दख़्लअंदाज़ी

 

 

 

मेरा नाम लिया या आवाज़ें दीं थीं क्या?

कुछ तो सुना था हमने सुदूर से!

सब कहते हैं, हम खोए  रहते हैं अपने आप में,

इसलिये सुनते रहते हैं अनजानी, अनसुनी आवाज़ें।

मालूम है ना ?

इस “अपने-आप” में तुम भी हो,

रोज़ दख़्लअंदाज़ी करते हो।

 

आज के दधीचि

Thousands of bodies were left to decay in unsanitary conditions at The Centre for Body Donations at Paris-Descartes University, reports say.

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इन्सान की क़ीमत इतनी कम क्यों है?

युगों-युगों चले आ रहे रस्मों-रिवाजों को बदल

अपने शरीर का दान करना सरल नहीं होगा.

जन कल्याण के लिए बॉडी डोनेशन करने वाले

इन दधीचियों का ऐसा हश्र ?

इन्सान की क़ीमत इतनी कम क्यों है?

जीवन में और जीवन के बाद भी?

किवदंति – दधीचि ने अपने शरीर / अस्थियों का दान,  इन्द्र के अनुरोध पर,  लोक कल्याण के लिये किया था। क्योंकि ब्रह्म तेज़, महर्षि दधीचि के हड्डियों से बने वज्र से राक्षस  वृत्रासुर का संहार संभव था।

ज़िंदगी के रंग – 210

हाँथों  में खोजते रहे

अरमानों अौ ख़्वाबों की लकीरों को,

और वे लकीरें उभर आईं पेशानी….माथे पर,

अनुभव की सलवटें बन कर।

मेरी कविता संग्रह-किताब के रुप में

“ज़िंदगी के रंग”   my poem book

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इस नाम से, बरसों से मैं कविताएं लिखती आ रही हूँ। मेरे लिये खुशी की बात है कि मुझे अपनी कविताओं को पुस्तक रूप देने का अवसर मिला। इस किताब में मैंने अपनी नई कविताओं के साथ कुछ पुरानी कविताएं भी डाली है। आशा है, आप लोगों को यह कविता संग्रह पसंद आएगी। आप इसे नीचे दिए गए लिंक पर पढ़ सकते हैं और अगर चाहे, अब आप इसे दिए गए पब्लिकेशन लिंक पर ऑर्डर भी कर सकते हैं। अगर आप में से कोई मेरी इस किताब का रिव्यू करना चाहे तो मुझे बताएं। मुझे इससे बड़ी खुशी होगी।

इस पुस्तक के छपने की यात्रा में मदद के लिए आशीष/ शैंकी, रिव्यू लिखने के लिए स्मिता सहाय पुस्तक के कवर पृष्ठों पर तस्वीरों के लिए चांदनी सहाय की तहे दिल से आभारी हूं।

 

 

Click here to read this book.

Link to order the book-https://notionpress.com/read/zindagi-ke-rang

 

 

रथ-यात्रा 23.6.2020

उड़ीसा  के पुरी,  पुरुषोत्तम पुरी, शंख क्षेत्र या श्रीक्षेत्र में होनेवाले रथ-यात्रा की महत्ता  शास्त्रों और पुराणों में भी माना गया है। स्कन्द पुराण में कहा गया है कि रथ-यात्रा कीर्तन करने वाले पुनर्जन्म से मुक्त हो जाता है।  श्री जगन्नाथ के दर्शन, नमन करनेवाले  भगवान श्री विष्णु के उत्तम धाम को जाते हैं।

रथयात्रा में विष्णु, कृष्ण,  वामन और बुद्ध आदि दशावतारों पूजे जाते हैं। भगवान जगन्नाथ  जनता के बीच आते हैं –  सब मनिसा मोर परजा ….सब मनुष्य मेरी प्रजा है. आगे ताल ध्वज पर श्री बलराम, उसके पीछे पद्म ध्वज रथ पर माता सुभद्रा व सुदर्शन चक्र और अन्त में गरुण ध्वज पर या नन्दीघोष नाम के रथ पर श्री जगन्नाथ जी सबसे पीछे चलते हैं।

