सुनहरा अवसर!

सभी कवियों और रचनाकारों के लिए सुनहरा अवसर! डॉ. रेखा रानी सहाय की आगामी पुस्तक “कतरा-कतरा ज़िंदगी का” में अपनी उत्कृष्ट कविता निःशुल्क प्रकाशित करवाएं। अपने शब्दों को दें एक नया और प्रतिष्ठित मंच।

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सुनहरा अवसर - कतरा-कतरा ज़िंदगी का

📢 सुनहरा अवसर!

सभी रचनाकारों और कवियों के लिए…

हर इंसान के दिल में एक कोना ऐसा होता है, जहाँ कुछ यादें, कुछ जज़्बात और कुछ अनकही कहानियाँ छिप कर रहती हैं। हम उन्हीं एहसासों को एक किताब में पिरोने जा रहे हैं।

हमारी आगामी पुस्तक

“कतरा-कतरा ज़िंदगी का”

में अपनी कविता प्रकाशित करवाएं!

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    यह एक निःशुल्क (Free) साहित्यिक पहल है।
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    आपके शब्दों को एक नया और प्रतिष्ठित मंच मिलेगा।
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    देश के बेहतरीन रचनाकारों के साथ आपकी कविता भी प्रकाशित होगी!

“अपनी कलम उठाईए… अपने दिल के अनछुए कोनों को पन्नों पर उतरने दीजिए…” 🖋️❤️

अपनी एक उत्कृष्ट कविता और अपना संक्षिप्त परिचय हमें यहाँ भेजें:


✉️ rekharanisahay@gmail.com

🗓️ अंतिम तिथि:
30 अक्टूबर!

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मगरपट्टा सिटी भजन संध्या

गणपति उत्सव के पावन अवसर पर हमारी सीनियर सिटीजन महिला समूह द्वारा प्रस्तुत एक सुमधुर भजन संध्या। इस विशेष प्रस्तुति में मराठी, संस्कृत, हिंदी और तमिल भाषाओं में गाए गए भजनों का आनंद लें।

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🌸 गणपति उत्सव की हार्दिक शुभकामनाएँ! 🌸

इस भजन संध्या में हमारी महिला समूह ने दर्शकों के समक्ष मराठी, संस्कृत, हिंदी, और तमिल— चार भाषाओं में भजन प्रस्तुत किया ।

🙏 विशेष मार्गदर्शन: इस समूह में हमारी गुरु Kalyani Gurumurthy जी का विशेष मार्गदर्शन और आशीर्वाद हमें प्राप्त है।

🎤 इस प्रस्तुति में भाग लिया था

1. Aparna Mahesh
2. Chandraprabha Kaushal
3. Chithra Jaggar
4. Chithra Jayashilan
5. Jaishri Zanwar
6. Lakshmi Moni
7. Prema Thakur
8. Rajalakshmi Raman
9. Rajalakshmi Rangarajan
10. Shyamala Shrinivas
11. Sonia Sidhwani
12. Sonal Arora
13. Veena murthy
14. Shanta ji

15. Rekha Sahay

🎵 वाद्ययंत्र संगत (Accompanists)

🎹 Harmonium: Shishir ji
🪘 Dholki: Vignesh
🥁 Mridangam: Ramakrishnan ji

भरम

जिंदगी सबसे बड़ी गुरु है, जो हमें तब तक सबक सिखाती है जब तक हम ‘भरम’ से बाहर निकलकर असल ‘इल्म’ (ज्ञान) नहीं सीख लेते। डॉ. रेखा रानी की एक बेहद गहरी और प्रेरणादायक कविता।

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Bharam - Dr Rekha Rani Poetry

भरम

जिंदगी गुरु बन, तब तक सबक दोहराती रही,
हमें तराशने और खोने-पाने के
भरम से निकालने के लिए,
जब तक इल्म सीख न लिया।

~ Dr. Rekha Rani ♥️

पढ़ाकू साथी पुणे

नवपल्लव बुक्स द्वारा डॉ. रेखा रानी सहाय जी को साहित्य, कला और संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए ‘पढ़ाकू साथी पुणे’ के रूप में चयनित किया गया है। जानिए उनके तीन दशकों के साहित्यिक सफर और इस विशेष पहल के बारे में विस्तार से।

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साहित्य

नवपल्लव बुक्स प्रस्तुत करता है: आपकी “पढ़ाकू साथी पुणे” – डॉ० रेखा रानी सहाय जी

साहित्य, कला और संस्कृति को पुणे ज़िले में आगे बढ़ाने की दिशा में एक नया कदम।

Profile

रेखा रानी

September 2026

डॉ० रेखा रानी सहाय जी - पढ़ाकू साथी पुणे

नमस्कार साथियों,

हमें बताते हुए बहुत खुशी हो रही है कि नवपल्लव बुक्स द्वारा आयोजित ‘पढ़ाकू साथी’ कड़ी में पुणे, महाराष्ट्र से पढ़ाकू साथी के रूप में “डॉ. रेखा रानी सहाय” जी का चुनाव किया गया है। 6 सितंबर 2026 से आप “पढ़ाकू साथी पुणे” के रूप में जानी जा रही हैं। डॉ. सहाय जी संवेदनशील साहित्यकार, मनोवैज्ञानिक, शिक्षाविद एवं लेखिका हैं, जो लगभग तीन दशकों से साहित्य-सृजन में सक्रिय हैं。

