माओ ज़ेदोंग

9 सितंबर 2026 को माओ ज़ेदोंग की 50वीं पुण्यतिथि पर भारतीय वामपंथियों द्वारा दी गई श्रद्धांजलि ने एक नई बहस छेड़ दी है। क्या किसी विदेशी विचारधारा और 1962 के युद्ध के सूत्रधार का महिमामंडन भारत के राष्ट्रीय हित और संप्रभुता से ऊपर हो सकता है? पढ़िए इस जटिल कूटनीतिक और वैचारिक मुद्दे पर डॉ. रेखा रानी का बेबाक विश्लेषण।

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राजनीति / विचार

कम्यूनिस्ट चीन का क्रूर शासक – माओ ज़ेदोंग

भारतीय कम्यूनिस्टों के लिए देशहित से अधिक ज़रूरी वामपंथी विचारधारा

लेखिका: रेखा रानी

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दिनांक: 13 सितंबर, 2026

Mao Zedong and Communist China

भारत एक लोकतांत्रिक देश है, जहां प्रत्येक नागरिक को अपनी बात कहने और अपने विचार रखने का अधिकार है। हर व्यक्ति और हर राजनीतिक दल अपने वैचारिक नेताओं का मूल्यांकन करने के लिए स्वतंत्र है। लेकिन इस स्वतंत्रता का इस्तेमाल इतिहास और उसके परिणामों को भूल कर नहीं किया जाना चाहिए।

जब भारत में कोई राजनीतिक संगठन ऐसे विदेशी नेता का सम्मान करता दिखाई देता है, जिसका शासनकाल भारत के लिए युद्ध, तनाव और गंभीर सामरिक चुनौतियों से जुड़ा रहा हो, तो स्वाभाविक रूप से एक प्रश्न उठता है — क्या विचारधारा राष्ट्र से ऊपर हो सकती है? क्योंकि किसी भी लोकतंत्र में राजनीतिक विचारों की स्वतंत्रता के साथ-साथ देश की संप्रभुता, सुरक्षा और राष्ट्रीय हित के प्रति जिम्मेदारी भी जुड़ी होती है। विचारधारा चाहे कोई भी हो, प्रश्न यह होना चाहिए कि पहले भारत या विचारधारा?

9 सितंबर, 2026 को माओ की 50वीं पुण्यतिथि पर सीपीआई(एम) ने उन्हें “महान क्रांतिकारी” तथा “चीनी क्रांति के मुख्य नेता और रणनीतिकार” के रूप में श्रद्धांजलि दी। यह श्रद्धांजलि स्वाभाविक रूप से एक महत्वपूर्ण प्रश्न खड़ा करती है— क्या किसी विदेशी क्रांतिकारी नेता का सम्मान करते समय उसके पूरे ऐतिहासिक और राजनीतिक विरासत को भी ध्यान में नहीं रखा जाना चाहिए?

माओ के नेतृत्व में भारत-चीन के लगभग दो हजार वर्षों पुरानी मैत्री को दरकिनार कर दिया गया। फिर ऐसी नीतियां अपनाईं, जिनके गंभीर राजनीतिक परिणाम हुए, फलतः भारत-चीन संबंध 1962 के युद्ध तक पहुंच गया। इसलिए प्रश्न माओवाद पढ़ने या इतिहास में उनके स्थान को स्वीकार करने का नहीं, बल्कि उन्हें किस दृष्टि से याद किया जा रहा है और क्या उस स्मरण में भारत के राष्ट्रीय हित तथा 1962 का इतिहास पर्याप्त रूप से उपस्थित है।

“आज भारत और चीन के बीच व्यापारिक और कूटनीतिक संबंध हैं। पर इन दोनों देशों के संबंध थोड़े जटिल हैं… ये सभी भारत की सुरक्षा और सामरिक चिंताओं से जुड़े विषय हैं।”

अपने एक्स हैंडल पर माओ का गुनगान करने वाले वामपंथियों से राजनीतिक जवाबदेही का स्वाभाविक रूप से पूछा जा सकता है— आप माओवाद को किस रूप में याद करते हैं? चीनी क्रांति की विचारधारा के रूप में? मार्क्सवादी विचारधारा के एक महत्वपूर्ण अध्याय के रूप में? ऐसे राजनीतिक प्रयोग के रूप में, जिसकी नीतियों और परिणामों को आज भी स्वयं चीनी कम्युनिस्ट गंभीर भूल मानते हैं? या हजारों साल पुराने भारत-चाइना दोस्ताना संबंधों के बीच 1962 युद्ध से दरार डालने वाले अध्याय के रूप में?

