इश्क़

इश्क़ सिर्फ एक रूहानी एहसास है या दिमाग में होने वाली केमिकल हलचल? डॉ. रेखा रानी के इस विशेष लेख में जानिए प्रेम का आध्यात्मिक, मनोवैज्ञानिक और वैज्ञानिक सच।

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❤ इश्क़ ❤️

रूहानी एहसास या दिल-दिमाग़ की केमिकल हलचल?

Love - Spiritual or Chemical

क इंसान जो इश्क़ में हो, उसके लिए दुनिया की हर चीज़ से ज़्यादा ज़रूरी इश्क़ हो जाती है। इंसान वैसा नहीं रह जाता जैसा वह हुआ करता था। जो समय पर सोता-उठता था, वह देर रात जागता है, देर से उठता है। रातों में ऑनलाइन दिखता है—किसी के इंतज़ार में ।

जो कम बोलते थे, वे वाचाल हो जाते हैं। बोलने वाले शांत हो जाते हैं। उनके जीवन में किसी की एक छोटी-सी मुस्कान पूरा दिन खुशनुमा बना देती है। वे अक्सर गीतों को सुनने से ज़्यादा महसूस करने लगते हैं। न जाने ऐसे कितने बदलाव इश्क़ में डूबे इंसान में आ जाते हैं।

इश्क़ उलझी रहती है

हाँ–नहीं की गिरहों में,

ज़ेहन सवालों में,

दिल दुआओँ में।

सब्र बेसब्र करे,

रज़ा की चाहों में।

राह खोजें सुकून की,

रब तेरी पनाहों में।

सात्विक प्रेम क्या है : आध्यात्मिक अनुराग?

“पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय।

ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होए।।”

~ कबीर

आत्मा का परमात्मा से निर्विकार मन से मिलन की तड़प—आध्यात्मिक प्रेम है। जहाँ तन नहीं, पाने की प्यास नहीं, आत्मा की पहचान और एकाकार होने की चाह होती है। यह प्यार पावन है— राधा-कृष्ण, मीरा-कृष्ण, कबीर-राम, रूमी-शम्स जैसे आत्मिक और आध्यात्मिक प्रेम ।

आजकल इसी तर्ज़ पर कुछ शब्द बेहद प्रचलन में हैं— सोल-कनेक्शन, सोल-लव, सोलमेट, ट्विन-फ्लेम आदि, यानी जीवन को जीवंत बनाने वाला साथी।

इश्क़ का मनोविज्ञान : मन को टटोलें

मनोविज्ञान मानता है कि इश्क़ हमारी इमोशनल ज़रूरतों से जुड़ा होता है। हम सामने वाले को चाहते हैं, पर उसमें अपनी भावनात्मक ज़रूरतें भी ढूँढते हैं— जैसे एक्सेप्टेंस, अपने आप को स्वीकार किए जाने की चाह, वैलिडेशन, सुरक्षा, अपनापन, समझे जाने की इच्छा, ख़ुद का मोल समझा जाना।

मनोविज्ञान का मानना है कि मोहब्बत हमारे बचपन के अनुभवों, अटैचमेंट स्टाइल और अकेलेपन से जुड़ी होती है। इसीलिए इश्क़ इंसान को कभी मज़बूत बनाता है और कभी-कभी कमज़ोर और अति-संवेदनशील भी।

इश्क़ का विज्ञान : आइए झाँकें, दिमाग़ के अंदर क्या चल रहा है

विज्ञान कहता है—इश्क़ दिल का मामला नहीं है। यह दिमाग़ में चलने वाली केमिकल हलचल है। वास्तव में यह एक तार्किक और न्यूरोलॉजिकल प्रक्रिया है, जो हमें किसी एक इंसान के साथ जोड़ने और टिके रहने के लिए प्रोग्राम करती है। प्यार केमिकल बदलाव लाता है, और कुछ केमिकल बदलाव प्यार जैसी भावनाओं को जन्म देते हैं। यह एक दो-तरफ़ा प्रक्रिया है।

जब डोपामाइन Hormone का स्त्राव बढ़ जाता है— यह खुशी, एक्साइटमेंट और रिवॉर्ड का एहसास कराता है। बढ़ा हुआ ऑक्सीटोसिन भरोसा और बॉन्डिंग बढ़ाता है। एड्रेनालिन के बहाव से घबराहट और दिल की धड़कनें तेज़ हो जाती हैं।

कम सेरोटोनिन ऑब्सेशन और बार-बार एक ही बात सोचने की आदत बढ़ा देता है। इसी कारण इंसान जुनूनी, क्रेज़ी होकर एक ही इंसान पर फ़ोकस करने लगता है। ये सारे बदलाव व्यवहार में साफ़ नज़र आने लगते हैं।

क्या इश्क़ एडिक्शन या नशा है?

