मघा नक्षत्र

27 नक्षत्रों में मघा 10वां नक्षत्र है, जिसका संबंध सीधे हमारे पितरों (पूर्वजों) से माना गया है। इस नक्षत्र का स्वामी केतु है, लेकिन इसके अधिपति देवता ‘पितर’ हैं। सूर्य के मघा नक्षत्र में आते ही मानसून का सबसे मुख्य और पवित्र काल शुरू होता है।

मघा का पानी

17 अगस्त से 31 अगस्त 2026 मघा नक्षत्र रहेगा। प्रसिद्ध लोक-कहावत: “मघा के बरसे, माता के परसे” — जिस तरह माँ अपने हाथों से प्रेमपूर्वक खाना परोसकर बच्चे को तृप्त करती है, ठीक उसी तरह मघा नक्षत्र की बारिश पूरी धरती और फसलों को तृप्त कर देती है।

अमृत जल

पारंपरिक मान्यताओं के अनुसार मघा की बारिश में एक प्राकृतिक शीतलता और ऊर्जा होती है। लोक-परंपराओं में इस जल को साफ बर्तन या कपड़े से छानकर संचित किया जाता है और पूरे वर्ष शुभ कार्यों के लिए रखा जाता है।

पौराणिक कथा
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, जब सूर्यदेव मघा नक्षत्र में प्रवेश करते हैं, तब सभी पितर (पूर्वज) सूक्ष्म रूप में अपने वंशजों को आशीर्वाद देने और धरती की स्थिति देखने आते हैं।
एक पौराणिक कथा के अनुसार, जब इंद्रदेव ने देवताओं की तृप्ति के लिए अमृत की वर्षा की योजना बनाई, तब पितरों ने भी पृथ्वी के समस्त जीवों की भलाई के लिए आशीर्वाद दिया। इसीलिए मघा नक्षत्र में होने वाली वर्षा की प्रत्येक बूंद को पितरों के सीधे आशीर्वाद के समान माना जाता है। मान्यता है कि इस समय होने वाली वर्षा से फसलों में कीट नहीं लगते, भूमि की उर्वरकता बढ़ती है और इस जल के स्पर्श मात्र से जीवन में सुख-समृद्धि तथा शांति आती है।

सृजन के स्वर

सृजन जन्म लेती रहती है
ख़ामोशी, अंतर्मन और तम में।
रोशनी से दूर रोशनी की ओर….
जागने की जद्दोजहद शुरू होती है।
रूह की ,
गर्भस्थ शिशु की,
कलाकार के कला की,
हीरा बनने की,
या धरा में दबे बीज की
सुन, खामोश सृजन के स्वर !!

आत्ममंथन

बहती नदी-सी ये ज़िंदगी,
कहाँ बहाए लिए जा रही है?
मौन और एकांत में,
जब पूछा दिल के दर्पण से,

हुई रू-ब-रू ख़ुद से।
मैं कौन हूँ—जगा यह सवाल,
ख़ुद को पाने की चाह,
और रूहानियत की प्यास।

रूह कानों में फुसफुसाई—
बस इतना ख़ुद में उतर जाओ,
कि ख़ुद को पा
निखर जाओ।

कठिनाइयों से मिला है ये वजूद,
छोड़ सारे मुखौटे,
रब ने जैसे भेजा,
ख़ुद को वैसा ही रहने दे।

साँसों के
इस सफ़र में
आत्मा के साथ जाना है,
सिर्फ़ कर्मों का हिसाब।

सारी कायनात और
आख़िरी ली हुई साँस
तक यही
छोड़ जाना है।

क्या तू
इससे अनजान है?
सब जानकर भी क्यों
तू बना अनजान है?