यदि किसी विदेशी क्रांतिकारी मॉडल को भारत की राजनीतिक वास्तविकताओं के लिए आदर्श मानने की बात आती है, तो स्वाभाविक रूप से गंभीर प्रश्न उठेंगे। हिंसक क्रांति का समर्थन, भारत की संप्रभुता के विरुद्ध गतिविधि या किसी विदेशी राज्य के हितों को भारत के हितों से ऊपर रखना गंभीर विषय है।

एक और महत्वपूर्ण सवाल है— भारत में ऐसे कितने भारतीय नेता, स्वतंत्रता सेनानी, सामाजिक सुधारक और विचारक हैं, जिनके जीवन और विचारों पर गंभीर चर्चा की जा सकती है? फिर उस विदेशी क्रांतिकारी विचारधारा को क्यों चुना जाए, जिसके नेतृत्व वाले चीन के साथ भारत का युद्ध हुआ?

इन सवालों का उत्तर सीपीआई(एम) ही बेहतर दे सकती है। क्योंकि लोकतंत्र में सवाल पूछना जनता का अधिकार है। भारत का लोकतंत्र किसी एक विचारधारा का नहीं है। यह गांधी, आंबेडकर, नेहरू, भगत सिंह, सुभाषचंद्र बोस, विनोबा भावे, श्यामा प्रसाद मुखर्जी, सावरकर, राजेन्द्र प्रसाद और अनेक विचारधाराओं के लोगों की बहसों, संघर्षों और योगदान से विकसित हुआ लोकतंत्र है।

मार्क्सवाद को भी भारत में अपनी जगह मिली है। लेकिन भारतीय वामपंथ से यह अपेक्षा स्वाभाविक है कि वह भारतीय वास्तविकताओं के आधार पर अपनी राजनीति को परिभाषित करे। भारत के किसान, मजदूर, महिलाएं, आदिवासी, युवा, बेरोजगारी—ये उसके अपने मुद्दे हैं। इन मुद्दों पर राजनीति करने के लिए माओवाद को आदर्श मानना आवश्यक नहीं है। यानी भारत के राष्ट्रीय हित की रक्षा करने के लिए किसी विदेशी विचारधारा के प्रति निष्ठा की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए।

“पाम एंड फाइव फिंगर्स अवधारणा”: इतिहास और सावधानी

माओवाद और भारत-चीन संबंधों की चर्चा में एक अवधारणा अक्सर सामने आती है — “पाम एंड फाइव फिंगर्स ऑफ तिब्बत”। इस रूपक में तिब्बत को चीन की हथेली और लद्दाख, नेपाल, सिक्किम, भूटान और तत्कालीन नेफा—आज का अरुणाचल प्रदेश—को उसकी पांच उंगलियां बताया जाता है। भारत में इस अवधारणा का इस्तेमाल चीन की हिमालयी रणनीति और उसके कथित विस्तारवादी दृष्टिकोण को समझने के लिए लंबे समय से होता रहा है।

लेकिन 2024 में प्रकाशित एक शोध-अध्ययन में मनोहर पर्रिकर इंस्टीट्यूट फॉर डिफेन्स स्टडीज़ एंड एनालिसिस के शोधकर्ता प्रशांत कुमार सिंह ने “फाइव फिंगर्स ऑफ तिब्बत” की ऐतिहासिक प्रमाणिकता की समीक्षा की। उनका निष्कर्ष है कि इस बात के पर्याप्त प्रमाण नहीं हैं कि माओवाद ने इसे किसी औपचारिक चीनी रणनीति के रूप में प्रतिपादित किया था। लेकिन यह भी सच है कि चीन की तिब्बत नीति, हिमालयी क्षेत्र और भारत के साथ सीमा विवाद उसकी सामरिक सोच के महत्वपूर्ण हिस्से हैं।

प्राचीन सांस्कृतिक मैत्री से आधुनिक सामरिक प्रतिस्पर्धा तक

भारत और चीन का संबंध लगभग दो हजार वर्षों से था। प्राचीन काल से दोनों सभ्यताओं के बीच ज्ञान, बौद्ध धर्म, दर्शन और व्यापारिक संबंध थे। फाह्यान, ह्वेनसांग और इत्सिंग जैसे चीनी यात्री भारत आए, नालंदा जैसे विश्वविद्यालयों में अध्ययन किया और भारतीय ज्ञान-परंपरा को चीन तक पहुंचाया।

