
मुलाक़ात

William Wordsworth was spot on when he said “Poetry is the spontaneous overflow of powerful feelings: it takes its origin from emotion recollected in tranquility.” When my pen meets the paper, it always captures the many moods and their wild swings and emotions and their detours which overflows from my heart spontaneously into the paper transmogrifying into verses!!


कहते हैं, होते है पुरुष स्वच्छंद मनमौज।
क्या नहीं दिखता मुस्कान के पीछे परेशानियां का सोज़?
उसके कांधों पर ज़िम्मेदारी का बोझ?
बचपन से मजबूत बनो, रोना नहीं की सोंच?
इन अनकहे युद्ध से वह बिन हथियार लड़ता रोज़।
कहते हैं, होती है नारी, कठपुतली नाजुक, मौन।
क्या नहीं दिखता शांत, मुस्कान के पीछे जीवन का बोझ?
अपना नाम, घर छोड़ करती रहती अपनी खोज।
बचपन से सीख ख्वाहिशों, लफ्जों को दफ्न करने की सोंच,
उसके अनकहे-अनसुने शब्द देते उसे दर्द, घुटन जानसोज़।
दिखे ना दिखे, दोनों के ज़ख्मों के
निशां रूह पर पड़ते रहते हर रोज।
चाहिए सभी को इन बेडियों से आजादी,
खुलकर जीने, अपने बातों को कहने का हौसला,
एहसासों की अभिव्यक्ति मुक्त पंखों से उड़ने भरने के अरमान ।

मेरी यह कविता इस सुंदर कविता-संकलन में प्रकाशित हुई है—मेरे लिए यह एक सुखद साहित्यिक सम्मान और आत्मीय उपलब्धि है।
पुस्तक में अपनी रचना को स्थान मिलना मेरे शब्दों की यात्रा का एक खूबसूरत पड़ाव है।
हृदय से आभार उन सभी का, जिन्होंने मेरी कविता को पाठकों तक पहुँचने का अवसर दिया।








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