12.08.2026

अतृप्त तृष्णा

डॉ. रेखा रानी की मार्मिक कविता ‘अतृप्त तृष्णा’ अब प्रतिष्ठित ‘प्रतिज्ञान’ पत्रिका में प्रकाशित। इंसानी इच्छाओं के इस गहरे जीवन-दर्शन को Amazon Kindle पर पढ़ें।

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अत्यंत खुशी के साथ साझा कर रही हूँ!

मुझे आप सभी को यह बताते हुए बेहद खुशी हो रही है कि मेरी लिखी हुई कविता ‘अतृप्त तृष्णा’ प्रतिष्ठित ‘प्रतिज्ञान’ (Pratigyan) पत्रिका में प्रकाशित हुई है!

साहित्य की इस नई पहचान का हिस्सा बनना मेरे लिए बहुत गर्व की बात है। यह पत्रिका अब Amazon Kindle पर भी उपलब्ध है।

Atript Trishna Poem in Pratigyan Magazine

अतृप्त तृष्णा

हर इंसान आजीवन लड़ता रहता है,

नज़र न आने वाले

कई अनकहे युद्धों से-

कभी ख़ुद से,

कभी ज़माने से,

कभी लोगों से,

और कभी अपनी अतृप्त तृष्णाओं से।


यही तृष्णा

सुकून को मृगतृष्णा बना देती है,

इंसान भूल जाता है,

सफ़र-ए-ज़िंदगी कोई जंग नहीं,

बल्कि वह रूहानी सफ़र है,

जो हर अनुभव से,

हर ज़ख्म से हमें तराशता है।

ताकि हम

ख़ुद को ख़ुद से

बेहतर बना सके।

ताकि सुकून से भरे,

रौशन वजूद के साथ

जीवन के अगले मुकाम का

इस्तक़बाल कर सके।

आप सभी से अनुरोध है कि कृपया नीचे दिए गए लिंक पर जाकर किंडल (Kindle) पर पूरी पत्रिका पढ़ें और अपना प्यार एवं आशीर्वाद दें। 🙏

सधन्यवाद स्नेह,

डॉ. रेखा रानी

पलाश की कहानी

पतझड़ की धूप में, सुलगती इक इबादत है,

पलाश के सुर्ख फूलों में, रब की नजाकत है।

जमीं पर आसमानी आग, मंजर सा नजर आता है

ये जंगल की खामोशी में, कविता एक सुनाता है।

नोट – मेरा एक आर्टिकल पलाश एनडीटीवी इंडिया में पब्लिश हुआ है। उस आर्टिकल को लिखने के दौरान इकट्ठे किए गए सभी जानकारी को कंपाइल कर यह आर्टिकल लिखा गया है। शब्द सीमा होने के कारण बहुत सी जानकारियां इसमें शामिल नहीं जा सकी, जो इस आर्टिकल में लिखी गई है। आशा है, पाठक इसे भी पढ़ कर सराहेंगे।

जंगल-ज्वाला 

पलाश, जिसे ‘जंगल की आग’ (Flame of the Forest) कहा जाता है, भारतीय प्रकृति और संस्कृति का एक अटूट हिस्सा है। पलाश जंगल की सुलगती गर्मी और प्रकृति का सुर्ख पैगाम है। जब बसंत की दस्तक होती है तब कुदरत भारतीय जंगलों के कैनवास पर एक ऐसा रंग बिखेरता है जो आँखों और रूह को सुकून देती है। यह रंग है पलाश का। इसे केवल एक फूल नहीं,  टहनियों पर खिली हुई वह ‘कविता’ है जिसे तपते मौसम का गर्द भी धुंधला नहीं कर पाता।

पलाश (Butea monosperma) का खिलना महज़ एक मौसमी बदलाव नहीं, बल्कि जीवन के उस फलसफे का प्रतीक है जहाँ खाक व गर्मी से भी खूबसूरती जन्म लेती है।

पलाश का अस्तित्व: वानस्पतिक और भौगोलिक परिचय

पलाश को वानस्पतिक विज्ञान की भाषा में ब्यूटिया मोनोस्पर्मा (Butea monosperma) कहा जाता है। यह ‘फैबेसी’ (Fabaceae) परिवार का सदस्य है। इसके कई नाम इसके चरित्र की गवाही देते हैं:

