मुलाक़ात

ऐसा भी क्या जीना?

पूरी ज़िंदगी साथ गुज़र गई।

पर ना अपने आप से बात हुई,

ना तन की रूह से मुलाक़ात हुई।

दीया

दीया

हर दीया की होती है,

अपनी कहानी।

कभी जलता है दीवाली में,

कभी दहलीज़ पर है जलता,

गुजरे हुए की याद का दीया

या चराग़ हो महफ़िल का

या हो मंदिर का।

हवा का हर झोंका डराता है, काँपते लहराते एक रात जलना और ख़त्म हो जाना,

है इनकी ज़िंदगी।

फिर भी रोशन कर जाते है जहाँ।

सूरज

चढ़ते सूरज के कई हैं उपासक,

पर वह है डूबता अकेला।

जलते शोले सा तपता आफ़ताब हर रोज़ डूबता है

फिर लौट आने को।

इक रोज़ आफ़ताब से पूछा –

रोज़ डूबते हो ,

फिर अगले रोज़

क्यों निकल आते हो?

कहा आफ़ताब ने –

इस इंतज़ार में,

कभी तो कोई डूबने से

बचाने आएगा।

ज़िंदगी का आईना

ज़िंदगी वह आईना है,

जिसमें अक्स

पल पल बदलता है।

इसलिए वही करो

जो देख सको। 

ऐतबार

यक़ीन और भरोसा टूटने पर,

अपने ऐतबार पर शर्मिंदा ना हों।

कहते हैं,

बार-बार कोई विश्वास तोड़े,

तब उसे जाने दो।

समझ लो,

यह है ईश्वर का संकेत।

क्योंकि

किसी से खिलवाड़ करने वाले से, नियति है खिलवाड़ करती।

यह है ऊपर वाले का नियम।

ज़िंदगी के रंग -125

ज़िंदगी के रंग – 225

ज़माने की राहें रौशन करते वक्त,

ग़र कोई आपकी सादगी भरी बातों के

मायने निकले।

समझ लीजिए

सामने वाले ने मन बना रखा है

आपकी बातों को नकारने का।

ना ज़ाया कीजिए वक्त अपना।

बेहिचक, बेझिझक बढ़ जायें

अपनी राहों पर।

लोगों को अक्सर देखा है,

चिराग़ों को बुझा,

हवा के झोंकों पर तोहमत लगाते।

मरते देश #DyingAfganistan

अभी तक लगता था

मर रहीं हैं नदियाँ,

गल रहें हैं ग्लेशियर,

धुँधले हो रहे हैं अंतरिक्ष,

कूड़ेदान बन रहे है सागर,

धरा और पर्वत…..

इंसानों की मलिनता से।

अब समझ आया

कई देश भी मर रहे हैं।

फ़र्क़ पड़ता है,

और दर्द होता है,

सिर्फ़ भुक्तभोगियों को।

बाक़ी सब जटिल जीवन के

जद्दोजहद में उलझे है।

विश्व राजनीति की पहेली है अबूझ।

तांडव #Covid19

कहते हैं जीवन के अंतिम सत्य का एहसास श्मशान में होता है।
सचमुच यह सत्य महसूस हुआ बाँस घाट श्मशान के पास से गुजरते हुऐ,
अौर काशी में मणिकर्णिका घाट की अविराम जलतीं चितायें देख कर।
मोक्ष की आकांक्षा से खिंचे चले आते हैं लोग काशी।
अौर  चिता की अग्नि धधकती रहती है इस महाश्मशान में।
एक चिता की अग्नि बुझे ना बुझे
धधक उठतीं हैं दूसरी चिता की लाल-पीली लपटें ।
 
आज रोज़ मिल रहीं हैं किसी ना किसी के निर्वाण की दुखद खबरें। 
 बन गईं हैं सारी श्मशानें, महाश्मशान, ….
…निरंतर जलती,  हवा में अजीब गंध बिखेरती।
थके व्यथित  परिजन अस्पताल, ईलाज़, ऑक्सीजन , दवा की लाइनों 
के बाद पंक्ति बना रहें गुजरे स्वजनों  के  अंतशय्या के लिये मसानों में।
 बिजली और गैस शव दाह गृह, क्रेमाटोरियम 
की दीवारें, भट्टियां, लोहे गल रहे अनवरत जलती अपनी हीं आग में ।
क्या यह संहारक शिव का तांडव है?
या जल रहें हैं हम सब मानव,  
मानवता अौर नैतिकता भूल अपनी हीं गलतियों के आग में? 

प्रार्थना

आँखें बंद कर हाथ जुड़ गए,

ऊपर वाले के सामने।

प्रार्थना करते हुए मुँह से निकला –

विधाता ! तुम दाता हो।

तुमसे प्रार्थना है –

जिसने मुझे जो, जितना दिया।

तुम उसे वह दुगना दो!

यह सुन ना जाने क्यों कुछ लोग नाराज़ हो गए।