पढ़ाकू साथी पुणे घोषणा

मनोविज्ञान में पीएच.डी. प्राप्त डॉ. सहाय जी ने लगभग दो दशकों तक शिक्षण, परामर्श और लेखन के क्षेत्र में कार्य किया है। पुस्तकों के लेखन एवं अनुवाद में भी योगदान दिया है। वे कविता, कहानी, बाल साहित्य, संस्मरण, आलेख, निबंध, पुस्तक समीक्षा और अनुवाद सहित विभिन्न विधाओं में लेखन करती हैं। उनकी रचनाएँ विभिन्न समाचार-पत्रों, पत्रिकाओं और साहित्यिक मंचों पर प्रकाशित हुई हैं।

डॉ. सहाय जी जल्द ही नवपल्लव बुक्स के साथ मिलकर पुणे ज़िले की साहित्य, कला और संस्कृति को और आगे बढ़ाने व संजोने के क्रम में हम सबके साथ रुबरू होंगी। तब तक के लिए @padhakusathi, @navpallavbooks और “पढ़ाकू साथी पुणे” डॉ. सहाय जी को बधाई दीजिए, साथ ही साथ फ़ॉलो करके जुड़ जाइए।

🌟 पढ़ाकू साथी को मिलने वाली सुविधाएँ:

  • पढ़ाकू साथी का Tote Bag उपहार स्वरूप।
  • वेरिफाइड प्रमाण पत्र (ईमेल द्वारा)।
  • नवपल्लव की वेबसाइट पर पढ़ाकू साथी की प्रोफ़ाइल (लेखक कोना कॉर्नर में उपलब्ध)।
  • नवपल्लव की वेबसाइट navpallavbooks.com व अन्य प्लेटफ़ॉर्म पर रिडीम होने वाले extra छूट शॉपिंग कूपन।
  • नवपल्लव के सभी आयोजनों (बुक फेयर, साहित्यिक आयोजन, निजी आयोजन) में अपने ज़िले से पढ़ाकू साथी का अपना प्रतिनिधित्व।
  • पढ़ाकू साथी का अपने ज़िले के साहित्यिक, कलात्मक एवं संस्कृति से सम्बन्धित कार्यों में आजीवन नवपल्लव की सहभागिता।
  • अन्य ज़रूरी साहित्यिक आयोजनों में पढ़ाकू साथी व नवपल्लव बुक्स का साथ रहने की ज़िम्मेदारी।

नवपल्लव बुक्स ऐसे साथियों का उत्साहवर्धन करके साहित्य, समाज और संस्कृति का सम्मान कर रहा है, जिसके केंद्र में आपका शहर, साहित्य, संस्कृति और उस शहर के सम्मानित लेखकगण शामिल हैं। आप भी साहित्य का प्रचार-प्रसार करके और नवपल्लव बुक्स से जुड़कर अगला ‘पढ़ाकू साथी’ बन सकते हैं।

सुविधाएँ

विशेष सूचना

📢 विशेष सूचना:

“अभी तक नवपल्लव बुक्स ने भारत के 36 ज़िलों में, 10 राज्यों से 39 पढ़ाकू साथियों का चयन किया है। अगर आप भी साहित्य, कला और संस्कृति के लिए ‘पढ़ाकू साथी’ अभियान से जुड़ना चाहते हैं, तो आपका स्वागत है। अभी जुड़ जाइए!”

धन्यवाद
टीम, नवपल्लव बुक्स
(@padhakusathi | @navpallavbooks)

Profile

डॉ. रेखा रानी सहाय

संवेदनशील साहित्यकार, मनोवैज्ञानिक, शिक्षाविद् एवं लेखिका। लगभग तीन दशकों से साहित्य-सृजन में सक्रिय एवं नवपल्लव बुक्स द्वारा चयनित “पढ़ाकू साथी पुणे”。

माओ ज़ेदोंग

9 सितंबर 2026 को माओ ज़ेदोंग की 50वीं पुण्यतिथि पर भारतीय वामपंथियों द्वारा दी गई श्रद्धांजलि ने एक नई बहस छेड़ दी है। क्या किसी विदेशी विचारधारा और 1962 के युद्ध के सूत्रधार का महिमामंडन भारत के राष्ट्रीय हित और संप्रभुता से ऊपर हो सकता है? पढ़िए इस जटिल कूटनीतिक और वैचारिक मुद्दे पर डॉ. रेखा रानी का बेबाक विश्लेषण।

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राजनीति / विचार

कम्यूनिस्ट चीन का क्रूर शासक – माओ ज़ेदोंग

भारतीय कम्यूनिस्टों के लिए देशहित से अधिक ज़रूरी वामपंथी विचारधारा

लेखिका: रेखा रानी

|

दिनांक: 13 सितंबर, 2026

Mao Zedong and Communist China

भारत एक लोकतांत्रिक देश है, जहां प्रत्येक नागरिक को अपनी बात कहने और अपने विचार रखने का अधिकार है। हर व्यक्ति और हर राजनीतिक दल अपने वैचारिक नेताओं का मूल्यांकन करने के लिए स्वतंत्र है। लेकिन इस स्वतंत्रता का इस्तेमाल इतिहास और उसके परिणामों को भूल कर नहीं किया जाना चाहिए।

