वहम

कुछ लोगों को लगता है,

वे हमेशा सही हैं।

उनसे सही दूरी

बनाए रखनी चाहिए।

क्योंकि ऐसे लोग

अपने वहम में ज़िंदगी

से कुछ सीखते ही नहीं।

दूरियाँ-नज़दीकियाँ

ना दूरी ना नज़दीकी

रिश्ते बनाती या बिगड़ती है।

वह तो सरसब्ज़ ….सदाबहार

प्रीत और चाहत होती है।

राधा पास थी,

पर अपनी बनी नहीं।

मीरा सदियों दूर थी,

पर कान्हा उनके अपने थे।

एकांत

एकांत

वह नशा है,

जिसकी लत लगे,

तो छूटती नहीं।

भीड़ तो वह कोलाहल है,

जो बिना भाव

मिलती है हर जगह।

खोने का डर

इस दुनिया के मेले में,

लोगों को खोने से

परेशान न हो।

सब को खुश करने की

कोशिश में ,

रोज़ एक मौत ना मरो।

एक बात सीख लो!

खुद को खो कर खोजने और

संभलने में परेशानी बहुत है।

वक्त

कहते हैं,

बुरा हो या भला हो,

हर वक्त गुजर जाता है।

पर कुछ वक्त कभी मरते नहीं,

कभी गुजरते नहीं।

जागते-सोते ख़्वाबों ख़्यालों में

कहीं ना कहीं,

शामिल रहते हैं।

ज़िंदगी का हिस्सा बन कर।

मुलाक़ात

ऐसा भी क्या जीना?

पूरी ज़िंदगी साथ गुज़र गई।

पर ना अपने आप से बात हुई,

ना तन की रूह से मुलाक़ात हुई।

दीया

दीया

हर दीया की होती है,

अपनी कहानी।

कभी जलता है दीवाली में,

कभी दहलीज़ पर है जलता,

गुजरे हुए की याद का दीया

या चराग़ हो महफ़िल का

या हो मंदिर का।

हवा का हर झोंका डराता है, काँपते लहराते एक रात जलना और ख़त्म हो जाना,

है इनकी ज़िंदगी।

फिर भी रोशन कर जाते है जहाँ।

सूरज

चढ़ते सूरज के कई हैं उपासक,

पर वह है डूबता अकेला।

जलते शोले सा तपता आफ़ताब हर रोज़ डूबता है

फिर लौट आने को।

इक रोज़ आफ़ताब से पूछा –

रोज़ डूबते हो ,

फिर अगले रोज़

क्यों निकल आते हो?

कहा आफ़ताब ने –

इस इंतज़ार में,

कभी तो कोई डूबने से

बचाने आएगा।

ज़िंदगी का आईना

ज़िंदगी वह आईना है,

जिसमें अक्स

पल पल बदलता है।

इसलिए वही करो

जो देख सको।