ढाक: इसके पत्तों की बनावट और सघनता के कारण।

टेसू: इसके फूलों की मनमोहक  रंग व छटा के कारण।

• केसू: विशेषकर पंजाब और उत्तर भारत के क्षेत्रों में।

बनावट और संरचना

पलाश का पेड़ मध्यम ऊंचाई का होता है। इसके पत्ते त्रिपक्षीय (trifoliate) होते हैं, यानी एक ही डंठल पर तीन पत्ते। इन पत्तों के बारे में एक प्रसिद्ध मुहावरा भी है—’ढाक के तीन पात’, जो किसी चीज़ की स्थिरता या अपरिवर्तनीय स्थिति को दर्शाता है। पलाश के फूल बिना किसी खुशबू के होते हैं, लेकिन उनका गहरा केसरिया-लाल, सुर्ख रंग इतना प्रभावी होता है कि दूर से देखने पर ऐसा भ्रम होता है जैसे जंगल में आग लग गई हो। इसीलिए इसे अंग्रेज़ी में ‘Flame of the Forest’ कहा जाता है।

रूहानियत और दर्शन: पलाश की सादगी में छिपा सबक

पलाश का खिलना एक गहरा आध्यात्मिक संदेश देता है। यह फूल तब खिलता है जब पेड़ के पुराने पत्ते गिर चुके होते हैं और टहनियाँ पूरी तरह नग्न होती हैं। यह इस बात का संकेत है कि जब हम अपने पुराने अहंकार और बेकार की यादों को त्याग देते हैं, तभी हमारे भीतर ईश्वरीय प्रकाश का उदय होता है

पलाश के फूलों को देखकर ऐसा महसूस होता है जैसे प्रकृति सजदे में झुकी हुई है। इसके फूलों की बनावट पक्षी की चोंच जैसी आकाश की तरफ  होती है, जिसे ‘तोता-फूल’ भी कहा जाता है। यह बनावट हमें सिखाती है कि खूबसूरती केवल सुगंध में नहीं, बल्कि वजूद की सादगी और रंग की गहराई में भी होती है।

 सांस्कृतिक और पौराणिक महत्व 

भारतीय परंपराओं में पलाश को बहुत ऊँचा दर्जा दिया गया है। वेदों और पुराणों व प्राचीन ग्रंथों के अनुसार, पलाश को पवित्र वृक्ष माना गया है। इसकी लकड़ी का उपयोग यज्ञों और हवनों में ‘समिधा’ के रूप में किया जाता है। पलाश की लकड़ियां चंद्रमा ग्रह की शांति और अशुभ प्रभाव को दूर करने के लिए हवन में काम में लाई जाती हैं। इसके फूल और जड़ भी मुख्य रूप से चंद्रमा ग्रह की अशुभ प्रभाव को कम करने और शुक्र दोष निवारण के लिए काम मिलाया जाता है।माना जाता है कि पलाश के तीन पत्तों में त्रिदेवों – ब्रह्मा, विष्णु और महेश का वास  व सत-रज-तम का  प्रतिक  होती है।

भारतीय संस्कृति में पेड़-पौधों को हमेशा पूजनीय माना गया है। पीपल, बरगद, तुलसी की तरह पलाश का भी विशेष स्थान है।पुराणों में यह भी वर्णन मिलता है कि पलाश का वृक्ष तप, त्याग और साधना का प्रतीक है।

 ऋषि-मुनि जंगलों में पलाश के वृक्षों के नीचे बैठकर ध्यान और तपस्या किया करते थे। इसकी छाया को शांति और आध्यात्मिक ऊर्जा देने वाली माना गया है। कई कथाओं में यह उल्लेख मिलता है कि पलाश के फूल भगवान अग्नि को अत्यंत प्रिय हैं, इसलिए इसे अग्नि का प्रतीक भी कहा जाता है। इसके चमकीले लाल फूल ऊर्जा, शक्ति और जीवन के उत्साह को दर्शाते हैं। दिवासी समाज में पलाश का महत्व और भी अधिक है। 

