पहेलियाँ

हर रोज अपने आस-पास लोगों को पहेलियाँ बुनते देखा है।

वे बोलते कुछ है,  अर्थ कुछ अौर होता है। 

वे चाहते है कि लोग इस रहस्य को समझ जायें।

लेकिन वे भूल जाते हैं।

कैंची जैसी जुबान सारे रिश्ते कतर देती है।

अौर

ना तो  कतरनें पहले जैसी हो सकतीं हैं।

ना  टूटे काँच की  किरचियाँ।

बस चुभन रह जाती है,

अौर रह जाती है टूटते रिश्तों की अनसुनी आवाज़ें।

 

 

Image – Chandni Sahay

नज़्म बना जियेगें ज़िंदगी!

Out beyond ideas of wrongdoing and rightdoing there is a field. I’ll meet you there. When the soul lies down in that grass the world is too full to talk about. ❤  Rumi.

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लम्हों को  गँवाते गँवाते

निकल गई उम्र-ए-रफ़्ता।

गर मिले  फिर इत्तिफ़ाक़ से. 

 नज़्म बना जियेगें ज़िंदगी।

सही-गलत से दूर…मिलेंगे उस जगह….

जहाँ आत्मा,  शरीर के  लिबास में ना हो।

 

 

 

उम्र-ए-रफ़्ता  –  past life,  गुज़री हुई उम्र

ख़ामोश किताबें !!

मौन को सुनो ,  इन  में बला की

 की ताक़त होती है।

 जैसे शब्दों, अल्फ़ाज़ों औ लफ़्ज़ों से भरी 

किताबें   गहरी 

मगर ख़ामोश होती है।

पल-पल

दिलो-दिमाग में  ख़्याल आया।

हर पल में हम ज़िंदगी जीते हैं।

अौर अगले पल वह पल मर जाता है,

बीता हुआ पल बन कर।

फिर, दिलो-दिमाग अौ ज़ेहन में ख़्याल आया,

हर पल ज़िंदगी आगे बढ़ती जा रही है।

 अौर हर पल उम्र घटती जा रही है

पर लालसा अौर लालच बढ़ती जाती है पल-पल।

 मुझे हीं या

औरों को भी यह ख़्याल आता है?

 

 

 

 

ज़ेहन-मस्तिष्क/दिमाग

कई बार जड़ा नाज़ुक आईने को , 

कभी चाँदी, कभी सोने,

कभी पन्नों,  कभी माणिक में।

पर बदला नहीं इस ने कभी अक्स-ए-हकीकत।

हैरान हैं, इस गज़ब की ईमानदारी से।

ऐसे जमाने में.

जब  बिकते हैं सख्त जां लोग भी  लाचारी में।

 

चेहरा जाना पहचान !

गिनती नहीं

ज़िंदगी में चोटे दीं

कितनों ने कितनी बार।

पर दर्द तब ज्यादा हुआ,

जब चोटे देने वाला

 चेहरा जाना पहचान निकला।

ज़िंदगी के रंग – 214

ख़्वाब था, ख़्वाहिशें थीं या हक़ीक़त …. मालूम नहीं!

लगता था जैसे जागती अँधेरी रातों में,

नींद आते कोई आ बैठा पायताने, सहलाता तलवों को.

जहाँ उग आए थे फफोले, ज़िंदगी के दौड़ में भागते-दौड़ते .

दर्द देते,  फूट गए थे कुछ छाले…. फफोले…… .

क्या जागती ज़िंदगी में भी कोई मलहम लगाने आएगा?

ज़िंदगी बुनती रहती है सपने !!

ज़िंदगी बुनती रहती है सपने

धागे के ताने-बाने से,

 रेशम सी बनाती ।

तभी,जब सुहानी बयार 

रुख बदल आँधी बन जाती है.

रेशम के ताने बाने तार-तार कर जाती है।

यादें हलकी हो भी जायें।

दर्द कहाँ कम होता है?

 

दिल तक !!!

चंद शब्दों … लफ़्ज़ों में

जब आग  की तपिश दिखे,

समझ लो ये दिल से निकलें हैं

और दिल तक जायेंगे!!