जिस चीन से प्राचीन काल में ज्ञान की खोज में यात्री भारत आते थे, उसी चीन के साथ आधुनिक भारत का संबंध 1950 के दशक में सीमा और सामरिक विवादों के कारण बदल गया और 1962 का युद्ध दोनों देशों के इतिहास में एक गहरी दरार बन गया। अंग्रेज़ों से मिली आज़ादी के बाद भारत अपने पैरों पर खड़ा होने और एक नए राष्ट्र के निर्माण में जुटा था। ऐसे नाजुक समय में चीन ने युद्ध छेड़ दिया।

जवाहरलाल नेहरू ने दिसंबर 1962 में चीन की कार्रवाई को भारत के विरुद्ध “aggression and invasion”, अर्थात “आक्रमण और हमला”, के रूप में वर्णित किया था। उनके लिए यह केवल सीमा का विवाद नहीं था; यह उस भारत के लिए गंभीर राष्ट्रीय संकट था।

“जो लोग अतीत को याद नहीं रखते, वे उसे दोहराने के लिए अभिशप्त होते हैं।”

– जॉर्ज सैंटायाना, The Life of Reason (1905)

इसलिए माओवाद को पढ़ना, समझना, रणनीति और राजनीतिक विचारों का अध्ययन, उसके ऐतिहासिक प्रभावों पर बहस कीजिए। लेकिन इतिहास की कीमत पर उसका महिमामंडन ठीक नहीं है। स्पष्ट है कि विचारधारा रखिए, असहमति रखिए, लेकिन भारत की संप्रभुता पर समझौता मत कीजिए। 1962 का युद्ध हमें यही याद दिलाता है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में स्थायी मित्रता से अधिक महत्वपूर्ण होता है—राष्ट्रीय हित।

इस बिंदु पर पूरी बहस का उत्तर है – लोकतंत्र में राष्ट्र के देशभक्त नागरिकों के लिए— देशहित सर्वोपरि, भारत सबसे पहले है। यदि भारत-चीन के संबंधों में किसी विरासत की प्रशंसा करनी है, तो क्यों न उस प्राचीन ज्ञान, सांस्कृतिक संवाद और सौहार्द की विरासत को याद किया जाए, जिसने दोनों सभ्यताओं को सदियों तक जोड़े रखा? फिर उस विचारधारा और राजनीतिक विरासत को श्रेष्ठ क्यों माना जाए, जिसने आधुनिक दौर में इस ऐतिहासिक सौहार्द को गहरी दरार में बदल दिया?

डॉ. रेखा रानी

लेखिका, परामर्शदाता और पूर्व प्रोफेसर हैं।

जंगल और मानव का अद्भुत रिश्ता

ताडोबा अंधारी टाइगर रिजर्व के संदर्भ में जानिए जंगल और मानव के सह-अस्तित्व की अद्भुत कहानी। डॉ. रेखा रानी का यह विशेष लेख प्रकृति और मनुष्य के गहरे रिश्ते को दर्शाता है।

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📰 यह विशेष लेख प्रतिष्ठित ‘अमर उजाला’ में प्रकाशित हुआ है 📰

भारत में सदियों से जंगलों और मानवों का अद्भुत रिश्ता:

सह–अस्तित्व की मिसाल, ताडोबा अंधारी टाइगर रिजर्व

✍️ लेखिका: डॉ. रेखा रानी (Dr. Rekha Rani)

Tadoba Tiger Reserve

ताडोबा रिजर्व की दहलीज़ पर बसे गांव एक ऐसी अनोखी दुनिया हैं, जहां दिन में इंसानों की आवाजाही रहती है और रात में उन्हीं रास्तों पर बाघों व जंगली जीवों के पदचाप सुनाई देते हैं। यह स्थान हमें सिखाता है कि प्रकृति को समझना और उसका सम्मान करना आवश्यक है—क्योंकि जंगल बचेगा, तभी मनुष्य बचेगा।

महाराष्ट्र के चंद्रपुर जिले में 1955 में स्थापित ताडोबा रिज़र्व लगभग 1727 वर्ग किलोमीटर में फैला है। यहाँ तेंदुआ, स्लॉथ भालू, जंगली कुत्ता (ढोल), सांभर, नीलगाय तथा असंख्य पक्षी प्रजातियाँ पाई जाती हैं। हालांकि, अधिकांश पर्यटक यहाँ भारत के राष्ट्रीय पशु रॉयल बंगाल टाइगर को देखने आते हैं, जो शक्ति, साहस और भारत की प्राकृतिक समृद्धि का प्रतीक है।