पलाश की किवदंती : विरह की अग्नि से जन्मा वृक्ष

बहुत पुराने समय की बात है। घने जंगलों और शांत पहाड़ियों के बीच एक छोटा-सा गाँव बसा था। उस गाँव में पलासी नाम की एक युवती रहती थी। वह बहुत सुंदर थी, लेकिन उसकी सबसे बड़ी पहचान उसका सरल मन और सच्चा प्रेम था। गाँव के लोग कहते थे कि उसकी आँखों में नदी जैसी शांति और उसके चेहरे पर बसंत जैसी मुस्कान रहती थी।

पलासी एक युवक से प्रेम करती थी, जिसका नाम माधव था। माधव वीर और मेहनती युवक था। दोनों बचपन से साथ बड़े हुए थे। जंगलों में घूमना, नदी किनारे बैठकर बातें करना और पेड़ों की छाँव में सपने देखना उनकी आदत बन गई थी। पूरा गाँव जानता था कि दोनों एक-दूसरे के बिना अधूरे हैं।

लेकिन समय हमेशा एक जैसा नहीं रहता। एक दिन राज्य में युद्ध छिड़ गया और माधव को सेना के साथ जाना पड़ा। जाते समय उसने पलासी से कहा—
“मैं बहुत जल्दी लौट आऊँगा। तुम मेरा इंतज़ार करना।”

पलासी ने मुस्कुराकर सिर हिला दिया, लेकिन उसके मन में अजीब-सा डर था।

दिन बीतते गए। मौसम बदलते रहे। बरसात आई, फिर सर्दी भी गुजर गई, लेकिन माधव वापस नहीं आया। पलासी हर शाम गाँव के बाहर उस पहाड़ी पर जाकर खड़ी हो जाती, जहाँ से दूर तक रास्ता दिखाई देता था। उसे विश्वास था कि एक दिन माधव उसी रास्ते से लौटेगा।

धीरे-धीरे उसका इंतज़ार विरह में बदल गया। उसकी आँखों से आँसू बहते रहते। कहते हैं कि जहाँ उसके आँसू धरती पर गिरते, वहाँ मिट्टी लाल हो जाती थी। गाँव के बुज़ुर्ग कहते थे कि उसका प्रेम इतना गहरा था कि धरती भी उसकी पीड़ा महसूस करने लगी थी।

एक दिन खबर आई कि युद्ध में माधव वीरगति को प्राप्त हो गया। यह सुनते ही पलासी का मन टूट गया। वह उसी पहाड़ी पर चली गई, जहाँ वह रोज उसका इंतज़ार किया करती थी। आसमान में सांझ उतर रही थी। चारों ओर सन्नाटा था। पलासी ने रोते हुए आकाश की ओर देखा और कहा—

“यदि मेरा प्रेम सच्चा है, तो वह इस धरती पर हमेशा जीवित रहेगा।”

कहते हैं उसी रात तेज आँधी चली, बादल गरजे और बिजली चमकी। सुबह जब गाँव के लोग पहाड़ी पर पहुँचे, तो वहाँ पलासी नहीं थी। उसकी जगह एक नया वृक्ष उगा था। उस वृक्ष पर लाल-लाल फूल खिले थे, जो दूर से अग्नि की लपटों जैसे दिखाई देते थे।

लोगों ने कहा कि यह पलासी के विरह और प्रेम की अग्नि है, जिसने फूलों को इतना लाल रंग दिया है। उसी दिन से उस वृक्ष को “पलाश” कहा जाने लगा।

