दूसरी ओर यह प्रेम की उस पराकाष्ठा को भी जाहिर करता है जो किसी के इंतज़ार में सुलग रही हो।
पलाश का संरक्षण: वक्त की माँग
आज कंक्रीट के जंगलों के बढ़ते विस्तार के कारण पलाश के असली जंगल सिमटते जा रहे हैं। हमें यह समझने की ज़रूरत है कि पलाश का विलुप्त होना केवल एक पेड़ का जाना नहीं है, बल्कि हमारी उस सांस्कृतिक विरासत और रूहानी सुकून का खो जाना है जो हमें अपनी जड़ों से जोड़ता है।
पलाश के बारे में कुछ ऐसी अनकही और दिलचस्प बातें
पलाश केवल एक दरख्त नहीं, बल्कि जंगल की वह पुरानी किताब है जिसके हर पन्ने पर कुदरत ने अपनी नजाकत और तेज दोनों लिखे हैं।
1. ‘कामदेव’ का धनुष और प्रेम का अक्स
पौराणिक कथाओं में पलाश को बहुत ही रुमानी दर्जा हासिल है। कहा जाता है कि प्रेम के देवता ‘कामदेव’ का धनुष, वह पलाश की लकड़ी से बना है। इसके सुर्ख फूलों को कामदेव के बाणों की संज्ञा दी गई है। यही वजह है कि जब पलाश खिलता है, तो हवा में एक अजीब सी खूबसूरत नशा छा जाता है, जिसे हम बसंत कहते हैं।
2. ‘ढाक के तीन पात’ का रूहानी फलसफा
हम अक्सर मुहावरे में कहते हैं—”ढाक के तीन पात”, जिसका मतलब होता है ‘हमेशा एक जैसा रहना’। लेकिन इसका एक गहरा रूहानी अर्थ भी है। पलाश के एक डंठल पर तीन पत्ते होते हैं, जिन्हें ब्रह्मा, विष्णु और महेश का रूप व सत-रज-तम का प्रतीक माना गया है। माना जाता है। यह हमें सिखाता है कि दुनिया बदलती रहे, मौसम बदलते रहें, पर इंसान को अपने वजूद और अपनी सादगी में रहना चाहिए।
3. बिना खुशबू की ख़ूबसूरती
दुनिया में ज्यादातर फूल अपनी खुशबू से पहचाने जाते हैं, लेकिन पलाश बे-खुशबू है। इसके बावजूद, इसकी रंगत इतनी पुर-असर है कि मीलों दूर से भी यह नजर आता है। यह एक बड़ा सबक है कि इंसान को केवल बाहरी दिखावे या ‘महक’ की जरूरत नहीं; अगर आपके भीतर की रंगत व किरदार सच्ची है, तो दुनिया आपकी तरफ खुद-ब-खुद खिंची चली आएगी।
4. बिच्छू के जहर का इलाज
कुदरत ने पलाश के भीतर सिर्फ रंग ही नहीं, इलाज भी भरी है। दिलचस्प बात यह है कि अगर किसी को बिच्छू काट ले, तो पलाश के बीजों का लेप उस जहर के असर को कम करने की ताकत रखता है। यह इस बात की दलील है कि जो चीज बाहर से आग जैसी सुलगती दिखती है, उसके भीतर मरहम भी छिपा हो सकता है।
5. ‘पक्षी की चोंच’ जैसा मंजर
अगर आप पलाश के फूल को गौर से देखें, तो इसकी बनावट किसी परिंदे (पक्षी) की चोंच जैसी लगती है। इसीलिए इसे ‘तोता-फूल’ भी कहते हैं। जब पूरा पेड़ इन फूलों से लद जाता है, तो ऐसा गुमान होता है जैसे हजारों सुर्ख परिंदे एक साथ टहनियों पर बैठकर रब की इबादत कर रहे हों।
मिट्टी का रक्षक
पलाश एक ऐसा दरख्त है जो बेहद जिद्दी और सब्र वाला है। यह ऐसी मिट्टी में भी फल-फूल जाता है जहाँ दूसरा कोई पौधा दम तोड़ दे। यह खारी मिट्टी को उपजाऊ बनाने का काम करता है। यह हमें सिखाता है कि हालात कितने ही ‘तल्ख’ या कड़वे क्यों न हों, हमें अपनी जमीन नहीं छोड़नी चाहिए।
चाँदनी रातों में सफेद तलाश का ‘जादू’
पलाश की एक दुर्लभ प्रजाति ‘सफेद पलाश’ भी होती है। जहाँ सुर्ख पलाश सूरज की तपिश जैसा लगता है, वहीं सफेद पलाश चाँदनी की शीतलता जैसा। आयुर्वेद और तंत्र शास्त्र (जैसे विज्ञान भैरव तंत्र में जिक्र आने वाले सूक्ष्म भाव) में सफेद पलाश को बहुत पवित्र माना गया है। यह एकाग्रता बढ़ाने में मदद करता है।
पलाश हमें सिखाता है कि पतझड़ में सब खो देने बाद ही नया जीवन और रंग हासिल किया जा सकता है। जंगल की यह आग दरअसल एक रूहानी रोशनी कहती है।
उपसंहार: पलाश—एक मुकम्मल दास्तान
पलाश वह फूल है जो बिना किसी शोर के खिलता है और बिना किसी शिकायत के गिर जाता है। इसकी ‘फितरत’ में एक दरवेश जैसी खामोशी है। यह हमें सिखाता है कि कठिन परिस्थितियों यानि पतझड़ के बाद भी फूलों सी मुस्कुराहट बिखेरी जा सकती है। यदि हम पलाश को अपने जीवन में उतारें, तब हम यह समझ सकते है।


