शुभ मकर संक्रांति, लोहड़ी व पोंगल! Happy Makar Sankranti, lohadi n Pongal!!

सूर्य दक्षिण जा बैठा और सर्द मौसम ने चादर फैला लिया. अब सूरज उत्तर की यात्रा पर निकला है, कर्क से मकर की ओर. अब रातें छोटी और दिन लम्बी होगी. सूर्य की गुनगुनी धूप में आकाश रंग-बिरंगी पतंगो से जगमगा उठेगा. नदियों-तीर्थों पर उपासक प्रकृति के सम्मान में सूर्य को नमन करेंगे. जीवन नव धान्य, गुड-तिल के माधुर्य से भर जाएगा.

मान्यता है कि काले रंग की साड़ी और मृग चर्म की कंचुकी, नीलम का आभूषण, अर्क पुष्प की माला धारण किए हुए “संक्रांति” आती है, जो सुख सम्पन्नता का प्रतीक है. मानव जीवन के आधार – प्राकृतिक को, कृतज्ञता अर्पित करते इस पावन त्योहार पर आप सबों को हार्दिक शुभकामनाएं!!

भास्करस्य यथा तेजो मकरस्थस्य वर्धते।
तथैव भवतां तेजो वर्धतामिति कामये।।
मकरसंक्रांन्तिपर्वणः सर्वेभ्यः शुभाशयाः।

चोट का दर्द

कहते हैं चोट का दर्द टीसता है

सर्द मौसम में.

पर सच यह है कि

सर्द मौसम की गुनगुनी धूप,

बरसाती सूरज की लुकाछिपी की गरमाहट

या जेठ की तपती गर्मी ओढ़ने पर भी

कुछ दर्द बेचैन कर जाती हैं.

दर्द को लफ़्ज़ों में ढाल कर

कभी कभी ही राहत मिलती है.

आदत

इक अजीब सी आदत जाती नहीं.

जब भी परेशां होतें हैं-

तुमसे बातें करने की हसरत जागती हैं।

पर मिलोगे कहाँ?

रास्ता और पता मालूम नहीं.

सतह का तनाव

पानी के क़तरे में चींटी को देखा क़ैद,

सतह तनाव को ना तोड़ पाने से,

एक बड़ी सी जल बूँद के अंदर.

ऐसे हीं क़ैद हो जातें है,

हम भी यादों के क़ैद में.

लगता है, दुनिया में हो कर भी नहीं हैं

और कभी नहीं तोड़ पाएँगे

इस कमज़ोर पारदर्शी बुलबुले के क़ैद को….

सतह तनाव- surface tension

ज़िंदगी के रंग – 194

ज़िंदगी कट गई भागते दौड़ते.

थोड़ा रुककर कर,

ठहर कर देखा – चहचहातीं चिड़ियों को,

ठंड में रिमझिम बरसती बूँदे,

हवा में घुली गुलाबी ठण्ड……

खुशियाँ तो अपने आस-पास हीं बिखरीं हैं,

नज़रिया और महसूस करने के लिए फ़ुर्सत….

वक़्त चाहिए.

आँधी और दिया

अतीत की  स्मृतियों का बोझ दम घोटने लगता है . अौर उनमें जीने की चाहत भी होती है।

यह कोशिश, कुछ ऐसी बात है जैसे – आँधियाँ भी चलती रहें, और दिया भी जलता रहे..।

ग़ज़ल सी ज़िंदगी…..

सँवरी, ग़ज़ल सी ज़िंदगी जीने की हसरतें

 किसकी नहीं होती? अौर, जो मिला है वही ग़ज़ल है।

यह समझते समझते ज़िंदगी निकल जाती है.