जब भारत में कोई राजनीतिक संगठन ऐसे विदेशी नेता का सम्मान करता दिखाई देता है, जिसका शासनकाल भारत के लिए युद्ध, तनाव और गंभीर सामरिक चुनौतियों से जुड़ा रहा हो, तो स्वाभाविक रूप से एक प्रश्न उठता है — क्या विचारधारा राष्ट्र से ऊपर हो सकती है? क्योंकि किसी भी लोकतंत्र में राजनीतिक विचारों की स्वतंत्रता के साथ-साथ देश की संप्रभुता, सुरक्षा और राष्ट्रीय हित के प्रति जिम्मेदारी भी जुड़ी होती है। विचारधारा चाहे कोई भी हो, प्रश्न यह होना चाहिए कि पहले भारत या विचारधारा?

9 सितंबर, 2026 को माओ की 50वीं पुण्यतिथि पर सीपीआई(एम) ने उन्हें “महान क्रांतिकारी” तथा “चीनी क्रांति के मुख्य नेता और रणनीतिकार” के रूप में श्रद्धांजलि दी। यह श्रद्धांजलि स्वाभाविक रूप से एक महत्वपूर्ण प्रश्न खड़ा करती है— क्या किसी विदेशी क्रांतिकारी नेता का सम्मान करते समय उसके पूरे ऐतिहासिक और राजनीतिक विरासत को भी ध्यान में नहीं रखा जाना चाहिए?

माओ के नेतृत्व में भारत-चीन के लगभग दो हजार वर्षों पुरानी मैत्री को दरकिनार कर दिया गया। फिर ऐसी नीतियां अपनाईं, जिनके गंभीर राजनीतिक परिणाम हुए, फलतः भारत-चीन संबंध 1962 के युद्ध तक पहुंच गया। इसलिए प्रश्न माओवाद पढ़ने या इतिहास में उनके स्थान को स्वीकार करने का नहीं, बल्कि उन्हें किस दृष्टि से याद किया जा रहा है और क्या उस स्मरण में भारत के राष्ट्रीय हित तथा 1962 का इतिहास पर्याप्त रूप से उपस्थित है।

“आज भारत और चीन के बीच व्यापारिक और कूटनीतिक संबंध हैं। पर इन दोनों देशों के संबंध थोड़े जटिल हैं… ये सभी भारत की सुरक्षा और सामरिक चिंताओं से जुड़े विषय हैं।”

अपने एक्स हैंडल पर माओ का गुनगान करने वाले वामपंथियों से राजनीतिक जवाबदेही का स्वाभाविक रूप से पूछा जा सकता है— आप माओवाद को किस रूप में याद करते हैं? चीनी क्रांति की विचारधारा के रूप में? मार्क्सवादी विचारधारा के एक महत्वपूर्ण अध्याय के रूप में? ऐसे राजनीतिक प्रयोग के रूप में, जिसकी नीतियों और परिणामों को आज भी स्वयं चीनी कम्युनिस्ट गंभीर भूल मानते हैं? या हजारों साल पुराने भारत-चाइना दोस्ताना संबंधों के बीच 1962 युद्ध से दरार डालने वाले अध्याय के रूप में?

यदि किसी विदेशी क्रांतिकारी मॉडल को भारत की राजनीतिक वास्तविकताओं के लिए आदर्श मानने की बात आती है, तो स्वाभाविक रूप से गंभीर प्रश्न उठेंगे। हिंसक क्रांति का समर्थन, भारत की संप्रभुता के विरुद्ध गतिविधि या किसी विदेशी राज्य के हितों को भारत के हितों से ऊपर रखना गंभीर विषय है।

एक और महत्वपूर्ण सवाल है— भारत में ऐसे कितने भारतीय नेता, स्वतंत्रता सेनानी, सामाजिक सुधारक और विचारक हैं, जिनके जीवन और विचारों पर गंभीर चर्चा की जा सकती है? फिर उस विदेशी क्रांतिकारी विचारधारा को क्यों चुना जाए, जिसके नेतृत्व वाले चीन के साथ भारत का युद्ध हुआ?