किवदंती अनुसार रथयात्रा के तीसरे दिन लक्ष्मी जी भगवान जगन्नाथ को ढूँढ़ते आती हैं। पर द्वैतापति दरवाज़ा बंद कर देते हैं।  लक्ष्मी जी नाराज़ होकर  लौट जाती हैं। बाद में भगवान जगन्नाथ लक्ष्मी जी को मनाने जाते हैं। उनसे क्षमा माँगकर और अनेक प्रकार के उपहार देकर उन्हें प्रसन्न करने की कोशिश करते हैं।

इस मान-मनौव्वल को  आयोजन के रुप में मनाया जाता है। इस आयोजन में एक ओर द्वैताधिपति भगवान जगन्नाथ की भूमिका में संवाद बोलते हैं तो दूसरी ओर देवदासी लक्ष्मी जी की भूमिका में संवाद करती है।  लक्ष्मी जी को भगवान जगन्नाथ के द्वारा मना लिए जाने को विजय का प्रतीक मानकर इस दिन को उत्सव रुप में मनाया जाता है।

 एक अन्य किवदंती  कहती है, राजा इन्द्रद्युम्न, को समुद्र में एक विशालकाय काष्ठ दिखा। राजा के उससे विष्णु मूर्ति का निर्माण कराने का निश्चय किया।  वृद्ध बढ़ई के रूप में विश्वकर्मा जी स्वयं आ गये। पर  मूर्ति बनाने के लिए उन्हों ने एक शर्त रखी। मूर्ति के पूर्णरूपेण बनने तक कोई उनके कक्ष में ना आये। राजा ने इसे मान लिया।  वृद्ध बढ़ई कई दिन से बिन खाए पिये  काम कर रहा था। अतः चिंतित राजा के द्वार खुलवा दिया।   वह वृद्ध बढ़ई तो  नहीं मिला पर  उसके द्वारा अर्द्धनिर्मित श्री जगन्नाथ, सुभद्रा तथा बलराम की काष्ठ मूर्तियाँ वहाँ पर मिली। आकाशवाणी सुन, उन मूर्तियों को  स्थापित करवा दिया।

रथयात्रा शरीर और आत्मा के मेल का संकेत – सांख्य दर्शन के अनुसार शरीर के 24 तत्वों के ऊपर आत्मा है। ये तत्व – पंच महातत्व, पाँच तंत्र माताएँ, दस इन्द्रियां और मन के प्रतीक हैं। शरीर रथ का निर्माण बुद्धि, चित्त और अहंकार से होती है। ऐसे रथ रूपी शरीर में आत्मा रूपी भगवान विराजमान होते हैं। इस प्रकार रथयात्रा शरीर और आत्मा के मेल की ओर संकेत करता है और आत्मदृष्टि बनाए रखने की प्रेरणा देता है। शरीर के रथयात्रा के समय रथ का संचालन आत्मा युक्त शरीर करती है जो जीवन यात्रा का प्रतीक है।  शरीर में आत्मा होती है। जिस माया संचालित करती है। इसी प्रकार भगवान जगन्नाथ के विराजमान होने पर उसे खींचने के लिए लोक-शक्ति संचालित करती है।Mahaprabhu sri jagannaths world famous Rath Yatra will be without ...

 

शुभ रथयात्रा -सब मनिसा मोर परजा!!

रथयात्रा

 

 

हम रहते हैं उस देश में, जहाँ देह से परे, हर बात में आध्यात्म होता है।

शंख क्षेत्र पुरुषोत्तम पुरी में, दशावतारों  विष्णु से बुद्ध तक  पूजे जाते है।

इस संदेश के साथ- सब मनिसा मोर परजा …..मेरी प्रजा है सब जन.

अर्द्धनिर्मित श्री जगन्नाथ, सुभद्रा तथा बलराम की काष्ठ मूर्तियाँ में हैं ,

पूर्णता का गूढ़ संदेश –

शरीर रथ का निर्माण होता बुद्धि, चित्त और अहंकार से,

 शरीर, मन से ऊपर आत्मा है, कहता है सांख्य दर्शन.

रथयात्रा संकेत है जीवन यात्रा में  शरीर और आत्मा के मेल का  ।

शरीर में आत्मा को माया संचालित करती है।

जैसे भगवान जगन्नाथ के रथ को लोक-शक्ति चलाती है।

भक्त को उस पथ अौर रथ में भी भगवान  दिखते हैं।

Mahaprabhu sri jagannaths world famous Rath Yatra will be without ...

 

 

तुम्हें शायद मेरी भी ज़रूरत नहीं !!!!

