
असली फ़तह


Honoured to receive recognition from the Central Hindi Directorate, Government of India, for securing Third Prize in the Hindi Essay Writing Competition. A memorable milestone that inspires a deeper commitment to literature and the Hindi language.

Humbled and honoured to receive this certificate from the Central Hindi Directorate, Government of India, today.
Awarded for securing the Third Prize in the online Hindi Essay Writing Competition, organized on the occasion of the 65th Anniversary of the establishment of the Directorate.
“Grateful for this recognition.”
– Dr. Rekha Rani
‘ढाक के तीन पात’ मुहावरे की उत्पत्ति से लेकर पलाश वृक्ष के पर्यावरणीय, सांस्कृतिक और आयुर्वेदिक महत्व तक—जानिए क्यों यह अद्भुत वृक्ष पथरीली जमीन में भी जीवन का संदेश देता है और भारतीय परंपरा में विशेष स्थान रखता है।
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कहां से आया ‘ढाक के तीन पात’ वाला मुहावरा, एक पौधा जो पथरीली जमीन में भी उग जाता है
✍️ डॉ. रेखा रानी

‘जंगल की ज्वाला‘ – पलाश का वृक्ष
दक्षिण एशिया और भारतीय उपमहाद्वीप के इंडो-गंगा मैदानों और वनों में पाया जाने वाला पलाश सिर्फ एक पेड़ नहीं बल्कि पर्यावरण संतुलन और पारिस्थितिक तंत्र का एक महत्वपूर्ण आधार है। पलाश, वन्य जीवों के साथ गहराई से जुड़ा है। होली के आसपास इस पर्णपाति वृक्ष के सभी पत्ते गिर जाते हैं। इसके बाद से यह केसरिया-नारंगी फूलों से ढक जाता है, तब ‘जंगल ज्वाला’ पलाश दूर से आग जैसा प्रतीत होता है। पलाश के फूलों को उबालकर प्राकृतिक केसरिया रंग बनाया जाता है। इस त्रिपर्णी ढाक वृक्ष की डंडियों में हमेशा तीन पत्ते होते। इसी से प्रसिद्ध मुहावरा, ‘ढाक के तीन पात’ बना है।
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पलाश कड़ी गर्मी, शुष्क, पथरीली और बंजर भूमि में भी सरलता से उगता और पनपता है। इसकी मजबूत, गहरी जड़ें और कठोर बनावट इसे सूखा-रोधी बनता है। इससे यह विपरीत परिस्थितियों में भी अपने आस-पास हरियाली बनाए रखता है। पलाश, परागण करने वाले जीवों के लिए एक मजबूत सपोर्ट सिस्टम है। पलाश के चटक नारंगी फूल तोते की चोंच की तरह मुड़े हुए और आकाश की ओर ऊपर उठे होते हैं, जो पक्षियों, मधुमक्खियां और तितलियों को आकर्षित कर परागण को बढ़ावा देते हैं।

