33 उत्कृष्ट रचनाकारों और 95 बेहतरीन कविताओं से सजा नया काव्य-संग्रह “कतरा-कतरा ज़िंदगी का” (मुख्य संपादिका: डॉ. रेखा रानी, सह-संपादक: आशीष कुमार ‘शैंकी’) अब NotionPress पर उपलब्ध है। जीवन के अनछुए एहसासों को महसूस करने के लिए आज ही अपनी प्रति ऑर्डर करें!

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कतरा-कतरा ज़िंदगी का - डॉ. रेखा रानी

🌟 नई पुस्तक 🌟

‘कतरा-कतरा ज़िंदगी का – दिल के अनछुए कोने’

ज़िंदगी केवल साँसों के चलने और समय के गुज़रने का नाम नहीं है। यह अनगिनत अनुभवों, अनकही भावनाओं, टूटते-बनते रिश्तों, संघर्षों, स्मृतियों और उम्मीदों से बुनी हुई एक खूबसूरत यात्रा है। इसी यात्रा के अनछुए एहसासों को शब्दों में पिरोकर हम आपके लिए लाए हैं हमारी नई काव्य-प्रस्तुति— “कतरा-कतरा ज़िंदगी का”।

📖 पुस्तक एक नज़र में

  • 📌 पुस्तक का नाम: कतरा-कतरा ज़िंदगी का
  • 📌 उप-शीर्षक: दिल के अनछुए कोने
  • 🖋️ मुख्य संपादिका: डॉ. रेखा रानी
  • 🖋️ सह-संपादक: आशीष कुमार (‘शैंकी’)
  • 📚 विधा (Genre): कविता (Poetry Anthology)
  • 📖 प्रारूप (Format): पेपरबैक (Paperback)
  • ✨ कुल रचनाएँ: 95 कविताएँ
  • 👥 सह-लेखक: 33 उत्कृष्ट रचनाकार

✨ पुस्तक के बारे में

ज़िंदगी एक पूरी कहानी नहीं, बल्कि अनगिनत अनुभवों, अनकहे एहसासों, अधूरे ख़्वाबों और बिखरी स्मृतियों का संगम है। कभी रिश्तों की गर्माहट सुकून देती है, तो कभी अपनों की बेरुख़ी ख़ामोशी छोड़ जाती है। प्रेम, विरह, संघर्ष और उम्मीद—इन्हीं से जीवन के रंग बनते हैं।

‘कतरा-कतरा ज़िंदगी का’ 33 रचनाकारों का एक बहुरंगी काव्य-संकलन है, जिसमें 95 कविताएँ जीवन को अनेक दृष्टिकोणों से देखने और महसूस करने का अवसर देती हैं।

इन रचनाओं में प्रेम और समर्पण, रिश्तों की जटिलता, अकेलापन, स्मृतियाँ और आत्ममंथन हैं। कहीं माँ का स्नेह और पिता की छाया है, तो कहीं स्त्री-संघर्ष, सामाजिक यथार्थ और मानवीय संवेदनाएँ। आध्यात्मिकता, भक्ति, प्रकृति, विश्वास, जीवन-दर्शन और आशा के स्वर भी इस संग्रह को समृद्ध बनाते हैं।

‘कतरा-कतरा ज़िंदगी का’ — हर क़तरे में एक एहसास, हर एहसास में एक कहानी!

✍️ संपादकीय दृष्टि और हमारे 33 रचनाकार

एक उत्कृष्ट काव्य-संग्रह कभी भी किसी एक व्यक्ति के विचारों तक सीमित नहीं होता, बल्कि यह कई भिन्न-भिन्न हृदयों, अनुभवों और जीवन-दृष्टियों का एक खूबसूरत संगम होता है।

इस संपूर्ण रचना-क्रम को एक सूत्र में पिरोने का भगीरथ प्रयास मुख्य संपादिका डॉ. रेखा रानी और सह-संपादक आशीष कुमार द्वारा किया गया है। डॉ. रेखा रानी जहाँ अपने 15 से अधिक प्रकाशित उपन्यासों, मनोविज्ञान और बाल-परामर्श के अथाह अनुभवों के साथ इसे एक परिपक्व दृष्टि प्रदान करती हैं, वहीं आशीष कुमार की दार्शनिक सोच और यथार्थवादी लेखनी इसे एक नई ऊर्जा देती है।

इस पुस्तक को जिन उत्कृष्ट और विविधतापूर्ण रचनाकारों ने सजाया है, वे इस प्रकार हैं:

विजय वर्मा, तनुश्री, डॉ. नमिता श्रीवास्तव, नम्रता सोनी, सुभाष चंद्र मेहता, ज्योति जिन्दल, प्रतिमा सिन्हा, चाँदनी सहाय, अपूर्वा कानिटकर, हरिणा पंड्या, श्रेया, राजनीता प्रसाद, उर्मी, राही विनायक करंजे, बबीता सिन्हा, सच्चिदानंद ‘ॐ पथिक’, मनीषा, रवींद्र नैय्यर, डॉ. कल्याणलक्ष्मी चित्ता, अपर्णा जे., वैष्णवी, मनीष खरे, निम्मी बत्ता, दिग्विजय शुक्ल, दिनेश गुप्ता, निर्मला मुकुंद महाजन, डॉ. कविता कुमारी, विजयंत कुमार सिन्हा, तनुश्री डी. घोष (‘तरुछाया’), डॉ. राजीव कुमार मिश्रा, और श्वेता प्रभा।

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आइए, इन कविताओं में जीवन के कुछ क़तरों को महसूस करें—शायद इनमें आपको अपनी कहानी, अपना एहसास या मन की अनकही आवाज़ मिल जाए।

पेपरबैक (Paperback) मूल्य: ₹399 + ₹50 (डिलीवरी)


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(नोट: यह पुस्तक बहुत जल्द Amazon, Flipkart और अंतर्राष्ट्रीय पाठकों के लिए Walmart सहित 150+ देशों में भी उपलब्ध होगी।)

अगर आपको यह काव्य-संग्रह पसंद आए, तो कृपया अपना रिव्यू (Review) और रेटिंग (Rating) देना न भूलें। आपके विचार हमारे रचनाकारों के लिए बहुत मायने रखते हैं! ❤️

गुल्लक – कहानियों की

बच्चों के लिए डॉ. रेखा रानी की नई किताब ‘गुल्लक – कहानियों की’ अब Amazon पर उपलब्ध है! 4 मज़ेदार कहानियों, जादू और अच्छी सीख से भरी यह किताब 6 से 10 साल के बच्चों के लिए एक बेहतरीन उपहार है।

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गुल्लक - कहानियों की (डॉ. रेखा रानी)

🎉 खुशखबरी! 🎉

बच्चों के लिए एक बेहद खूबसूरत और सीख देने वाली किताब अब Amazon पर आ गई है! 📚

“गुल्लक – कहानियों की”

✍️ लेखिका: डॉ. रेखा रानी

इस किताब में 4 प्यारी और मज़ेदार कहानियाँ हैं:

  • ⏱️ 1. कबीर के मन की जादू वाली घड़ी
  • 🦋 2. तितलियों के देश में
  • 💖 3. मेरी माँ
  • 🦁 4. जंगल ओलंपिक

बच्चों को इस किताब में क्या मिलेगा?

✨ जादू, रोमांच और ढेर सारी मस्ती

💖 परिवार और अपनों के लिए प्यार

🦋 प्रकृति और नन्हे जीवों के प्रति दया

💪 खुद पर भरोसा रखने और मेहनत करने की सीख

यह किताब 6 से 10 साल के बच्चों के पढ़ने के लिए एक प्यारा संग्रह है। यह आपके बच्चों के लिए एक बेहतरीन उपहार है।

अपने बच्चों को कल्पना और खुशियों की इस ‘गुल्लक’ के साथ एक नई दुनिया की सैर कराएं! 🌟



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राहुल गांधी के अधूरे ज्ञान से देश परेशान

क्या राहुल गांधी ने वास्तव में मनुस्मृति को पूरा पढ़ा और समझा है? या यह केवल एक पूर्वनिर्धारित राजनीतिक रणनीति है? द डोज़ियर (The Dossier) में प्रकाशित डॉ. रेखा रानी का यह बेबाक लेख राहुल गांधी के अधूरे ज्ञान और चयनात्मक राजनीति की पोल खोलता है।

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राजनीति / विचार

राहुल गांधी के अधूरे ज्ञान से देश परेशान

लेखिका: डॉ. रेखा रानी | प्रकाशित: 15 अक्टूबर, 2026 | मूल स्रोत: The Dossier (Hindi)

राहुल गांधी और मनुस्मृति - रेखा रानी का लेख
Image: The Dossier

22 अगस्त, 2026 को छात्रों की गहमागहमी के बीच राहुल गांधी ने मनुस्मृति के एक श्लोक के आधार कर पूरे हिंदू धर्म को पितृसत्तात्मक और महिला-विरोधी रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश की। यह अफसोस की बात है दुनिया के प्राचीनतम और सहिष्णुतम सनातन धर्म को नकारात्मक ढंग से चित्रित किया गया। क्या किसी धर्म और उसकी हजारों वर्ष पुरानी परंपरा का मूल्यांकन इस तरह एकपक्षीय ढंग से किया जाना उचित है? इस कार्यक्रम की आड़ में प्राचीन धार्मिक ग्रंथ मनुस्मृति को कटघरे में खड़ा करना अधूरे ज्ञान और चयनित राजनीति का उदाहरण है।

“क्या राहुल गांधी ने मनुस्मृति वास्तव में पूरा पढ़ा और समझा है? जिसके आधार पर वे सनातन के धार्मिक-सांस्कृति परंपरा पर टिप्पणी कर रहे हैं?”