दिलचस्प तथ्य

ताडोबा “लैंड ऑफ़ टाइगर्स” के बाघ इंसानों से डरकर भागते नहीं, बल्कि दिन के समय सड़कों पर टहलते हुए दिखाई देते हैं। यहां मार्च से मई के बीच “बाघ दर्शन” की संभावना सबसे अधिक रहती है। सामान्यतः पार्क अक्टूबर से जून तक खुला तथा मानसून – जुलाई से सितंबर बंद रहता है।

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बाघों के नाम

एक रोचक विशेषता यह है कि यहाँ के बाघों को जानी-मानी हस्तियों के नाम दिए गए हैं, जैसे—लारा, माधुरी, गब्बर, शिवाजी, अमिताभ, सोनम, मल्लिका आदि。

गांव और बाघ का अद्भुत रिश्ता

ताडोबा के आसपास बसे कोलारा, मोहरली, खुटबांडा जैसे गांव जंगल, जानवर और इंसान के सह-अस्तित्व का अनूठा उदाहरण हैं। स्थानीय लोग जंगली जानवरों की निजता का सम्मान करते हैं और उन्हें उकसाते नहीं। बाघ और अन्य वन्य जीव भी अनावश्यक रूप से इंसानों पर हमला नहीं करते。

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बाघ : जंगल का देवता

यहां बाघ को केवल एक हिंसक पशु नहीं, बल्कि जंगल का देवता माना जाता है। स्थानीय निवासियों का विश्वास है कि बाघ का दिखना जंगल की अनुमति या चेतावनी का संकेत होता है。

ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पक्ष

यह क्षेत्र मूलतः कोलम और गोंड जनजातियों का है। उनके देवता तरु के नाम पर ही ताडोबा का नाम पड़ा। यहां वन्य जीवों के संरक्षक तरु देव का एक मंदिर भी है, जहाँ वर्ष में एक बार मेला लगता है。

महुआ और आस्था

स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, महुआ के पेड़ों में “जंगल माता” का वास होता है। महिलाएं महुआ बटोरने से पहले पूजा कर अनुमति लेती हैं। महुआ ग्रामीणों का भोजन, आजीविका और पारंपरिक पेय का स्रोत है。

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रात्रि की चेतावनियां और लोक-विश्वास

यहाँ मान्यता है कि रात के समय जंगल से आने वाली विचित्र आवाज़ें चेतावनी हैं, इसलिए अँधेरा होने के बाद घर से बाहर निकलना वर्जित माना जाता है। एक किंवदंती के अनुसार, जो जंगल का अपमान करता है, वह रास्ता भटक जाता है और केवल जंगल के देवता से क्षमा माँगने पर ही सही राह पाता है。

अंधारी नदी: जीवन रेखा

ताडोबा के बीचोबीच बहने वाली अंधारी नदी, वैनगंगा बेसिन की एक सहायक नदी है। यह न केवल वन्य जीवों के लिए जल का मुख्य स्रोत व प्राकृतिक सुंदरता का आधार है。

जंगल के संसाधन व संघर्ष

आसपास के ग्रामीणों को जंगल से लकड़ी, महुआ, शहद, तेंदूपत्ता और अनेक औषधीय पौधे प्राप्त होते हैं। जंगल और गाँव के बीच एक अदृश्य सीमा है। पीढ़ियों से लोग सह-अस्तित्व व अद्भुत संतुलन में जीवन जी रहे हैं, हालांकि कभी-कभी फसलों के नुकसान, मवेशियों पर हमले जैसी परिस्थितियाँ भी उत्पन्न होती हैं।

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ताडोबा की महिला गाइड को राष्ट्रीय सम्मान

ताडोबा-अंधारी टाइगर रिजर्व की शहनाज सुलेमान बैग, पहली महिला गाइड को “बेस्ट वाइल्डलाइफ गाइड” के लिए Billy Arjan Singh Award 2025 से सम्मानित किया गया है। ताडोबा सिखाता है कि भारत की प्रकृति केवल संरक्षित क्षेत्रों तक सीमित नहीं, बल्कि वहाँ भी जीवित है जहाँ लोग जंगल के साथ तालमेल बनाकर जीते हैं।

यह लेख मूल रूप से अमर उजाला पर प्रकाशित हुआ है। डॉ. रेखा रानी जी के इस विस्तृत और अद्भुत लेख को पूरा पढ़ने के लिए नीचे दिए गए बटन पर क्लिक करें:


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