इन सवालों का उत्तर सीपीआई(एम) ही बेहतर दे सकती है। क्योंकि लोकतंत्र में सवाल पूछना जनता का अधिकार है। भारत का लोकतंत्र किसी एक विचारधारा का नहीं है। यह गांधी, आंबेडकर, नेहरू, भगत सिंह, सुभाषचंद्र बोस, विनोबा भावे, श्यामा प्रसाद मुखर्जी, सावरकर, राजेन्द्र प्रसाद और अनेक विचारधाराओं के लोगों की बहसों, संघर्षों और योगदान से विकसित हुआ लोकतंत्र है।

मार्क्सवाद को भी भारत में अपनी जगह मिली है। लेकिन भारतीय वामपंथ से यह अपेक्षा स्वाभाविक है कि वह भारतीय वास्तविकताओं के आधार पर अपनी राजनीति को परिभाषित करे। भारत के किसान, मजदूर, महिलाएं, आदिवासी, युवा, बेरोजगारी—ये उसके अपने मुद्दे हैं। इन मुद्दों पर राजनीति करने के लिए माओवाद को आदर्श मानना आवश्यक नहीं है। यानी भारत के राष्ट्रीय हित की रक्षा करने के लिए किसी विदेशी विचारधारा के प्रति निष्ठा की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए।

“पाम एंड फाइव फिंगर्स अवधारणा”: इतिहास और सावधानी

माओवाद और भारत-चीन संबंधों की चर्चा में एक अवधारणा अक्सर सामने आती है — “पाम एंड फाइव फिंगर्स ऑफ तिब्बत”। इस रूपक में तिब्बत को चीन की हथेली और लद्दाख, नेपाल, सिक्किम, भूटान और तत्कालीन नेफा—आज का अरुणाचल प्रदेश—को उसकी पांच उंगलियां बताया जाता है। भारत में इस अवधारणा का इस्तेमाल चीन की हिमालयी रणनीति और उसके कथित विस्तारवादी दृष्टिकोण को समझने के लिए लंबे समय से होता रहा है।

लेकिन 2024 में प्रकाशित एक शोध-अध्ययन में मनोहर पर्रिकर इंस्टीट्यूट फॉर डिफेन्स स्टडीज़ एंड एनालिसिस के शोधकर्ता प्रशांत कुमार सिंह ने “फाइव फिंगर्स ऑफ तिब्बत” की ऐतिहासिक प्रमाणिकता की समीक्षा की। उनका निष्कर्ष है कि इस बात के पर्याप्त प्रमाण नहीं हैं कि माओवाद ने इसे किसी औपचारिक चीनी रणनीति के रूप में प्रतिपादित किया था। लेकिन यह भी सच है कि चीन की तिब्बत नीति, हिमालयी क्षेत्र और भारत के साथ सीमा विवाद उसकी सामरिक सोच के महत्वपूर्ण हिस्से हैं।

प्राचीन सांस्कृतिक मैत्री से आधुनिक सामरिक प्रतिस्पर्धा तक

भारत और चीन का संबंध लगभग दो हजार वर्षों से था। प्राचीन काल से दोनों सभ्यताओं के बीच ज्ञान, बौद्ध धर्म, दर्शन और व्यापारिक संबंध थे। फाह्यान, ह्वेनसांग और इत्सिंग जैसे चीनी यात्री भारत आए, नालंदा जैसे विश्वविद्यालयों में अध्ययन किया और भारतीय ज्ञान-परंपरा को चीन तक पहुंचाया।

जिस चीन से प्राचीन काल में ज्ञान की खोज में यात्री भारत आते थे, उसी चीन के साथ आधुनिक भारत का संबंध 1950 के दशक में सीमा और सामरिक विवादों के कारण बदल गया और 1962 का युद्ध दोनों देशों के इतिहास में एक गहरी दरार बन गया। अंग्रेज़ों से मिली आज़ादी के बाद भारत अपने पैरों पर खड़ा होने और एक नए राष्ट्र के निर्माण में जुटा था। ऐसे नाजुक समय में चीन ने युद्ध छेड़ दिया।

जवाहरलाल नेहरू ने दिसंबर 1962 में चीन की कार्रवाई को भारत के विरुद्ध “aggression and invasion”, अर्थात “आक्रमण और हमला”, के रूप में वर्णित किया था। उनके लिए यह केवल सीमा का विवाद नहीं था; यह उस भारत के लिए गंभीर राष्ट्रीय संकट था।

“जो लोग अतीत को याद नहीं रखते, वे उसे दोहराने के लिए अभिशप्त होते हैं।”

– जॉर्ज सैंटायाना, The Life of Reason (1905)

इसलिए माओवाद को पढ़ना, समझना, रणनीति और राजनीतिक विचारों का अध्ययन, उसके ऐतिहासिक प्रभावों पर बहस कीजिए। लेकिन इतिहास की कीमत पर उसका महिमामंडन ठीक नहीं है। स्पष्ट है कि विचारधारा रखिए, असहमति रखिए, लेकिन भारत की संप्रभुता पर समझौता मत कीजिए। 1962 का युद्ध हमें यही याद दिलाता है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में स्थायी मित्रता से अधिक महत्वपूर्ण होता है—राष्ट्रीय हित।

इस बिंदु पर पूरी बहस का उत्तर है – लोकतंत्र में राष्ट्र के देशभक्त नागरिकों के लिए— देशहित सर्वोपरि, भारत सबसे पहले है। यदि भारत-चीन के संबंधों में किसी विरासत की प्रशंसा करनी है, तो क्यों न उस प्राचीन ज्ञान, सांस्कृतिक संवाद और सौहार्द की विरासत को याद किया जाए, जिसने दोनों सभ्यताओं को सदियों तक जोड़े रखा? फिर उस विचारधारा और राजनीतिक विरासत को श्रेष्ठ क्यों माना जाए, जिसने आधुनिक दौर में इस ऐतिहासिक सौहार्द को गहरी दरार में बदल दिया?

