
मैं से मुक्त





कहते हैं, अंगूठे से पितृ-तीर्थ अर्पित जल
पितरों को तृप्ति और शांति देगा,
नैऋत्य कोण व पीपल तले, तैलदीप
उनका मार्ग प्रकाशित-प्रशस्त करेगा।
यह उन पहुँचा या नहीं,
यह बताने वाला कोई नहीं,
पर यह अद्भुत, ख़ूबसूरत परंपरा आध्यात्म,
विज्ञान या मनोविज्ञान जो भी है,
रूह और दिल को सुकून ज़रूर देती है।
ॐ पितृदेवाय नमः!!

इसी खूबसूरत दुनिया को शब्दों, बाल-मनोविज्ञान, कल्पना और थोड़े-से जादू के साथ पिरोती मेरी नई बाल-पुस्तक जल्द ही पार्थ प्रकाशन से प्रकाशित होने जा रही है।
यह पुस्तक मेरे दिल के बहुत करीब है क्योंकि बच्चों के लिए लिखना मुझे बेहद पसंद है। यह किताब बच्चों के लिए कहानियों का संग्रह भर नहीं, बल्कि उनके मन की उस मासूम दुनिया तक पहुँचने का एक छोटा-सा प्रयास है—जहाँ हर कहानी कुछ कहती है, कुछ सिखाती है और कल्पना के नए दरवाज़े खोलती है।
इन कहानियों में है—
बचपन की मासूमियत
कल्पना की उड़ान
मनोविज्ञान की सहज समझ
जीवन के छोटे-छोटे मूल्य
और थोड़ा-सा जादू…
मेरे लिए यह पुस्तक सिर्फ एक प्रकाशन नहीं, बल्कि मेरे मन के बेहद करीब एक रचनात्मक सफ़र है।



A masterpiece in progress! Even Shakespeare had an editor, yet here I am crafting away all on my own.


कहते हैं, होते है पुरुष स्वच्छंद मनमौज।
क्या नहीं दिखता मुस्कान के पीछे परेशानियां का सोज़?
उसके कांधों पर ज़िम्मेदारी का बोझ?
बचपन से मजबूत बनो, रोना नहीं की सोंच?
इन अनकहे युद्ध से वह बिन हथियार लड़ता रोज़।
कहते हैं, होती है नारी, कठपुतली नाजुक, मौन।
क्या नहीं दिखता शांत, मुस्कान के पीछे जीवन का बोझ?
अपना नाम, घर छोड़ करती रहती अपनी खोज।
बचपन से सीख ख्वाहिशों, लफ्जों को दफ्न करने की सोंच,
उसके अनकहे-अनसुने शब्द देते उसे दर्द, घुटन जानसोज़।
दिखे ना दिखे, दोनों के ज़ख्मों के
निशां रूह पर पड़ते रहते हर रोज।
चाहिए सभी को इन बेडियों से आजादी,
खुलकर जीने, अपने बातों को कहने का हौसला,
एहसासों की अभिव्यक्ति मुक्त पंखों से उड़ने भरने के अरमान ।

मेरी यह कविता इस सुंदर कविता-संकलन में प्रकाशित हुई है—मेरे लिए यह एक सुखद साहित्यिक सम्मान और आत्मीय उपलब्धि है।
पुस्तक में अपनी रचना को स्थान मिलना मेरे शब्दों की यात्रा का एक खूबसूरत पड़ाव है।
हृदय से आभार उन सभी का, जिन्होंने मेरी कविता को पाठकों तक पहुँचने का अवसर दिया।
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