ग़ज़ल सी ज़िंदगी…..

सँवरी, ग़ज़ल सी ज़िंदगी जीने की हसरतें

 किसकी नहीं होती? अौर, जो मिला है वही ग़ज़ल है।

यह समझते समझते ज़िंदगी निकल जाती है.

Pratibimb, Pune

Picture clicked by Chandni Sahay, on 9th October 2018 at Masaimara, Kenya, Africa is showcased in the photography show “Pratibimb” -9th edition, held between 29th November – 1st December, 2019 at Raja Ravi Verma art gallery Pune.

       

Mother Craft

                                   

 

 

कैंसर ट्रेन-क्या आप जानते हैं?

यह एक ट्रेन है. जिसमें, मन में आशा की किरणें अौर लबों पर प्रार्थना जपते रोज सैकड़ों कैंसर रोगी यात्रा करते हैं। यह ट्रेन अबोहर, पंजाब से निकलती है और बीकानेर जाती है। जहाँ राज्य सरकार द्वारा वित्त पोषित कैंसर अस्पताल है। यहाँ आचार्य तुलसी शांति प्रतिष्ठान, एक निजी दान ट्रस्ट द्वारा समर्थित अस्पताल है, जो गरीबों के लिए एकमात्र किफायती विकल्प है।

यहाँ इसे “कैंसर ट्रेन” के रूप में जाना जाता है। यह पंजाब में कैंसर के मामलों में अचानक वृद्धि के कारण हुआ है। माना जा रहा है कि यह कीटनाशकों के अत्यधिक उपयोग के कारण हो रहा है। यह प्रकृति से खेलवाङ करने का जीता-जागता, दुःखद उदाहरण है।

It is a train trip hundreds of cancer patients take for subsidised treatment. The train, which originates from Abohar and goes all the way to Jodhpur, dropping off patients at Bikaner, has come to be known as the “Cancer Train“. This is a train for the poor. It has no air-conditioned coaches. There is a sudden increase in cancer cases in Punjab due to excessive use of pesticide.

A moment of happiness,

you and I sitting on the verandah,

apparently two, but one in soul, you and I.

We feel the flowing water of life here,

you and I, with the garden’s beauty . and the birds singing.

The stars will be watching us,

and we will show them

what it is to be a thin crescent moon.

You and I unselfed, will be together,

indifferent to idle speculation, you and I.

The parrots of heaven will be cracking sugar

as we laugh together, you and I.

In one form upon this earth,

and in another form in a timeless sweet land.

Rumi ❤️

Kulliyat-e Shams, 2114

स्याह स्याही

अब अँधेरे से डर नहीं लगता.

अँधेरा हीं रुहानी लगता है.

स्याह स्याही, सफ़ेद पन्नों पर कई

कहानियाँ, कवितायें लिख जाती हैं.

वैसे हीं अँधेरे की रोशनाई में कितने

सितारे, ख़्वाब, अफ़साने दिख जाते हैं.

जिसमें कुछ अपना सा लगता है .

 

इत्तेफ़ाक

टूटे, बिखरे , जुटे ! यह महज़ समय का खेल नहीं. संयोग या इत्तेफ़ाक नहीं. ज़िंदगी ने बड़ी मेहनत-मशक़्क़त की है, ज़िंदगी को यहाँ तक लाने में.