ताडोबा अंधारी टाइगर रिजर्व के संदर्भ में जानिए जंगल और मानव के सह-अस्तित्व की अद्भुत कहानी। डॉ. रेखा रानी का यह विशेष लेख प्रकृति और मनुष्य के गहरे रिश्ते को दर्शाता है।
📰 यह विशेष लेख प्रतिष्ठित ‘अमर उजाला’ में प्रकाशित हुआ है 📰
सह–अस्तित्व की मिसाल, ताडोबा अंधारी टाइगर रिजर्व
✍️ लेखिका: डॉ. रेखा रानी (Dr. Rekha Rani)

ताडोबा रिजर्व की दहलीज़ पर बसे गांव एक ऐसी अनोखी दुनिया हैं, जहां दिन में इंसानों की आवाजाही रहती है और रात में उन्हीं रास्तों पर बाघों व जंगली जीवों के पदचाप सुनाई देते हैं। यह स्थान हमें सिखाता है कि प्रकृति को समझना और उसका सम्मान करना आवश्यक है—क्योंकि जंगल बचेगा, तभी मनुष्य बचेगा।
महाराष्ट्र के चंद्रपुर जिले में 1955 में स्थापित ताडोबा रिज़र्व लगभग 1727 वर्ग किलोमीटर में फैला है। यहाँ तेंदुआ, स्लॉथ भालू, जंगली कुत्ता (ढोल), सांभर, नीलगाय तथा असंख्य पक्षी प्रजातियाँ पाई जाती हैं। हालांकि, अधिकांश पर्यटक यहाँ भारत के राष्ट्रीय पशु रॉयल बंगाल टाइगर को देखने आते हैं, जो शक्ति, साहस और भारत की प्राकृतिक समृद्धि का प्रतीक है।
ताडोबा “लैंड ऑफ़ टाइगर्स” के बाघ इंसानों से डरकर भागते नहीं, बल्कि दिन के समय सड़कों पर टहलते हुए दिखाई देते हैं। यहां मार्च से मई के बीच “बाघ दर्शन” की संभावना सबसे अधिक रहती है। सामान्यतः पार्क अक्टूबर से जून तक खुला तथा मानसून – जुलाई से सितंबर बंद रहता है।

एक रोचक विशेषता यह है कि यहाँ के बाघों को जानी-मानी हस्तियों के नाम दिए गए हैं, जैसे—लारा, माधुरी, गब्बर, शिवाजी, अमिताभ, सोनम, मल्लिका आदि。
ताडोबा के आसपास बसे कोलारा, मोहरली, खुटबांडा जैसे गांव जंगल, जानवर और इंसान के सह-अस्तित्व का अनूठा उदाहरण हैं। स्थानीय लोग जंगली जानवरों की निजता का सम्मान करते हैं और उन्हें उकसाते नहीं। बाघ और अन्य वन्य जीव भी अनावश्यक रूप से इंसानों पर हमला नहीं करते。

यहां बाघ को केवल एक हिंसक पशु नहीं, बल्कि जंगल का देवता माना जाता है। स्थानीय निवासियों का विश्वास है कि बाघ का दिखना जंगल की अनुमति या चेतावनी का संकेत होता है。
यह क्षेत्र मूलतः कोलम और गोंड जनजातियों का है। उनके देवता तरु के नाम पर ही ताडोबा का नाम पड़ा। यहां वन्य जीवों के संरक्षक तरु देव का एक मंदिर भी है, जहाँ वर्ष में एक बार मेला लगता है。
स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, महुआ के पेड़ों में “जंगल माता” का वास होता है। महिलाएं महुआ बटोरने से पहले पूजा कर अनुमति लेती हैं। महुआ ग्रामीणों का भोजन, आजीविका और पारंपरिक पेय का स्रोत है。

