एक टुकड़ा चाँद का !

एक टुकड़ा चाँद का ,

खुली खिड़की के अंदर आ गया.

बड़े गौर से देखता रहा ,

थोड़ा मुस्कुराया फिर बोला –

बाहर आओ.

असल दुनिया में!

टूटना या खंडित होना बुरा नहीं होता.

उसे पकड़े रहने की कोशिश ग़लत होती है.

आगे बढ़ते रहने के लिए,

कुछ छोड़ना सीखना ज़रूरी है,

मेरी तरह!

देखो मुझे,

खंडित होना और पूरा होना ही मेरा जीवन है,

मेरी नियति है.

फिर भी मुस्कुराता हूँ.

सितारों के साथ  टिमटिमाता हूँ।

चाँदनी, शीतलता और सौंदर्य फैलाता हूँ.

प्रकृति के नियम

जब फूल ना खिले।

फल ना हो।

फसल ना बढ़े।

तब मिट्टी, बीज, पानी को ठीक करते हैं,

जिसमें ये बढ़ते है।

या मौसम की कमियों की बातें करते है.

इंसानों अौर बच्चों के मामलों में,

ठीक विपरीत क्यों?

उन पर प्रकृति के ये नियम क्यों नहीं लागू होते?

 

 

 

 

गिरे-बिखरे कुछ लम्हे!

टूट कर गिरे-बिखरे कुछ लम्हे थे,

नज़रों के सामने।

जैसे हवा के झोंके से धरा पर बिखर अाईं,

फूलों की पंखुड़ियों।

कुछ भूले-बिसरे नज़ारें और कुछ यादें ,

जैसे कल की बातें हो।

आज सारे पल,

 अौर  सारी बीतीं घड़ियाँ पुरानी अौर अनजानी लगीं।

ऐसा दस्तूर क्यों बनाया है ऊपर वाले ने?

Photography – India through the frame of Cornelia

A guest post by my friend and an awesome photographer and blogger – Cornelia Weber
On World Tourism Day – September 27

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Hi Friends,

        Today I am posting an article by my blogger friend Cornelia. This article was published in a prestigious  photography magazine by women -“Dynamic.”  

I am thankful to Cornelia for sharing this article with me. I love her photographs and blog. Hope you all will enjoy it too.

 

Cover Page of the magazine.

 

Cornelia Weber Photography
Weddings, Events of Life, Portraits, Life Style, Fine Art
website:
www.corneliaweber-photography.com
blog;
www.corneliaweberphotography.wordpress.com

 

 

अपने आप

 कैसे तराशें अपने आप को ?

यह  प्रश्न चिन्ह सा डोलता है मन में.

यह देख , चाँद  थोङ झुका अौर बोला। 

देखो, मैं तो सनातन काल से यही कर रहा हूँ।

हर दिन,  अपने आप को तराशता रहता हूँ।

जब-जब  अपने  में  कमी नज़र आती है।

अपने को  पूरा करने की कोशिश में लग जाता हूँ।

राह के पत्थर

राह के पत्थरों के ठोकरों ने सिखाया,

राह-ए-ज़िंदगी पर चलना।

बुतों का इबादत किया हर दम।

फिर क्यों  फेंक दें इन पाषणों को? ,

सबक तो इन्हों ने  भी दिये कई  बार।

 

 

क्या हाल है?

क्यों,  किसी के  ‘क्या हाल है?’  पूछते

 दर्दे-ए-दिल का हर टांका उधड़ता चला जाता है?

कपड़े के थान सा दिल का हर दर्द,

तह दर तह, अनजाने खुलता चला जाता है।

 यह  सोचे बिना,  इसे समेटेगा कौन?

ख़ता किसकी है?

पूछने वाले के अपनेपन की?

 या पीड़ा भरे दिल की?

 

Image- Aneesh

हिन्दी दिवस (हिन्दी सप्ताह ) Hindi Divas

 

“हिन्दी दिवस” – 14 सितंबर के शुभ अवसर पर सभी   को मेरी हार्दिक शुभकामनाएं।

Happy  Hindi Divas (Day) ! It is  celebrated on 14 September

यह गर्व की बात हैं कि  हिंदी एक वैज्ञानिक भाषा है. इसकी विशेषताएं हैं –

1. जो लिखते हैं ,वही पढ़ते हैं और वही बोलते हैं.

2.  उच्चारण सही हो, तब सुन कर लिख सकते हैं.

3. वाक्य सम्बोधन  बड़े या छोटे के लिये अलग अलग होते हैं. जैसे आप ,तुम.

4. वाक्य शुरू करनेवाले  विशेष अक्षर ( capital ) नहीँ     होते.

  वैज्ञानिक कारण –

 अक्षरों का वर्गीकरण, बोली  और उच्चारण के अनुसार हैं. “क” वर्ग  कंठव्य कहे जाता हैं , क्योंकि इसका कंठ या गले से हम उच्चारण करते हैं.बोलने के समय जीभ गले के ऊपरी भाग को छूता हैं. बोल कर इसे  समझा जा सकता हैं.

क, ख, ग, घ, ङ.

इसी तरह “च ” वर्ग के सब अक्षर तालव्य कहलाते हैं.इन्हें बोलने के  समय जीभ तालू  को छूती है ।

च, छ, ज, झ,ञ

    “ट”  वर्ग मूर्धन्य कहलाते हैं. इनके  उच्चारण के समय जीभ  मूर्धा से लगती  है ।

ट, ठ, ड, ढ ,ण

त ” समूह के अक्षर दंतीय कहे जाते हैं. इन्हें बोलने के  समय जीभ दांतों को छूता हैं.

त, थ, द, ध, न

“प ” वर्ग ओष्ठ्य कहे गए, इनके  उच्चारण में दोनों ओठ आपस में मिलते  है।

प , फ , ब ,भ , म.

इसी तरह दंत ” स “, तालव्य  “श ” और मूर्धन्य “ष” भी बोले और लिखे जाते हैं.

मुखौटे

बड़ा गुमान था कि, 

चेहरा देख पहचान लेते हैं लोगों को .

तब हार गए पढ़ने में चेहरे.

खा गए धोखा ।

जब चेहरे पे लगे थे मुखौटे… …

 एक पे एक।

साँस

हर साँस के साथ ज़िंदगी कम होती है.

फिर भी क्यों ख़्वाहिशें अौर हसरतें कम नहीं होतीं?