कहते हैं कि जब बसंत आता है और पलाश के फूल खिलते हैं, तब प्रकृति भी उस अधूरी प्रेम कहानी को याद करती है। जंगलों में फैले लाल फूल मानो विरह की जलती हुई स्मृतियाँ लगते हैं। हवा जब इन फूलों को छूकर गुजरती है, तो ऐसा लगता है जैसे कोई प्रेयसी अब भी अपने प्रिय को पुकार रही हो।

भारतीय लोककथाओं में पलाश को प्रेम, प्रतीक्षा और त्याग का प्रतीक माना जाता है। इसके अग्नि जैसे फूल केवल सुंदरता नहीं, बल्कि उस विरह वेदना की कहानी कहते हैं, जिसने एक साधारण प्रेमिका को अमर बना दिया।

आज भी गाँवों में बुज़ुर्ग कहते हैं कि पलाश का पेड़ केवल जंगल का वृक्ष नहीं, बल्कि एक प्रेमिका के आँसुओं से जन्मी जीवित स्मृति है। इसके फूलों का लाल रंग हमें याद दिलाता है कि सच्चा प्रेम कभी समाप्त नहीं होता, वह प्रकृति में कहीं न कहीं हमेशा जीवित रहता है।

कई जनजातियाँ इसे अपने धार्मिक और सामाजिक जीवन का हिस्सा मानती हैं। विवाह, पूजा और अन्य मांगलिक कार्यों में पलाश की शाखाओं का उपयोग किया जाता है। कुछ स्थानों पर लोग इसे सौभाग्य और समृद्धि का प्रतीक मानकर अपने घरों के पास लगाते हैं। इसके फूल, छाल और बीज आयुर्वेदिक औषधियों में भी प्रयोग किए जाते हैं। इस प्रकार पलाश केवल धार्मिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि स्वास्थ्य और जीवनोपयोगी गुणों के कारण भी महत्वपूर्ण माना जाता है।

बसंत और होली का अटूट रिश्ता

होली का त्योहार पलाश के बिना अधूरा होता है। पुराने समय में, पलाश के फूलों को उबालकर प्राकृतिक केसरिया रंग बनाया जाता था।यह प्रथा आज भी कहीं कहीं देखी जा सकती है। यह रंग न केवल त्वचा के लिए सुरक्षित है, बल्कि इसमें ठंडक भी होती है। आज के रसायनिक रंगों के दौर में, पलाश का वह ‘प्राकृतिक अक्स’ कहीं खो गया है, जिसे फिर से तलाशने की ज़रूरत है।

पलाश के औषधीय गुण: प्रकृति का  चिकित्सक

पलाश का हर हिस्सा—जड़, तना, फूल, फल और गोंद—आयुर्वेद में ‘संजीवनी’ की तरह काम करता है।

फूलों के फायदे – पलाश के फूल शीतल प्रकृति के होते हैं। इनका उपयोग शरीर की जलन, प्यास और गर्मी से संबंधित रोगों को ठीक करने के लिए किया जाता है। यदि पलाश के फूलों का अर्क आँखों में डाला जाए, तो यह दृष्टि के लिए लाभदायक माना जाता है।

पत्तों और छाल का उपयोग – पलाश के पत्तों का उपयोग सदियों से ‘पत्तल’ बनाने में होता आया है। इन पत्तलों पर भोजन करना न केवल पर्यावरण के अनुकूल है, बल्कि स्वास्थ्य के लिए भी श्रेष्ठ माना जाता है। इसकी छाल का काढ़ा पेट के कीड़ों को खत्म करने (Anthelmintic) में रामबाण सिद्ध होता है।

पलाश का गोंद (कमरकस) – पलाश के तने से निकलने वाला गोंद ‘कमरकस’ के नाम से प्रसिद्ध है। यह हड्डियों की मजबूती और मांसपेशियों के दर्द में विशेष रूप से प्रभावी होता है।