तोते की चोंच की तरह मुड़े पलाश के फूल
पलाश नाइट्रोजन स्थिरीकरण कर मिट्टी की उर्वरता बढ़ाता और पोषण चक्र सुदृढ़ करता है। इससे वनों और वनस्पतियों को लाभ मिलता है।
पलाश के फूल, पत्ते और बीज अनेक वन्य जीवों के लिए भोजन का स्रोत है। पक्षी और कीट इसके रस का सेवन करते हैं, जिससे परागण बढ़ता है। छोटे वन्य जीव इसके बीजों के प्रसार में सहायता करते हैं जो पलाश के जीवन चक्र को बनाए रखता है। यह तालमेल वन विविधता के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
पलाश, पर्यावरण संरक्षण के साथ वनों के सतत विकास के लिए भी उपयोगी है। अंतरराष्ट्रीय शोध में इसे नाइट्रोजन फिक्सिंग वृक्ष, पोलिनेटर सपोर्टिंग स्पीशीज और ड्राई फॉरेस्ट रेस्टोरेशन प्लांट माना गया है। भारतीय मान्यता के अनुसार पलाश रेन इंडिकेटर वृक्ष है।
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पलाश के शुभ त्रिपत्रों को ब्रह्मा-विष्णु-महेश या सत-रज-तम का प्रतीक माना गया है। संस्कृत ग्रंथ इसे अग्नि ऊर्जा और पुनर्जन्म का प्रतीक मानते हैं। इसकी सूखी लकड़ियां यज्ञ और पुष्प लक्ष्मी प्राप्ति के लिए उपयोग में लाया जाता है। आयुर्वेद में पलाश के फूल, जड़ें, गोंद, पत्तियां और बीज कई रोगों के उपचार में इस्तेमाल की जाती हैं।
लोक कथा के मुताबिक किसी प्रेयसी के विरह-अश्रु से पलाश का जन्म हुआ। जिसकी विरह ज्वाला से इसके फूल अग्नि-रंग के हो गए। महाकवि कालिदास और जयदेव की रचनाओं में पलाश को प्रेम और विरह का प्रतीक बताया गया है। पलाश जैसे प्रतिष्ठित वृक्ष को अध्यात्म और आयुर्वेद, ज्ञान और मन-शरीर संतुलन से जोड़ते हैं। इस तरह की मान्यताएं पेड़ों का संरक्षण प्रदान करती हैं। पलाश वन्य-जीव और प्रकृति के बीच संतुलन की मजबूत कड़ी है। यह वृक्ष हमें सिखाता है- प्रकृति का हर तत्व ब्रह्मांड संतुलन का अनिवार्य हिस्सा है।
(मेरी नवीनतम कविता संकलन पुस्तक “अनकहे युद्ध अनसुने शब्द” में प्रकाशित)
कहते हैं, होते है पुरुष स्वच्छंद मनमौज।
क्या नहीं दिखता मुस्कान के पीछे परेशानियां का सोज़?
उसके कांधों पर ज़िम्मेदारी का बोझ?
बचपन से मजबूत बनो, रोना नहीं की सोंच?
इन अनकहे युद्ध से वह बिन हथियार लड़ता रोज़।
कहते हैं, होती है नारी, कठपुतली नाजुक, मौन।
क्या नहीं दिखता शांत, मुस्कान के पीछे छिपा जीवन का बोझ?
अपना नाम, घर छोड़ करती रहती अपनी खोज।
बचपन से सीख ख्वाहिशों, लफ्जों को दफ्न करने की सोंच,
उसके अनकहे-अनसुने शब्द देते उसे दर्द, घुटन जानसोज़।
दिखे ना दिखे, दोनों के ज़ख्मों के
निशां रूह पर पड़ते रहते हर रोज।
चाहिए सभी को इन बेडियों से आजादी,
खुलकर जीने, अपने बातों को कहने का हौसला,
एहसासों की अभिव्यक्ति मुक्त पंखों से उड़ान भरने के अरमान ।
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कहते हैं, होते है पुरुष स्वच्छंद मनमौज।
क्या नहीं दिखता मुस्कान के पीछे परेशानियां का सोज़?
उसके कांधों पर ज़िम्मेदारी का बोझ?
इन अनकहे युद्ध से वह बिन हथियार लड़ता रोज़।
कहते हैं, होती है नारी, कठपुतली नाजुक, मौन।
क्या नहीं दिखता शांत, मुस्कान के पीछे जीवन का बोझ?
अपना नाम, घर छोड़ करती रहती अपनी खोज।
बचपन से सीख ख्वाहिशों, लफ्जों को दफ्न करने की सोंच,
उसके अनकहे-अनसुने शब्द देते उसे दर्द, घुटन जानसोज़।
दिखे ना दिखे, दोनों के ज़ख्मों के
निशां रूह पर पड़ते रहते हर रोज।
चाहिए सभी को इन बेडियों से आजादी,
खुलकर जीने, अपने बातों को कहने का हौसला,
एहसासों की अभिव्यक्ति मुक्त पंखों से उड़ने भरने के अरमान ।