ऊपर वाले ने दुनिया बनाते-बनाते, उस में थोड़ा राग-रंग डालना चाहा .

बड़े जतन से रंग-बिरंगी, ढेरों रचनाएँ बनाईं.

फिर कला, नृत्य भरे एक ख़ूबसूरत, सौंदर्य बोध वाले मोर को भी रच डाला.

धरा की हरियाली, रिमझिम फुहारें देख मगन मोर नृत्य में डूब गया.

काले कागों….कौओं को बड़ा नागवार गुज़रा यह नया खग .

उन जैसा था, पर बड़ा अलग था.

कागों ने ऊपर वाले को आवाज़ें दी?

यह क्या भेज दिया हमारे बीच? इसकी क्या ज़रूरत थी?

बारिश ना हो तो यह बीमार हो जाता है, नाच बंद कर देता है।

 बस इधर उधर घुमाता अौ चारा चुंगता है.

वह तो तुम सब भी करते हो – उत्तर मिला.

कागों ने कोलाहकल मचाया – नहीं-नहीं, चाहिये।

जहाँ से यह आया है वहीं भेज दो. यहाँ इसकी जगह नहीं है.

तभी काक शिशुअों ने गिरे मयूर पंखों को लगा नृत्य करने का प्रयास किया.

कागों ने काकदृष्टि से एक-दूसरे को देखा अौर बोले –

देखो हमारे बच्चे कुछ कम हैं क्या?

दुनिया के रचयिता मुस्कुराए और बोले –

तुम सब तो स्वयं भगवान बन बैठे हो.

तुम्हें शायद मेरी भी ज़रूरत नहीं.

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#SushantSinghRajput,

#BollywoodNepotism

बॉलीवुड, रजतपट, मायानगरी, या अंधेर नगरी?

जिन्हें हम तीन घंटे सुनते हैं. उन्हें यहाँ अनसुना कर दिया जाता है। किसी को भी ङरा कर अकेलेपन का एहसास दिला कर बड़ी आसानी से डिप्रेशन के गर्त में ठेला जा सकता है.

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       बॉलीवुड एक मायानगरी है, जो ज़िंदगी के जंग से जूझते सामान्य लोगों के लिए सपने बुनता है, मनोरंजन ले कर आता है. जिसके पात्रों को आम लोग रोल मॉडल मानते हैं, सराहते हैं. हर तबके के लोग अपने गाढ़ी कमाई से टिकट ख़रीदते हैं, सिनेमा के तीन घंटे में अपने दुःख दर्द भूलने के लिए.

           इस रुपहले  पर्दे के पीछे की सच्चाई इतनी कटु है? यहाँ जीवन-मौत एक खेल बन चुका है ? सिनेमा के सीन की तरह? इनके अपने नियम क़ानून हैं? जिसे चाहें बैन कर दें? यह हक़ इन्हें कैसे मिला? अगर आम लोग या तथाकथित बाहरी लोग इन्हें बैन कर दें? इनके सिनेमा को देखना बैन कर दें? तब क्या करेंगे ये रूपहले पर्दे के जागीरदार ? जिसे ये बाहरी मानते हैं, उनसे हीं  इनका व्यवसाय चलता है.

            ऐसे अनेकों शोध हैं जो स्पष्ट बताते हैं कि किसी को  भी बुली / bully कर, ङरा कर,  आईसोलेट कर, अकेलेपन का एहसास दिला कर बड़ी आसानी से डिप्रेशन  के गर्त में ठेला जा सकता है. आश्चर्य की बात है, जिन्हें हम तीन घंटे सुनते हैं. उन्हें यहाँ अनसुना कर दिया जाता है? होनहार कलाकारों को बैन करनेवाले ये लोग, शायद बेहद कमज़ोर, छिछले और डरपोक हैं. इन्हें अंधो में काना राजा बन कर रहने की आदत है.  इसलिये  प्रतिभावान लोगों से इस क़दर डरते हैं.

 

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आप सबों के विचार आमंत्रित हैं।

अक़्स !

तराशते रहें ख़्वाबों को,

कतरते रहे अरमानों को.

काटते-छाँटते रहें ख़्वाहिशों को.

जब अक़्स पूरा हुआ,

 मुकम्मल हुईं तमन्नाएँ,

साथ और हाथ छूट चुका था.

सच है …..

सभी को  मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता,

किसी को जमीं,

किसी को आसमाँ नहीं मिलता.