5. पर्यावरण और पलाश: एक खामोश योद्धा

  पलाश केवल सुंदर ही नहीं, बल्कि पर्यावरण का एक मज़बूत रक्षक भी है।

• मृदा संरक्षण: इसकी जड़ें मिट्टी को मज़बूती से पकड़ती हैं, जिससे मिट्टी का कटाव रुकता है।

• सूखा सहने की क्षमता: यह पेड़ बेहद कम पानी में भी जीवित रह सकता है, इसलिए इसे बंजर भूमि के पुनरुद्धार के लिए सबसे उपयुक्त माना जाता है।

• जैव विविधता: पलाश के फूल कई पक्षियों और मधुमक्खियों के लिए भोजन का मुख्य स्रोत होते हैं।

साहित्य और कला में पलाश

कवियों और लेखकों के लिए पलाश हमेशा से प्रेरणा का स्रोत रहा है। कबीर से लेकर आधुनिक कवियों तक, पलाश की ‘सुर्ख रंगत’ ने सबकी लेखनी को प्रभावित किया है।

“जंगल में जब पलाश दहकता है,

 तब ऐसा लगता है 

जैसे धरती का दिल धड़क रहा हो।”

पलाश का रंग विरह और मिलन दोनों का प्रतीक है। जहाँ यह एक ओर तपिश और त्याग को दर्शाता है, वहीं दूसरी ओर यह प्रेम की उस पराकाष्ठा को भी जाहिर करता है जो किसी के इंतज़ार में सुलग रही हो।

पलाश का संरक्षण: वक्त की माँग

आज कंक्रीट के जंगलों के बढ़ते विस्तार के कारण पलाश के असली जंगल सिमटते जा रहे हैं। हमें यह समझने की ज़रूरत है कि पलाश का विलुप्त होना केवल एक पेड़ का जाना नहीं है, बल्कि हमारी उस सांस्कृतिक विरासत और रूहानी सुकून का खो जाना है जो हमें अपनी जड़ों से जोड़ता है।

पलाश के बारे में कुछ ऐसी अनकही और दिलचस्प बातें

पलाश केवल एक दरख्त नहीं, बल्कि जंगल की वह पुरानी किताब है जिसके हर पन्ने पर कुदरत ने अपनी नजाकत और तेज दोनों लिखे हैं।

1. ‘कामदेव’ का धनुष और प्रेम का अक्स

पौराणिक कथाओं में पलाश को बहुत ही रुमानी दर्जा हासिल है। कहा जाता है कि प्रेम के देवता ‘कामदेव’ का धनुष, वह पलाश की लकड़ी से बना है। इसके सुर्ख फूलों को कामदेव के बाणों की संज्ञा दी गई है। यही वजह है कि जब पलाश खिलता है, तो हवा में एक अजीब सी खूबसूरत नशा छा जाता है, जिसे हम बसंत कहते हैं।

2. ‘ढाक के तीन पात’ का रूहानी फलसफा

हम अक्सर मुहावरे में कहते हैं—”ढाक के तीन पात”, जिसका मतलब होता है ‘हमेशा एक जैसा रहना’। लेकिन इसका एक गहरा रूहानी अर्थ भी है। पलाश के एक डंठल पर तीन पत्ते होते हैं, जिन्हें ब्रह्मा, विष्णु और महेश का रूप व सत-रज-तम का प्रतीक माना गया है। माना जाता है। यह हमें सिखाता है कि दुनिया बदलती रहे, मौसम बदलते रहें, पर इंसान को अपने वजूद और अपनी सादगी में रहना चाहिए।

3. बिना खुशबू की ‘इबादत’

दुनिया में ज्यादातर फूल अपनी खुशबू से पहचाने जाते हैं, लेकिन पलाश बे-खुशबू है। इसके बावजूद, इसकी रंगत इतनी पुर-असर है कि मीलों दूर से भी यह नजर आता है। यह एक बड़ा सबक है कि इंसान को केवल बाहरी दिखावे या ‘महक’ की जरूरत नहीं; अगर आपके भीतर की रंगत व किरदार सच्ची है, तो दुनिया आपकी तरफ खुद-ब-खुद खिंची चली आएगी।