उनका उद्देश्य क्या है? वास्तव में राहुल गांधी ने मनुस्मृति पर आपत्तिजनक टिप्पणी की। इसे महिलाओं की स्वतंत्रता के विरुद्ध बताया। परंतु उसी मनुस्मृति में महिलाओं के सम्मान को लेकर कहा गया है—

“यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः.
यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः॥”

(जहां नारियों का सम्मान होता है, वहां देवता निवास करते हैं; और जहां उनका सम्मान नहीं होता, वहां किए गए सभी शुभ कर्म निष्फल हो जाते हैं।)

महात्मा गांधी के विचार और ऐतिहासिक संदर्भ

यहां यह चर्चा भी महत्वपूर्ण है कि दुनिया में शायद ही किसी अन्य धर्म में देवताओं के साथ-साथ इतनी देवियां पूजी जाती हैं, जितना सनातन धर्म में। महिलाओं की स्वतंत्रता और गरिमा का विचार सनातन धर्म के मूल में है।

स्वयं महात्मा गांधी मनुस्मृति के उपलब्ध पाठ के अंतर्विरोध और बाद में जोड़ी गई सामग्री की संभावना पर प्रश्न उठा चुके हैं। वे कह चुके हैं कि जब किसी के पास इसकी मूल प्रति उपलब्ध नहीं है, तब आज मनुस्मृति के किसी एक श्लोक को अंतिम और निर्विवाद सत्य मानकर प्रस्तुत करने से पहले क्या उसके पाठ-इतिहास और विभिन्न पांडुलिपियों की जानकारी लेना आवश्यक नहीं है?

महात्मा गांधी ने 4 मई 1928 को पी. टी. पिल्लै को लिखे पत्र में लिखा था (संपूर्ण गांधी वाङ्मय, खंड 26, पृष्ठ 348) – “मनुस्मृति में बहुत कुछ प्रशंसनीय है, जबकि उसके वर्तमान स्वरूप में कुछ बातें ऐसी हैं जिन्हें स्वीकार नहीं किया जा सकता।”

चयनित राजनीति और संवाद की भाषा

चर्चा से पहले ज्ञान आवश्यक है। राहुल गांधी ने विवादित बात कही। अतः उन्हें स्रोत और प्रमाण को सार्वजनिक करना चाहिए। राहुल गांधी को बताना चाहिए कि उन्होंने मूल संस्कृत अथवा अनुवाद कौन-सा संस्करण पढ़ा। क्या उन्हें मनुस्मृति की विभिन्न पांडुलिपियों और उसके ऐतिहासिक विकास की जानकारी है?

क्या राहुल गांधी नहीं जानते धर्म और धार्मिक ग्रंथ चर्चा अत्यंत संवेदनशील विषय हैं? प्राचीन मनुस्मृति को उसके ऐतिहासिक संदर्भ से काटकर, केवल चुनिंदा अंशों के आधार पर प्रस्तुत करना समाज में अनावश्यक विवाद और असहजता पैदा कर सकता है। यहां राहुल गांधी पर यह मुहावरा बिल्कुल सही बैठता है – ‘अध जल गगरी छलकत जाए।’

कार्यक्रम मुख्यतः छात्राओं से संवाद था। राहुल गांधी ने अपनी बात अंग्रेजी में रखी। जब विषय भारतीय समाज, धर्म, महिलाओं और युवाओं के जीवन से जुड़ा हो, तब ऐसी भाषा चुनना उचित होता, जिसे देश की बड़ी आबादी सहजता से समझ सके। ऐसे संवेदनशील विषय पर संवाद हिंदी और स्थानीय भारतीय भाषाओं में अधिक व्यापक हो सकता था।

समान महिला अधिकार और दोहरे मापदंड

भारत में आज भी मुस्लिम समुदाय में कुछ व्यक्तिगत और पारिवारिक मामलों में शरीयत लागू है, जिसके अंतर्गत विवाह, तलाक, भरण-पोषण आदि का उल्लेख है। भारत सरकार ने तीन तलाक पर कानूनी सुधार, हज में मेहरम की अनिवार्यता हटाना जैसे महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं।

तो फिर प्रश्न स्वाभाविक है — यदि उद्देश्य महिलाओं की स्वतंत्रता, समानता और गरिमा की रक्षा करना है, तो इन वास्तविक और वर्तमान कानूनी-सामाजिक प्रश्नों पर भी समान गंभीरता से चर्चा क्यों नहीं होनी चाहिए? राहुल गांधी ने महिला सशक्तीकरण से जुड़े इन महत्वपूर्ण विषयों को छोड़कर मनुस्मृति को ही आलोचना का केंद्र क्यों बनाया?