डॉ. रेखा रानी

लेखिका, परामर्शदाता और पूर्व प्रोफेसर हैं।

कुछ गुल खिले और बिखर गए !

जीवनसाथी को खोने के दर्द, अनमोल यादों और फिर से उठ खड़े होने की उम्मीद को दर्शाती डॉ. रेखा रानी की हृदयस्पर्शी कविता “कुछ गुल खिले और बिखर गए”।

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कविता पाठ (मेरी आवाज़ में)

कुछ गुल खिले

कुछ गुल खिले और हवा में बिखर गए! उनकी ख़ुशबुओं को ना पकड़,
वे फ़िज़ा में घुल गए।

हम न किसी के साथ आए थे,
न साथ किसी के जाएँगे।
न साथ खिले थे,
न साथ मुरझाएँगे।

कुछ गुल खिले और हवा में —-बिखर गए।

न भूल थी बयार की,
न भूल थी नसीब की।
न डाल दोष हवा पर,
न डाल दोष बूँदों पर।

अख़्तियार न था साँसों पर,
आग़ाह न था मुस्तकबिल का,
नावाक़िफ़ थे आने वाले कल से।

फूलों की इक डाली हवा से लचकी,
कई ज़िंदगियों को जुंबिशें दे,
पंखुड़ियाँ बिखर गईं। 

कुछ गुल खिले और हवा में बिखर गए।

कई पल बिना आवाज़
युगों से गुज़र गए,
और हम बिखर गए।

न पूछ बार–बार वो मंज़र,
फिर ले जाते हैं
उसी ग़म के समंदर।

किसने सोचा था—
बहारें आई हैं,
पतझड़ भी आएगा।

हम सँवरा करते,
आईना सँवारा करता था।
अब ख़ुद ही ख़्वाबों की दुकानें सजाते है,
ख़ुद ही ख़रीदार बन जाते हैं।

ज़िंदगी हिसाब है
वफ़ाओं, जफ़ाओं
और ख़ताओं का।

जो सदाएँ गूँजती हैं,
गूँजने दे। 

फिर बहारें आएँगी,
गुलशन सजाएँगी।
आफ़ताब फिर आएगा,
गुनगुनी धूप की चादर फैलाएगा।

कुछ गुल खिले और हवा में बिखर गए!
उनकी ख़ुशबुओं को न पकड़।
जो बिखर गए,
वो बिखर गए।

रंजो–मलाल में डूब नहीं,
चलानी है कश्ती ज़िंदगी की।
न ग़म कर,
न कम कर रौशनी अपनी।
फ़िज़ा में फैलने दे,
ख़ुशबू अपनी। 

न ग़म कर,
न कम कर रौशनी अपनी।
फ़िज़ा में फैलने दे
ख़ुशबू अपनी। 

कुछ गुल खिले और हवा में बिखर गए!
उनकी ख़ुशबुओं को न पकड़,
वे फ़िज़ा में घुल गए।  

“मेरी कविता में गुलों की खुशबू, फूलों की डाली, उनका बिखरना जीवन की क्षणभंगुरता के बारे में है। यादें, भावनाएँ और अनुभव अनमोल होती हैं। अक्सर दिल की कसक अंतरात्मा की गहराईयों से निकल लफ़्ज़ों में प्रतिबिम्ब हो कविता बन जातीं हैं। धैर्य और साहस से कठिनाइयों का सामना करना हीं जिंदगी है। जीवन–प्रवाह रुकता नहीं। किसी भी हादसे… चोट के बाद ख़ुद से, फिर से खुशियां खोजनी पड़ती है।“

यह कविता मैंने 2018 में मेरे पति के निधन के बाद लिखी थी।

भावपूर्ण अभिव्यक्ति,

डॉ. रेखा रानी

अतीत से भविष्य तक

​डॉ. रेखा रानी का यह शोधपरक लेख ‘अतीत से भविष्य तक नारी की यात्रा’ महिलाओं के बदलते मनोवैज्ञानिक, सामाजिक और आर्थिक स्वरूप को गहराई से दर्शाता है। पढ़ें यह सशक्त लेख!

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समाज

अतीत से भविष्य तक नारी की यात्रा : कल, आज और कल

✍️ रेखा रानी | 🗓️ August 22, 2026

Journey of Women: Past to Future

आज का दौर तेजी से बदल रहा है। ऐसे में महिलाओं के जीवन, सोच और सामाजिक भूमिका में भी व्यापक परिवर्तन हो रहे हैं। महिलाएं समाज की लगभग 50 प्रतिशत आबादी का प्रतिनिधित्व करती हैं। इसलिए उनके व्यक्तित्व, दृष्टिकोण और जीवन-शैली में आने वाला परिवर्तन केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि परिवार, समाज और राष्ट्र—तीनों को प्रभावित करता है।

