
ना लड़ाईयाँ ना बचेगा इंसान


कल की छुई-मुई बेटियां कब बड़ी होकर घर-परिवार की जिम्मेदारी कंधों पर उठा लेती हैं, पता ही नहीं चलता। डॉ. रेखा सहाय की यह मर्मस्पर्शी कविता बेटियों के त्याग, ममता और उनके अटूट साहस को एक भावपूर्ण सलाम है। जरूर पढ़ें और साझा करें।
महिला दिवस का मतलब ये नहीं
कि नारी हो जाएं सर्वशक्तिमान।
और उसके सायों में लोग
बेज़ार हो ढूँढें अपना सम्मान।
ना ये है कोई ताक़त की जंग,
ना बाज़ुओं का इम्तिहान,
ये तो उन हाथों के लिए है दुआ,
जिन्हें सच में चाहिए सहारा और मान।
जो कमज़ोर, डरी और थकी हैं,
उनके लिए ये है रोशनी का पैग़ाम,
ताकि मिले बराबरी का हक़,
मोहब्बत, इज़्ज़त और आराम।
महिला दिवस का मतलब ये नहीं
कि महिलाएँ हो जाए सर्वशक्तिमान,
और उसके सायों में लोग
ढूँढें अपना सम्मान।



Topic by YQ


झोंके ने मुआफ़ी माँग भी ली तो क्या,
दरख़्त से टूटे पत्तों ने कहा —
हम तो बिखर ही गए यहाँ।
ज़ख़्म भर भी जाएँ तो क्या,
निशान तो रहते हैं सदा।
कौन सुने अनकही दिल की दास्ताँ,
हर कोई अपने आप में गुम यहाँ।
साहित्य और मानवीय संवेदनाओं के इस खूबसूरत सफर में, मुझे यह साझा करते हुए अपार हर्ष हो रहा है कि ‘प्रतिज्ञान प्रकाशन’ के नवीनतम अंक (अंक 6 – प्रेम विशेषांक) में मेरी स्वरचित कविता ‘भरम’ प्रकाशित हुई है।
यह अंक प्रेम के उन अनछुए और यथार्थवादी पहलुओं पर बात करता है जो अक्सर खामोशियों में छिपे रह जाते हैं। मेरी कविता ‘भरम’ भी इश्क़ की उसी अजब कहानी और दूर क्षितिज पर सागर-आसमान के मिलन जैसी बेचैनी को दर्शाती है।
अजब है इश्क़ की ये कहानी,
आसमान की नीली परछाइयों में रंगा है समुंदर,
दूर क्षितिज पर आसमान–सागर
के मिलन का है भरम भरा नजरिया।
हर लहर में मिलन की तड़प है।
हर सैलाब में बेचैनी, पूनम की रातों में
नज़र आती है……
फ़लक छू लेने की आरजू-ए-बेचैनी हैं।
इश्क़ पर टिकी ज़िंदगानी,
अजब है इश्क़ की ये कहानी।
यदि आप भी साहित्य प्रेमी हैं और प्रेम के इस सफर को महसूस करना चाहते हैं, तो इस अंक को जरूर पढ़ें और अपना स्नेह दें।
— डॉ. रेखा रानी

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