यहाँ मान्यता है कि रात के समय जंगल से आने वाली विचित्र आवाज़ें चेतावनी हैं, इसलिए अँधेरा होने के बाद घर से बाहर निकलना वर्जित माना जाता है। एक किंवदंती के अनुसार, जो जंगल का अपमान करता है, वह रास्ता भटक जाता है और केवल जंगल के देवता से क्षमा माँगने पर ही सही राह पाता है。
ताडोबा के बीचोबीच बहने वाली अंधारी नदी, वैनगंगा बेसिन की एक सहायक नदी है। यह न केवल वन्य जीवों के लिए जल का मुख्य स्रोत व प्राकृतिक सुंदरता का आधार है。
आसपास के ग्रामीणों को जंगल से लकड़ी, महुआ, शहद, तेंदूपत्ता और अनेक औषधीय पौधे प्राप्त होते हैं। जंगल और गाँव के बीच एक अदृश्य सीमा है। पीढ़ियों से लोग सह-अस्तित्व व अद्भुत संतुलन में जीवन जी रहे हैं, हालांकि कभी-कभी फसलों के नुकसान, मवेशियों पर हमले जैसी परिस्थितियाँ भी उत्पन्न होती हैं।

ताडोबा-अंधारी टाइगर रिजर्व की शहनाज सुलेमान बैग, पहली महिला गाइड को “बेस्ट वाइल्डलाइफ गाइड” के लिए Billy Arjan Singh Award 2025 से सम्मानित किया गया है। ताडोबा सिखाता है कि भारत की प्रकृति केवल संरक्षित क्षेत्रों तक सीमित नहीं, बल्कि वहाँ भी जीवित है जहाँ लोग जंगल के साथ तालमेल बनाकर जीते हैं।
यह लेख मूल रूप से अमर उजाला पर प्रकाशित हुआ है। डॉ. रेखा रानी जी के इस विस्तृत और अद्भुत लेख को पूरा पढ़ने के लिए नीचे दिए गए बटन पर क्लिक करें:


मेरी पुस्तक की प्रतिष्ठित ‘प्रतिज्ञान पत्रिका’ में प्रकाशित विशेष समीक्षा मेरे साहित्यिक सफर का एक महत्वपूर्ण पड़ाव है—यह लेख उसी खुशी और उपलब्धि की एक झलक है।
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नमस्कार!
आज का दिन मेरे साहित्यिक सफर के लिए बेहद खास और उत्साहवर्धक है। एक लेखिका के रूप में जब आपके शब्दों और विचारों को सही पहचान और सराहना मिलती है, तो वह पल शब्दों में बयां करना मुश्किल होता है। मुझे आप सभी के साथ यह साझा करते हुए अत्यंत प्रसन्नता हो रही है कि मेरी पुस्तक की “प्रतिज्ञान पत्रिका” में एक बेहद विस्तृत और खूबसूरत समीक्षा प्रकाशित हुई है!
इस खास मौके और खुशी की एक छोटी सी झलक आप मेरे इस इंस्टाग्राम रील में देख सकते हैं:
साहित्य प्रेमियों के लिए ‘प्रतिज्ञान’ एक बहुत ही प्रतिष्ठित नाम है। हाल ही में उन्होंने अपना ‘वार्षिक संचयन २०२६’ पेपरबैक के रूप में प्रकाशित किया है। यह संचयन बीते एक वर्ष की बेहतरीन साहित्यिक रचनाओं — कहानियों, कविताओं और समीक्षाओं — का एक अनूठा संग्रह है। ऐसे उत्कृष्ट और विविध विधाओं से सजे संस्करण में मेरी पुस्तक की चर्चा होना, मेरे लिए बहुत बड़े सम्मान की बात है。
मैं चाहूँगी कि आप सभी साहित्य के इस खूबसूरत उत्सव का हिस्सा बनें। यदि आप बेहतरीन साहित्यिक रचनाओं को पढ़ने के शौकीन हैं, तो यह वार्षिक अंक आपकी बुकशेल्फ़ की शोभा अवश्य बढ़ाएगा। आप इस विशेषांक की अपनी प्रति सीधे यहाँ से ऑर्डर कर सकते हैं:
हृदय से आभार! ❤️
अंत में, मैं अपने सभी पाठकों और शुभचिंतकों का हृदय से धन्यवाद करना चाहती हूँ। आपके निरंतर प्रेम, समर्थन और प्रोत्साहन के बिना यह साहित्यिक यात्रा संभव नहीं थी। अपना स्नेह ऐसे ही बनाए रखें। लिंक पर क्लिक करके अपनी प्रति अवश्य ऑर्डर करें, और इंस्टाग्राम पर रील देखकर मुझे अपने विचार और प्रतिक्रिया ज़रूर बताएं!
सस्नेह,
डॉ. रेखा रानी ✨
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