महिलाएं समाज की आधारशिला हैं। उनके विकास और परिवर्तन का प्रभाव परिवार व आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचता है। वास्तव में परिवर्तन प्रकृति का अटल और शाश्वत नियम है। समय के साथ सामाजिक परिस्थितियाँ, शिक्षा, तकनीक, आर्थिक अवसर और जीवन-मूल्य बदलते रहते हैं, तो व्यक्ति का व्यक्तित्व और आत्मबोध भी बदलता है। यही कारण है कि बीते समय की महिला और आज की महिला के विचारों, आकांक्षाओं तथा जीवन-दृष्टि में स्पष्ट अंतर दिखाई देता है।

बीते कल की नारी

पहले अधिकांश महिलाएं अपनी पहचान स्वयं के व्यक्तित्व से अधिक, दूसरों के दृष्टिकोण और रिश्तों के माध्यम से खोजती थीं। वे किसी की माँ, पत्नी, बहन या बेटी के रूप में ही अपनी सामाजिक पहचान प्राप्त करती थीं। सहनशील होना, अपनी इच्छाओं और भावनाओं को व्यक्त न करना तथा परिवार के लिए स्वयं का त्याग करना आदर्श महिला के गुण माने जाते थे।

उस समय आर्थिक निर्णयों में महिलाओं की भागीदारी अत्यंत सीमित थी। आर्थिक आत्मनिर्भरता लगभग नगण्य थी और वित्तीय निर्णय मुख्यतः पुरुषों के हाथों में केंद्रित रहते थे। शिक्षा, रोजगार और सामाजिक अवसर भी अपेक्षाकृत सीमित थे। किन्तु आज शिक्षा, करियर, तकनीकी विकास, वैश्विक संपर्क और बढ़ती सामाजिक जागरूकता के कारण महिलाओं के व्यवहार, व्यक्तित्व, सेल्फ कॉन्सेप्ट, यानी उनका अपने बारे में नजरिया और जीवन-दृष्टि में उल्लेखनीय परिवर्तन आया है।

आज की नारी : सकारात्मक बदलाव

आज महिलाएं शिक्षा, विज्ञान, प्रशासन, न्यायपालिका, खेल, उद्यमिता, चिकित्सा, सेना, राजनीति तथा प्रौद्योगिकी जैसे अनेक क्षेत्रों में उल्लेखनीय उपलब्धियां प्राप्त कर रही हैं। वे केवल परिवार की धुरी ही नहीं, बल्कि सामाजिक, आर्थिक और राष्ट्रीय विकास की सक्रिय सहभागी भी बन चुकी हैं।

मनोवैज्ञानिक प्रभाव : बदलता ‘सेल्फ कॉन्सेप्ट’

आधुनिक नारी में हो रहे इस परिवर्तन को मनोविज्ञान की दृष्टि से बदलता हुआ सेल्फ कॉन्सेप्ट (Self-concept) कहा जा सकता है।

सेल्फ कॉन्सेप्ट का अर्थ है—व्यक्ति स्वयं को किस प्रकार देखता है, अपनी भूमिका को समाज में किस रूप में समझता है, अपने आत्मसम्मान को कैसे परिभाषित करता है तथा स्वयं को कितना स्वीकार करता है। शिक्षा, रोजगार, आर्थिक आत्मनिर्भरता, सामाजिक सम्मान और व्यक्तिगत उपलब्धियाँ इसके निर्माण के प्रमुख आधार माने जाते हैं।

सामाजिक प्रभाव : शोध क्या कहते हैं?

  • 1. शिक्षा और आत्मनिर्भरता: UNESCO (2024) तथा भारत के All India Survey on Higher Education के अनुसार उच्च शिक्षा में महिलाओं की भागीदारी निरंतर बढ़ रही है। इसने महिलाओं में निर्णय लेने की क्षमता और आत्मविश्वास विकसित किया है।
  • 2. आर्थिक स्वतंत्रता: Humanities and Social Sciences Communications (Nature, 2025) के अनुसार आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर महिलाओं में निर्णय लेने की क्षमता और सामाजिक सहभागिता अधिक पाई गई है।
  • 3. परिवार की बदलती संरचना: International Journal of Family Studies (2024) के अनुसार आधुनिक परिवारों में महिलाओं की निर्णय-निर्माण प्रक्रिया में समान भागीदारी उनके आत्मसम्मान तथा वैवाहिक संतुष्टि को बढ़ाती है।
  • 4. अधिकारों के प्रति जागरूकता: UN Women (2024) के अनुसार कानूनी जागरूकता, शिक्षा और सामाजिक सहभागिता महिलाओं के सशक्तिकरण के प्रमुख आधार हैं।

आज : बदलाव का दूसरा पक्ष – नकारात्मक बदलाव

तेजी से बदलते समाज में लोगों की अपेक्षाएं, जीवन-शैली और व्यवहार भी बदलते हैं। यदि इस परिवर्तन के साथ नैतिक संतुलन, भावनात्मक परिपक्वता और सामाजिक उत्तरदायित्व का विकास न हो, तो अनेक प्रकार की चुनौतियाँ सामने आने लगती हैं।

