जिन्दगी के रंग – 223

आपने अपने आप को आईने में देखा ज़िंदगी भर।

एक दिन ज़िंदगी के आईने में प्यार से मुस्कुरा कर निहारो अपने आप को।

अपने को दूसरों की नज़रों से नहीं, अपने मन की नज़रों से देखा। कहो, प्यार है आपको अपने आप से!

सिर्फ़ दूसरों को नहीं अपने आप को खुश करो।

रौशन हो जाएगी ज़िंदगी।

जी भर जी लो इन पलों को।

फिर नज़रें उठा कर देखो। जिसकी थी तलाश तुम्हें ज़िंदगी भर,

वह मंज़िल-ए-ज़िंदगी सामने है। जहाँ लिखा है सुकून-ए-ज़िंदगी – 0 किलोमीटर!

क्या सचमुच बच्चे हमारे भविष्य हैं?

कुछ कहते हैं, दुनिया को सुंदर बनाए रखने के लिए,

पॉल्युशन वालों उद्योगों को अंतरिक्ष

यानि स्पेस में ले जाना चाहिए।

पर दुनिया में बिखरी ऐसी गंदगियों को

हटाने के लिए क्या करना चाहिए?

जब  अपनी दुनिया को साफ़ कर नहीं पा रहें हैं ,

तब अंतरिक्ष की ओर कदम क्यों बढ़ाना?

 

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बातें पकड़ना !!

कुछ समझदारों को कहते देखा है- बात ना पकड़ो !!!!!

पर खुद ऐसे लोगो को हमेशा

बातें पकड़तें देखा,

बातें बनाते भी देखा।

इससे इनके रिश्ते भले छूट जाएँ

या अपने टूट जायें।

ऐसे में यह मुहावरा याद आता है – “पर उपदेश, कुशल बहुतेरे।”

पुरानी बातें !

अक्सर लोगों ने कहा –

पुरानी बातें ना दोहराओ ।

पर क्यों?

हम सब रामायण, गीता और महाभारत दोहरातें हैं,

समझ और ज्ञान पाने, ग़लत बातों

को ग़लत बताने के लिए।

अनुचित करने वाले अपनी त्रुटि

छुपाने के लिए ये सब कहते हैं!

ग़लतियाँ करने से क्यों नहीं डरते हैं।

ऐसे लोगों को ग़लत हरकतें

कर नई बातों की उम्मीद क्यों?

ज़िंदगी के रंग- 218

ज़िंदगी के रंग – 217

ज़िंदगी के देखे कई रंग,

कई बसंत !

सतरंगी ज़िंदगी ने सिखाया बहुत कुछ।

कभी हँसाया कभी रुलाया।

आज जहाँ खड़े हैं,

आप सब के साथ ।

वह है उम्र किस्टलाइस्ड इंटेलिजेन्स का,

अनुभव और समझदारी की वह उम्र जहाँ बस चाहत है,

खुश रहने की!

खट्टी-मीठी ज़िंदगी की राहों को ख़ुशियों के साथ तय करने की।

अब दुनिया और काम में

वक्त के साथ छूटते, भूलते जा रहे अपनों के साथ

बैठ कर वक्त भूलने की चाहत है।

ज़िंदगी के रंग – 222

ज़िंदगी की राहों में लोग

रूठते-छूटते रहते हैं।

कुछ अपनों के अपना होने के

भ्रम टूटते रहतें हैं।

अँधेरे पलों में कुछ सच्चे अपने,

दमकते सितारों से,

ज़िंदगी में जुटते रहतें हैं।

गंगा- कब हमारी नींद खुलेगी?

अभी तक इस पर समस्यापर ध्यान क्यों नहीं दिया गया? जो अब सारी दुनिया में दिखाई जा रही है। यह अफ़सोस की बात है।

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Please watch this video – Covid threat to India’s holiest river Close

 

मैं क्यों आई धरा पर? #गंगाजयंती/गंगासप्तमी 18 मई

हिमालय से लेकर सुन्दरवन तक की यात्रा करती,

पुण्य, सरल, सलिला, मोक्षदायिनी गंगा,

 हमेशा की तरह पहाड़ों से नीचे पहुँची मैदानों का स्पर्श कर हरिद्वार !

कुम्भ की डुबकी में उसे मिला छुअन कोरोना का।

आगे मिले अनगिनत कोरोना शव।

वह तो हमेशा की तरह बहती रही

कोरोना वायरस

जल पहुँचाती घाट घाट!

जो दिया उसे, वही रही है बाँट!

किनारे बसे हर घर, औद्योगिक नगर, हर खेत और पशु को।

शुद्ध, प्राणवायु से भरी गंगा भी हार गई है मानवों से।

सैंकड़ों शवों को साथ ले कर जाती गंगा।

हम भूल रहें हैं, वह अपने पास कुछ भी  रखती नहीं।

अनवरत बहती है और पहुँचाती रही है जल।

अब वही पहुँचाएगी जो इंसानों ने उसे दिया।

कहते हैं गंगा मां  के पूजन  से  भाग्य खुल जाते हैं।

पर उसके भाग्य का क्या?

  ख़्याल उसे आता होगा मगर।

स्वर्ग छोड़ मैं क्यों आई धरा पर ?

 

( एक महीना  पहले यह  कविता मैंनें लिखी थी। इस खबर पर

आप के विचार सादर आमंत्रित हैं। गंगा अौर यह देश आप सबों का भी है। )