एहसासो की अभिव्यक्ति

(मेरी नवीनतम कविता संकलन पुस्तक “अनकहे युद्ध अनसुने शब्द” में प्रकाशित)

कहते हैं, होते है पुरुष स्वच्छंद मनमौज। 

क्या नहीं दिखता मुस्कान के पीछे परेशानियां का सोज़?

 उसके कांधों पर ज़िम्मेदारी का  बोझ?

बचपन से मजबूत बनो, रोना नहीं की सोंच?

 इन अनकहे युद्ध से वह बिन हथियार लड़ता रोज़। 

 कहते हैं, होती है नारी, कठपुतली नाजुक, मौन।

 क्या नहीं दिखता शांत, मुस्कान के पीछे छिपा जीवन का  बोझ? 

अपना नाम, घर छोड़  करती रहती अपनी  खोज।

 बचपन से सीख ख्वाहिशों,  लफ्जों को दफ्न करने की सोंच,

 उसके अनकहे-अनसुने शब्द देते उसे दर्द, घुटन जानसोज़।

दिखे ना दिखे, दोनों के ज़ख्मों के 
निशां रूह पर पड़ते  रहते हर रोज।

 चाहिए  सभी को  इन  बेडियों से आजादी,  

खुलकर  जीने, अपने बातों को कहने का हौसला,

 एहसासों की अभिव्यक्ति  मुक्त पंखों से उड़ान भरने के अरमान ।

-/:;(;/

कहते हैं, होते है पुरुष स्वच्छंद मनमौज।

क्या नहीं दिखता मुस्कान के पीछे परेशानियां का सोज़?

उसके कांधों पर ज़िम्मेदारी का बोझ?

इन अनकहे युद्ध से वह बिन हथियार लड़ता रोज़।

कहते हैं, होती है नारी, कठपुतली नाजुक, मौन।

क्या नहीं दिखता शांत, मुस्कान के पीछे जीवन का बोझ?

अपना नाम, घर छोड़ करती रहती अपनी खोज।

बचपन से सीख ख्वाहिशों, लफ्जों को दफ्न करने की सोंच,

उसके अनकहे-अनसुने शब्द देते उसे दर्द, घुटन जानसोज़।

दिखे ना दिखे, दोनों के ज़ख्मों के
निशां रूह पर पड़ते रहते हर रोज।

चाहिए सभी को इन बेडियों से आजादी,

खुलकर जीने, अपने बातों को कहने का हौसला,

एहसासों की अभिव्यक्ति मुक्त पंखों से उड़ने भरने के अरमान ।

बे-क़द्र

बानगी

बचपन की सुनहरी यादें!

बचपन में गर्मियों की छुट्टियों में अक्सर हम अपने ननिहाल जाते थे। बरसों बीत गए, पर कुछ खास यादें आज भी ताज़ी हैं।  मेरे ननिहाल,  में एक अद्भुत छोटा-सा छुपा कमरा था, जिसकी नीची छत को हाथ बढ़ाकर छु सकते थें। उसका दरवाज़ा बाहर से काठ की अलमारी जैसा दिखता था। काली लकड़ी के चौड़े पल्ले खोलते ही नीचे उतरने के लिए सीढ़ियाँ थीं, जहाँ झुककर अंदर जाना पड़ता था। वह कमरा मुझे रहस्यमय और जादुई लगता था, मानो किसी काल्पनिक कहानी का हिस्सा हो।

दरअसल, वह अपनी तरह का एक अनोखा पुस्तकालय था। उसमें रखी कई पुस्तकें समय की मार से पीली और जीर्ण-शीर्ण हो चुकी थीं। कुछ पर धूल की मोटी परत जमी रहती थी। उन पुस्तकों में से कभी-कभी कोई अनोखी किताब मिल जाती। धूल झाड़कर उसे खोलते ही एक अलग-सी गंध आती थी। फिर उसी कमरे के किसी कोने में या लकड़ी की सीढ़ी पर बैठकर किताब पढ़ने में घंटों कैसे बीत जाते, पता ही नहीं चलता था।

यह कमरा घर के गैरेज के ऊपर बना था। उसकी एकमात्र खिड़की सड़क की ओर खुलती थी। उस ज़माने में नानी से रोज़ पाँच पैसे पॉकेट मनी मिलती थी, तब उन संकरी गलियों में पाँच पैसे में बहुत कुछ खरीदा जा सकता था। कभी चीनी की मिठाई, कभी बुढ़िया के गुलाबी बाल। किताबें पढ़ते-पढ़ते खिड़की से खरीदे गए चटपटे पाचक या टॉफियाँ खाने का अपना ही आनंद था।

एक दिन, मुट्ठी में चटपटे पाचक छुपाए मैं उसी पुस्तकालय की ओर जा रही थी। ऊँची पत्थर की सीढ़ियाँ चढ़कर एक छोटे से प्लेटफ़ॉर्म पर पहुँची ही थी कि ऊपर से नन्हा दीपू तेज़ी से सीढ़ियाँ उतरता दिखाई दिया।

ननिहाल में मेरे भाइयों को इस तरह दौड़ते-भागते देखना कोई नई बात नहीं थी। सभी को पतंग उड़ाने का ऐसा शौक था कि कटती पतंग के पीछे गलियों में दौड़ पड़ते या नई पतंग खरीदने भाग जाते। पर उस दिन दीपू की रफ़्तार कुछ ज़्यादा ही थी। मुझे लगा कहीं वह मुझसे टकरा न जाए। मैंने झट से उसकी बाँह पकड़ ली।

वह चश्मे के भीतर से अपनी बड़ी-बड़ी आँखों से मुझे देखने लगा। फिर मुस्कुराकर बोला, “मैं नीचे जा रहा था। मेरी गीली चप्पलों से मेरा पैर फिसल गया था। आपने पकड़कर रोक लिया, नहीं तो मैं सीढ़ियों से लुढ़ककर नीचे गिर जाता।”

हम दोनों ने एक-दूसरे को देखा और खिलखिलाकर हँस पड़े। शायद यही बचपन का वह दुधिया भोलापन था, जिसमें आने वाले खतरे की चिंता नहीं होती, केवल वर्तमान का आनंद होता है। 

मृत कल और अजन्मे कल का भय क्यों?

गर मौजूदा पल मीठा और मधुर हो। 

Dead yesterdays and unborn tomorrows, 

why fret about it, if today is sweet.”

― Omar Khayyâm

नज़र

कोई अपनी ही नजर से तो हमें देखेगा,

एक कतरे को समुद्र नजर आए कैसे

~~वसीम बरेलवी

मनचाह-अनचाहा

गुज़रे कल की चोटें

ख़ुद को दमका

गुज़रे कल की चोट

नार्सिसिस्ट

प्रेम करना, दर्द महसूस करना
है इंसानी स्वभाव।
पर अगर कोई
चोट देकर, चोट लगने का अभिनय करे
किसी का दर्द जानकर
भी उसे दर्द दे,
आँसू देखकर भी महसूस न करे,
यह बीमार नार्सिसिस्ट की निशानी है।
इंसानी फितरत का वह स्याह पहलू, जहाँ वह खुद को खुदा मान बैठता है।