महिलाओं में अपराध और मनोवैज्ञानिक दबाव:
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) और UNODC की रिपोर्टें संकेत देती हैं कि गंभीर अपराधों में महिलाओं की भागीदारी आज भी पुरुषों की तुलना में काफी कम है। अपराधशास्त्री Robert Agnew की General Strain Theory (1992) के अनुसार जब व्यक्ति की आकांक्षाओं और वास्तविक परिस्थितियों के बीच गहरा अंतर उत्पन्न होता है, तब तनाव असामान्य व्यवहार को जन्म दे सकता है।

आज अनेक महिलाएं परिवार और कार्यस्थल—दोनों की दोहरी जिम्मेदारियाँ निभा रही हैं। WHO (2023) के अनुसार लंबे समय तक बना रहने वाला तनाव भावनात्मक नियंत्रण को प्रभावित कर सकता है। अपराध के पीछे व्यक्तिगत, सामाजिक, आर्थिक और परिस्थितिजन्य कई कारक एक साथ कार्य करते हैं।

आने वाले कल की नारी

आने वाले कल की नारी केवल शिक्षित और आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर ही नहीं होगी, बल्कि मानसिक रूप से अधिक सशक्त, आत्मविश्वासी, संवेदनशील और विवेकशील भी होगी। यदि उसे समान अवसर, सुरक्षित वातावरण, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा तथा भावनात्मक सहयोग प्राप्त होगा, तो वह इन चुनौतियों को अवसरों में बदलने में सक्षम होगी। वह केवल स्वयं का भविष्य नहीं गढ़ेगी, बल्कि एक अधिक संवेदनशील, न्यायपूर्ण और प्रगतिशील समाज के निर्माण में भी अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।

निष्कर्ष

आधुनिक महिला का बदलता सेल्फ कॉन्सेप्ट भारतीय समाज के लिए एक महत्वपूर्ण और सकारात्मक उपलब्धि है। महिलाओं के बदलते जीवन को केवल सामाजिक परिवर्तन के रूप में नहीं, बल्कि मनोवैज्ञानिक, आर्थिक और सांस्कृतिक दृष्टि से भी समझा जाना चाहिए। तभी आने वाले कल की नारी का व्यक्तित्व समग्र समाज के विकास और मानवीय मूल्यों की सशक्त वाहक बनकर एक नए भारत के निर्माण में अपनी निर्णायक भूमिका निभाएगी।

डॉ. रेखा रानी

(लेखिका, परामर्शदाता और पूर्व प्रोफेसर)


द डॉसियर (The Dossier) पर मूल लेख पढ़ें

अतृप्त तृष्णा

डॉ. रेखा रानी की मार्मिक कविता ‘अतृप्त तृष्णा’ अब प्रतिष्ठित ‘प्रतिज्ञान’ पत्रिका में प्रकाशित। इंसानी इच्छाओं के इस गहरे जीवन-दर्शन को Amazon Kindle पर पढ़ें।

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अत्यंत खुशी के साथ साझा कर रही हूँ!

मुझे आप सभी को यह बताते हुए बेहद खुशी हो रही है कि मेरी लिखी हुई कविता ‘अतृप्त तृष्णा’ प्रतिष्ठित ‘प्रतिज्ञान’ (Pratigyan) पत्रिका में प्रकाशित हुई है!

साहित्य की इस नई पहचान का हिस्सा बनना मेरे लिए बहुत गर्व की बात है। यह पत्रिका अब Amazon Kindle पर भी उपलब्ध है।

Atript Trishna Poem in Pratigyan Magazine

अतृप्त तृष्णा

हर इंसान आजीवन लड़ता रहता है,

नज़र न आने वाले

कई अनकहे युद्धों से-

कभी ख़ुद से,

कभी ज़माने से,

कभी लोगों से,

और कभी अपनी अतृप्त तृष्णाओं से।


यही तृष्णा

सुकून को मृगतृष्णा बना देती है,

इंसान भूल जाता है,

सफ़र-ए-ज़िंदगी कोई जंग नहीं,

बल्कि वह रूहानी सफ़र है,

जो हर अनुभव से,

हर ज़ख्म से हमें तराशता है।

ताकि हम

ख़ुद को ख़ुद से

बेहतर बना सके।

ताकि सुकून से भरे,

रौशन वजूद के साथ

जीवन के अगले मुकाम का

इस्तक़बाल कर सके।

आप सभी से अनुरोध है कि कृपया नीचे दिए गए लिंक पर जाकर किंडल (Kindle) पर पूरी पत्रिका पढ़ें और अपना प्यार एवं आशीर्वाद दें। 🙏

सधन्यवाद व स्नेह,

डॉ. रेखा रानी

Recognition that Inspires

Honoured to receive recognition from the Central Hindi Directorate, Government of India, for securing Third Prize in the Hindi Essay Writing Competition. A memorable milestone that inspires a deeper commitment to literature and the Hindi language.

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Certificate of Recognition - Central Hindi Directorate

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Honoured by the Government of India

Humbled and honoured to receive this certificate from the Central Hindi Directorate, Government of India, today.

Awarded for securing the Third Prize in the online Hindi Essay Writing Competition, organized on the occasion of the 65th Anniversary of the establishment of the Directorate.

“Grateful for this recognition.”