राहुल ने महिला सशक्तीकरण की कसौटी सबके लिए समान क्यों नहीं रखी? स्पष्ट है कि राहुल गांधी सुधारात्मक नहीं, आलोचना राजनीति कर रहे हैं। वे सभी समुदायों के महिलाओं के अधिकारों के लिए समान रूप से मुखर नहीं हैं।

मनुस्मृति और वैश्विक दृष्टिकोण

मनुस्मृति पर पश्चिमी विद्वानों और लेखकों की हमेशा गंभीर रुचि रही है:

  • फ्रेडरिक नीत्शे (जर्मन दार्शनिक): “बाइबिल को बंद करो और मनुस्मृति को खोलो। मनुस्मृति का दृष्टिकोण बेहद स्वस्थ, विस्तृत और जीवन को सकारात्मक रूप से स्वीकार करने वाला है।”
  • सर विलियम जोन्स (ब्रिटिश कानूनविद): “मनुस्मृति एक अत्यंत प्राचीन, व्यापक और अद्भुत कानूनी तथा सामाजिक ग्रंथ है।”
  • मॉरिस मेटरलिंक (नोबेल विजेता): “मनुस्मृति में दी गई ब्रह्मांड की उत्पत्ति और आत्मा की विकासवादी यात्रा के विचार आधुनिक विज्ञान की खोजों से बहुत मेल खाते हैं।”

निष्कर्ष: विपक्ष की जिम्मेदारी

देश को विभाजित करने की राजनीति आज के भारत को स्वीकार्य नहीं है। राहुल गांधी नेता प्रतिपक्ष के संवैधानिक पद पर हैं। उनका परिवार लंबे समय से राजनीति से जुड़ा रहा है, इसलिए उनके वक्तव्यों की जिम्मेदारी और भी अधिक है।

विपक्ष का काम केवल सरकार का विरोध कर देश में अनावश्यक अशांति व भ्रम फैलाने का नहीं है। किसी भी राष्ट्र को मजबूत बनाए रखने के लिए भीतर की चुनौतियों से निपटना उतना ही जरूरी है जितना सीमाओं की रक्षा करना। देश की आंतरिक सुरक्षा बाहरी सुरक्षा जितनी ही महत्वपूर्ण है।

🖋️

डॉ. रेखा रानी

लेखिका, परामर्शदाता और पूर्व प्रोफेसर हैं। इनके लेख विभिन्न प्रतिष्ठित राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से प्रकाशित होते रहते हैं।

मैं से मुक्त

कमी

ख़ुद को बक्श दे

सांचो में ढलना

पितृपक्ष

कहते हैं, अंगूठे से पितृ-तीर्थ अर्पित जल
पितरों को तृप्ति और शांति देगा,
नैऋत्य कोण व पीपल तले, तैलदीप
उनका मार्ग प्रकाशित-प्रशस्त करेगा।

यह उन पहुँचा या नहीं,
यह बताने वाला कोई नहीं,
पर यह अद्भुत, ख़ूबसूरत परंपरा आध्यात्म,
विज्ञान या मनोविज्ञान जो भी है,
रूह और दिल को सुकून ज़रूर देती है।
ॐ पितृदेवाय नमः!!

“गुल्लक कहानियों की” मेरी नई बाल कथा किताब पार्थ प्रकाशन द्वारा

बचपन केवल उम्र का एक पड़ाव नहीं,
यह कल्पनाओं, सीखने, समझने, जिज्ञासाओं, सपनों और अनगिनत छोटी-छोटी खुशियों की दुनिया है।

इसी खूबसूरत दुनिया को शब्दों, बाल-मनोविज्ञान, कल्पना और थोड़े-से जादू के साथ पिरोती मेरी नई बाल-पुस्तक जल्द ही पार्थ प्रकाशन से प्रकाशित होने जा रही है।

यह पुस्तक मेरे दिल के बहुत करीब है क्योंकि बच्चों के लिए लिखना मुझे बेहद पसंद है। यह किताब बच्चों के लिए कहानियों का संग्रह भर नहीं, बल्कि उनके मन की उस मासूम दुनिया तक पहुँचने का एक छोटा-सा प्रयास है—जहाँ हर कहानी कुछ कहती है, कुछ सिखाती है और कल्पना के नए दरवाज़े खोलती है।

इन कहानियों में है—
बचपन की मासूमियत
कल्पना की उड़ान

मनोविज्ञान की सहज समझ
जीवन के छोटे-छोटे मूल्य
और थोड़ा-सा जादू…

मेरे लिए यह पुस्तक सिर्फ एक प्रकाशन नहीं, बल्कि मेरे मन के बेहद करीब एक रचनात्मक सफ़र है।