कुछ वैज्ञानिक अध्ययन बताते हैं कि इश्क़ में दिमाग़ का वही हिस्सा एक्टिव हो जाता है जो ड्रग्स और एडिक्शन में होता है। इसीलिए बात न हो तो बेचैनी होती है, और एक मैसेज या कॉल से मूड बेहतर हो जाता है। किसी के दूर जाने का ख़याल डराता है।

यानी इश्क़ एक स्वाभाविक नशा है, जो इंसान के पूरे सिस्टम पर असर डालता है। और एक ख़ास इंसान जीवन का रिवॉर्ड सिस्टम बन जाता है।

आख़िर में — प्रेम क्या है?

प्रेम के कई रूप होते हैं— रोमांटिक प्रेम की कशिश और आकर्षण, माँ-बच्चे का ममता-भरा निश्छल प्यार, पति-पत्नी का विश्वासपूर्ण साथ, परिवार और भाई-बहनों का स्नेह, और निस्वार्थ मित्रों की संगति।

प्रेम न सिर्फ़ हार्मोन है, न सिर्फ़ दिमाग़ की चाल। प्रेम वह हालत है जहाँ इंसान अपने “मैं” से निकलकर किसी “हम” की तरफ़ बढ़ता है। प्रेम जो इंसान को थोड़ा खो देता है, लेकिन सही प्रेम मिले तो ख़ुद को खुद से बेहतर भी बना देता है।

“Love is the water of life.

Drink it down with heart and soul.”

~ Rumi

इबादत से इश्क़

Spiritual Love

इश्क़ और इबादत

I have been with you!

If you find me not within you,

you will never find me.

For I have been with you,

from the beginning of me.

~~Rumi

चाय, किताबें, इश्क़ और तुम

हाथों में गर्म चाय की प्याली औ हम किताबों में गुम।

हो इश्क़ का तरन्नुम औ यादों में तुम।

तब लबों पर थिरक उठती है तबस्सुम,

और आँखों में अंजुम।

चाय, किताबें, इश्क़ और तुम

इन्ही से मिल बनें हैं हम।

अर्थ

अंजुम – सितारे; तारे।

तरन्नुम – स्वर-माधुर्य, गाना, मधुर गान, लय, अलाप।

शमा के नूर

पूछा किसी ने रूमी से- दरवेश! किस मद में चूर हो?

गोल-गोल झूमते और घूमते लगते शमा के नूर हो।

नृत्य में बेफ़िक्री डूबे किस सुरूर हो?

यह नशा पाते कहाँ से हो?

जवाब मिला – चूर हैं हम मद, औ मुहब्बत में उसके,

दुनिया रौशन है उल्फ़त में जिसके।

तु हर चोट की दरार से रिसके,

रौशनी भरने दे अपनी रूह में।

उसके इश्क़ को ना ढूँढ दिल में,

अपने अंदर जो दीवारें बना रखीं है,

तोड़ आज़ाद हो जा हँस के।

तु भी झूमने लगेगा इस मद में।

अर्थ

शमा – सूफी नृत्य की रूहानी दुनिया।

रूमी – सूफ़ी दरवेश \ संत।

मंज़िल

सागर के इश्क़ में नदियाँ छोड़ आईं

पहाड़ों, हिम और हिमनदों को।

बहती नदियों को बस मालूम है इतना,

उनकी मंज़िल है,

साग़र के आग़ोश में।

क्या पता है इन्हें इनकी मंज़िल ….

…..सागर खारा मिलेगा?

एक छोटी सी बात

हम ख़ुशियाँ चुनते रहे।

और ना जाने कब

ज़िंदगी नाराज़ हो गई।

सब कहते रहे …..

एक छोटी सी बात थी।

हम बात तलाशते रहे पर

ना जाने क्यों ज़िंदगी नाराज़ हो गई।

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