बचपन में गर्मियों की छुट्टियों में अक्सर हम अपने ननिहाल जाते थे। बरसों बीत गए, पर कुछ खास यादें आज भी ताज़ी हैं। मेरे ननिहाल, में एक अद्भुत छोटा-सा छुपा कमरा था, जिसकी नीची छत को हाथ बढ़ाकर छु सकते थें। उसका दरवाज़ा बाहर से काठ की अलमारी जैसा दिखता था। काली लकड़ी के चौड़े पल्ले खोलते ही नीचे उतरने के लिए सीढ़ियाँ थीं, जहाँ झुककर अंदर जाना पड़ता था। वह कमरा मुझे रहस्यमय और जादुई लगता था, मानो किसी काल्पनिक कहानी का हिस्सा हो।
दरअसल, वह अपनी तरह का एक अनोखा पुस्तकालय था। उसमें रखी कई पुस्तकें समय की मार से पीली और जीर्ण-शीर्ण हो चुकी थीं। कुछ पर धूल की मोटी परत जमी रहती थी। उन पुस्तकों में से कभी-कभी कोई अनोखी किताब मिल जाती। धूल झाड़कर उसे खोलते ही एक अलग-सी गंध आती थी। फिर उसी कमरे के किसी कोने में या लकड़ी की सीढ़ी पर बैठकर किताब पढ़ने में घंटों कैसे बीत जाते, पता ही नहीं चलता था।
यह कमरा घर के गैरेज के ऊपर बना था। उसकी एकमात्र खिड़की सड़क की ओर खुलती थी। उस ज़माने में नानी से रोज़ पाँच पैसे पॉकेट मनी मिलती थी, तब उन संकरी गलियों में पाँच पैसे में बहुत कुछ खरीदा जा सकता था। कभी चीनी की मिठाई, कभी बुढ़िया के गुलाबी बाल। किताबें पढ़ते-पढ़ते खिड़की से खरीदे गए चटपटे पाचक या टॉफियाँ खाने का अपना ही आनंद था।
एक दिन, मुट्ठी में चटपटे पाचक छुपाए मैं उसी पुस्तकालय की ओर जा रही थी। ऊँची पत्थर की सीढ़ियाँ चढ़कर एक छोटे से प्लेटफ़ॉर्म पर पहुँची ही थी कि ऊपर से नन्हा दीपू तेज़ी से सीढ़ियाँ उतरता दिखाई दिया।
ननिहाल में मेरे भाइयों को इस तरह दौड़ते-भागते देखना कोई नई बात नहीं थी। सभी को पतंग उड़ाने का ऐसा शौक था कि कटती पतंग के पीछे गलियों में दौड़ पड़ते या नई पतंग खरीदने भाग जाते। पर उस दिन दीपू की रफ़्तार कुछ ज़्यादा ही थी। मुझे लगा कहीं वह मुझसे टकरा न जाए। मैंने झट से उसकी बाँह पकड़ ली।
वह चश्मे के भीतर से अपनी बड़ी-बड़ी आँखों से मुझे देखने लगा। फिर मुस्कुराकर बोला, “मैं नीचे जा रहा था। मेरी गीली चप्पलों से मेरा पैर फिसल गया था। आपने पकड़कर रोक लिया, नहीं तो मैं सीढ़ियों से लुढ़ककर नीचे गिर जाता।”
हम दोनों ने एक-दूसरे को देखा और खिलखिलाकर हँस पड़े। शायद यही बचपन का वह दुधिया भोलापन था, जिसमें आने वाले खतरे की चिंता नहीं होती, केवल वर्तमान का आनंद होता है।
मृत कल और अजन्मे कल का भय क्यों?
गर मौजूदा पल मीठा और मधुर हो।
Dead yesterdays and unborn tomorrows,
why fret about it, if today is sweet.”
― Omar Khayyâm
कोई अपनी ही नजर से तो हमें देखेगा,
एक कतरे को समुद्र नजर आए कैसे
~~वसीम बरेलवी


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