4. बिच्छू के जहर का इलाज

कुदरत ने पलाश के भीतर सिर्फ रंग ही नहीं, इलाज भी भरी है। दिलचस्प बात यह है कि अगर किसी को बिच्छू काट ले, तो पलाश के बीजों का लेप उस जहर के असर को कम करने की ताकत रखता है। यह इस बात की दलील है कि जो चीज बाहर से आग जैसी सुलगती दिखती है, उसके भीतर मरहम भी छिपा हो सकता है।

5. ‘पक्षी की चोंच’ जैसा मंजर

अगर आप पलाश के फूल को गौर से देखें, तो इसकी बनावट किसी परिंदे (पक्षी) की चोंच जैसी लगती है। इसीलिए इसे ‘तोता-फूल’ भी कहते हैं। जब पूरा पेड़ इन फूलों से लद जाता है, तो ऐसा गुमान होता है जैसे हजारों सुर्ख परिंदे एक साथ टहनियों पर बैठकर रब की इबादत कर रहे हों।

मिट्टी का रक्षक

पलाश एक ऐसा दरख्त है जो बेहद जिद्दी और सब्र वाला है। यह ऐसी मिट्टी में भी फल-फूल जाता है जहाँ दूसरा कोई पौधा दम तोड़ दे। यह खारी मिट्टी को उपजाऊ बनाने का काम करता है। यह हमें सिखाता है कि हालात कितने ही ‘तल्ख’ या कड़वे क्यों न हों, हमें अपनी जमीन नहीं छोड़नी चाहिए।

चाँदनी रात का ‘जादू’

पलाश की एक दुर्लभ प्रजाति ‘सफेद पलाश’ भी होती है। जहाँ सुर्ख पलाश सूरज की तपिश जैसा लगता है, वहीं सफेद पलाश चाँदनी की शीतलता जैसा। आयुर्वेद और तंत्र शास्त्र (जैसे विज्ञान भैरव तंत्र में जिक्र आने वाले सूक्ष्म भाव) में सफेद पलाश को बहुत पवित्र माना गया है। यह  एकाग्रता बढ़ाने में मदद करता है।

पलाश हमें सिखाता है कि पतझड़ में सब खो देने बाद ही नया जीवन और रंग हासिल किया जा सकता है। जंगल की यह आग दरअसल एक रूहानी रोशनी कहती है।

उपसंहार: पलाश—एक मुकम्मल दास्तान

पलाश वह फूल है जो बिना किसी शोर के खिलता है और बिना किसी शिकायत के गिर जाता है। इसकी ‘फितरत’ में एक दरवेश जैसी खामोशी है। यह हमें सिखाता है कि कठिन परिस्थितियों यानि पतझड़ के बाद भी फूलों सी  मुस्कुराहट  बिखेरी जा सकती है। यदि हम पलाश को अपने जीवन में उतारें, तब हम यह समझ सकते  है।

मेरा-तेरा ! शुभ सावन

तेरा-मेरा (शुभ सावन)

ख़ुद को तराशने की कोशिश

असली फ़तह

Recognition that Inspires

Honoured to receive recognition from the Central Hindi Directorate, Government of India, for securing Third Prize in the Hindi Essay Writing Competition. A memorable milestone that inspires a deeper commitment to literature and the Hindi language.

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Certificate of Recognition - Central Hindi Directorate

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Honoured by the Government of India

Humbled and honoured to receive this certificate from the Central Hindi Directorate, Government of India, today.

Awarded for securing the Third Prize in the online Hindi Essay Writing Competition, organized on the occasion of the 65th Anniversary of the establishment of the Directorate.

“Grateful for this recognition.”

– Dr. Rekha Rani