स्टिग्मा / कलंक ?- Banished for Bleeding!

BBC NEWS- पश्चिमी भारतीय राज्यों में “पीरियड हट्स” जहां हजारों आदिवासी महिलाओं और लड़कियों को मासिक धर्म के दौरान निर्वासित किया जाता है।

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पता नहीं कब हम बदलेंगे?

सदियाँ गुजर गईं।

ना जाने कितने नए दौर आए।

ईश्वर प्रदात महिलाओं की सबसे बड़ी रचनात्मकता हीं

उनका स्टिग्मा है।

कब बदलेंगे हम?

 

इंडेक्स

ग्लोबल हंगर इंडेक्स,

 ह्मुमन कैपिटल इंडेक्स,

वर्ल्ड हैप्पीनेस रिपोर्ट,

मानव विकास सूचकांक,

प्रेस फ्रीडम इंडेक्स,

ग्लोबल जेंडर गैप रिपोर्ट,

और ऐसे ही ना जाने कितने ग्लोबल इंडेक्सों में

हम पीछे हैं,

काफ़ी नीचे हैं।

पर कोरोना में तो शीर्ष पर हैं।

और सैन्य खर्च में आगे हैं!

जो स्थिति है आज,

उसमें क्या यह गम्भीर सवाल नहीं कि वरीयता किसे?

किस बात को दी जाए?

नासमझी की इंतहा !

कहाँ जा रहें हैं हम सब? क्या जितने डाक्टर और नर्सें कोरोंना की बलि चढ़ रहे हैं, उतने फिर से तैयार हो सके है? अपना जीवन दाव पर लगा जीवन देने वालों का यह हश्र? उनकी भूलों को खोज रहे सब, अपनी ग़लतियाँ भूल कर। क्यों कोरोना फैला इस कदर? खोज़ सको तो खोज लो।

पक्षपात !!

यह खबर पढ़ कर सभी पक्षियों को बड़ी हैरानी हुई. इंसानों ने रवायत, नियमों को अपने आप पर लागू होते देख बोल पड़े खग – बड़े विचित्र हैं ये ! बिना हमारी कामना जाने हमें क़ैद में रख कर मन बहलाना तो इनका पुराना शग़ल था. पर ये नहीं मालूम था अपने यहाँ के रीत और कुरीति हम पर भी थोप रहें हैं. नर-नारी, नर-मादा के मूल्यों में भी श्रेष्ठता, उच्चता-निम्नता का खेल? इनसे ज़्यादा समझदार तो हम हैं. खुले आसमान में खुला और बंधनविहीन जीवन जीतें हैं.

आज के दधीचि

Thousands of bodies were left to decay in unsanitary conditions at The Centre for Body Donations at Paris-Descartes University, reports say.

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इन्सान की क़ीमत इतनी कम क्यों है?

युगों-युगों  से चले आ रहे रस्मों-रिवाजों को बदल कर,

अपने शरीर का दान करना सरल नहीं होगा.

जन कल्याण के लिए बॉडी डोनेशन करने वाले

इन दधीचियों का ऐसा हश्र ?

इन्सान की क़ीमत इतनी कम क्यों है?

जीवन में और जीवन के बाद भी?

किवदंति – दधीचि ने अपने शरीर / अस्थियों का दान,  इन्द्र के अनुरोध पर,  लोक कल्याण के लिये किया था। क्योंकि ब्रह्म तेज़, महर्षि दधीचि के हड्डियों से बने वज्र से राक्षस  वृत्रासुर का संहार संभव था।

Brain-eating amoeba

Naegleria fowleri, colloquially known as the “brain-eating amoeba“, is a species of the genusNaegleria, belonging to the phylumPercolozoa, which is technically not classified as true amoeba, but a shapeshifting amoeboflagellate excavate. It is a free-living, bacteria-eating microorganism that can be pathogenic, causing an extremely rare fulminant (sudden and severe) and fatal brain infection called naegleriasis, also known as primary amoebic meningoencephalitis.

 

NEWS – Brain-eating amoeba: Warning issued in Florida after rare infection case

 

Information courtesy – wikipedia.

A Fire Burns Without Touching Trees Or Grass

कुदरत  से देख बेरुख़ी  इंसानों  की ,
बदले मिजाज धधकते लौ की।
आदत अौर फितरत बदल ली है
 दरिया -ए-आग ने शराफत से ।

Spain – According to local news outlet Cope, it was captured at a park in Calahorra, and the white ‘film’ is actually seeds from the poplar tree covering the whole ground.  In the video, the fire burns away the poplar fluff to reveal green grass underneath. Remarkably enough, it doesn’t set any of the trees or the grass aflame. Even a bench in the park remains untouched by the fire.

आग का दरिया

नासमझी…नादानी क्या बया करे समझदारों की?

जंगल…धरा तो जल हीं रहें हैं.

दुनिया ने तरक़्क़ी इतनी कर ली नदी …पानी पर भी आग लगा दी.

अपने घर में आग लगे, दो पल भी बर्दाश्त नहीं.

बेज़ुबान जलचरों का घर- नदियाँ जलती रहें, चिंता नहीं.

यह समझदारी समझ नहीं आती.

Assam river burns for two days after crude oil spillage

https://www.google.co.in/amp/s/www.thehindu.com/news/national/other-states/assam-river-on-fire-for-two-days-after-crude-oil-spillage/article30724994.ece/amp/

National Law Day, India, 26 November

Constitution Day (National Law Day), also known as Samvidhan Divas, is celebrated in India on 26 November every year to commemorate the adoption of the Constitution of India. On 26 November1949, the Constituent Assembly of India adopted the Constitution of India, and it came into effect on 26 January 1950.

Courtesy- Wikipedia