– Dr. Rekha Rani

‘ढाक के तीन पात’

‘ढाक के तीन पात’ मुहावरे की उत्पत्ति से लेकर पलाश वृक्ष के पर्यावरणीय, सांस्कृतिक और आयुर्वेदिक महत्व तक—जानिए क्यों यह अद्भुत वृक्ष पथरीली जमीन में भी जीवन का संदेश देता है और भारतीय परंपरा में विशेष स्थान रखता है।

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कहां से आया ‘ढाक के तीन पात’ वाला मुहावरा, एक पौधा जो पथरीली जमीन में भी उग जाता है

✍️ डॉ. रेखा रानी

Palash Tree Full View

‘जंगल की ज्वाला‘ – पलाश का वृक्ष

दक्षिण एशिया और भारतीय उपमहाद्वीप के इंडो-गंगा मैदानों और वनों में पाया जाने वाला पलाश सिर्फ एक पेड़ नहीं बल्कि पर्यावरण संतुलन और पारिस्थितिक तंत्र का एक महत्वपूर्ण आधार है। पलाश, वन्य जीवों के साथ गहराई से जुड़ा है। होली के आसपास इस पर्णपाति वृक्ष के सभी पत्ते गिर जाते हैं। इसके बाद से यह केसरिया-नारंगी फूलों से ढक जाता है, तब ‘जंगल ज्वाला’ पलाश दूर से आग जैसा प्रतीत होता है। पलाश के फूलों को उबालकर प्राकृतिक केसरिया रंग बनाया जाता है। इस त्रिपर्णी ढाक वृक्ष की डंडियों में हमेशा तीन पत्ते होते। इसी से प्रसिद्ध मुहावरा, ‘ढाक के तीन पात’ बना है।

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पथरीली जमीन पर भी उगता है पलाश

पलाश कड़ी गर्मी, शुष्क, पथरीली और बंजर भूमि में भी सरलता से उगता और पनपता है। इसकी मजबूत, गहरी जड़ें और कठोर बनावट इसे सूखा-रोधी बनता है। इससे यह विपरीत परिस्थितियों में भी अपने आस-पास हरियाली बनाए रखता है। पलाश, परागण करने वाले जीवों के लिए एक मजबूत सपोर्ट सिस्टम है। पलाश के चटक नारंगी फूल तोते की चोंच की तरह मुड़े हुए और आकाश की ओर ऊपर उठे होते हैं, जो पक्षियों, मधुमक्खियां और तितलियों को आकर्षित कर परागण को बढ़ावा देते हैं।

Palash Flowers Close Up

तोते की चोंच की तरह मुड़े पलाश के फूल

पलाश नाइट्रोजन स्थिरीकरण कर मिट्टी की उर्वरता बढ़ाता और पोषण चक्र सुदृढ़ करता है। इससे वनों और वनस्पतियों को लाभ मिलता है।

पलाश के फूल, पत्ते और बीज अनेक वन्य जीवों के लिए भोजन का स्रोत है। पक्षी और कीट इसके रस का सेवन करते हैं, जिससे परागण बढ़ता है। छोटे वन्य जीव इसके बीजों के प्रसार में सहायता करते हैं जो पलाश के जीवन चक्र को बनाए रखता है। यह तालमेल वन विविधता के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

पलाश, पर्यावरण संरक्षण के साथ वनों के सतत विकास के लिए भी उपयोगी है। अंतरराष्ट्रीय शोध में इसे नाइट्रोजन फिक्सिंग वृक्ष, पोलिनेटर सपोर्टिंग स्पीशीज और ड्राई फॉरेस्ट रेस्टोरेशन प्लांट माना गया है। भारतीय मान्यता के अनुसार पलाश रेन इंडिकेटर वृक्ष है।

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पलाश का सांस्कृतिक महत्व

पलाश के शुभ त्रिपत्रों को ब्रह्मा-विष्णु-महेश या सत-रज-तम का प्रतीक माना गया है। संस्कृत ग्रंथ इसे अग्नि ऊर्जा और पुनर्जन्म का प्रतीक मानते हैं। इसकी सूखी लकड़ियां यज्ञ और पुष्प लक्ष्मी प्राप्ति के लिए उपयोग में लाया जाता है। आयुर्वेद में पलाश के फूल, जड़ें, गोंद, पत्तियां और बीज कई रोगों के उपचार में इस्तेमाल की जाती हैं।

लोक कथा के मुताबिक किसी प्रेयसी के विरह-अश्रु से पलाश का जन्म हुआ। जिसकी विरह ज्वाला से इसके फूल अग्नि-रंग के हो गए। महाकवि कालिदास और जयदेव की रचनाओं में पलाश को प्रेम और विरह का प्रतीक बताया गया है। पलाश जैसे प्रतिष्ठित वृक्ष को अध्यात्म और आयुर्वेद, ज्ञान और मन-शरीर संतुलन से जोड़ते हैं। इस तरह की मान्यताएं पेड़ों का संरक्षण प्रदान करती हैं। पलाश वन्य-जीव और प्रकृति के बीच संतुलन की मजबूत कड़ी है। यह वृक्ष हमें सिखाता है- प्रकृति का हर तत्व ब्रह्मांड संतुलन का अनिवार्य हिस्सा है।