अतृप्त तृष्णा

डॉ. रेखा रानी की मार्मिक कविता ‘अतृप्त तृष्णा’ अब प्रतिष्ठित ‘प्रतिज्ञान’ पत्रिका में प्रकाशित। इंसानी इच्छाओं के इस गहरे जीवन-दर्शन को Amazon Kindle पर पढ़ें।

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अत्यंत खुशी के साथ साझा कर रही हूँ!

मुझे आप सभी को यह बताते हुए बेहद खुशी हो रही है कि मेरी लिखी हुई कविता ‘अतृप्त तृष्णा’ प्रतिष्ठित ‘प्रतिज्ञान’ (Pratigyan) पत्रिका में प्रकाशित हुई है!

साहित्य की इस नई पहचान का हिस्सा बनना मेरे लिए बहुत गर्व की बात है। यह पत्रिका अब Amazon Kindle पर भी उपलब्ध है।

Atript Trishna Poem in Pratigyan Magazine

अतृप्त तृष्णा

हर इंसान आजीवन लड़ता रहता है,

नज़र न आने वाले

कई अनकहे युद्धों से-

कभी ख़ुद से,

कभी ज़माने से,

कभी लोगों से,

और कभी अपनी अतृप्त तृष्णाओं से।


यही तृष्णा

सुकून को मृगतृष्णा बना देती है,

इंसान भूल जाता है,

सफ़र-ए-ज़िंदगी कोई जंग नहीं,

बल्कि वह रूहानी सफ़र है,

जो हर अनुभव से,

हर ज़ख्म से हमें तराशता है।

ताकि हम

ख़ुद को ख़ुद से

बेहतर बना सके।

ताकि सुकून से भरे,

रौशन वजूद के साथ

जीवन के अगले मुकाम का

इस्तक़बाल कर सके।

आप सभी से अनुरोध है कि कृपया नीचे दिए गए लिंक पर जाकर किंडल (Kindle) पर पूरी पत्रिका पढ़ें और अपना प्यार एवं आशीर्वाद दें। 🙏

सधन्यवाद व स्नेह,

डॉ. रेखा रानी

इश्क़

इश्क़ सिर्फ एक रूहानी एहसास है या दिमाग में होने वाली केमिकल हलचल? डॉ. रेखा रानी के इस विशेष लेख में जानिए प्रेम का आध्यात्मिक, मनोवैज्ञानिक और वैज्ञानिक सच।

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❤ इश्क़ ❤️

रूहानी एहसास या दिल-दिमाग़ की केमिकल हलचल?

Love - Spiritual or Chemical

एक इंसान जो इश्क़ में हो, उसके लिए दुनिया की हर चीज़ से ज़्यादा ज़रूरी इश्क़ हो जाती है। इंसान वैसा नहीं रह जाता जैसा वह हुआ करता था। जो समय पर सोता-उठता था, वह देर रात जागता है, देर से उठता है। रातों में ऑनलाइन दिखता है—किसी के इंतज़ार में ।

जो कम बोलते थे, वे वाचाल हो जाते हैं। बोलने वाले शांत हो जाते हैं। उनके जीवन में किसी की एक छोटी-सी मुस्कान पूरा दिन खुशनुमा बना देती है। वे अक्सर गीतों को सुनने से ज़्यादा महसूस करने लगते हैं। न जाने ऐसे कितने बदलाव इश्क़ में डूबे इंसान में आ जाते हैं।

इश्क़ उलझी रहती है

हाँ–नहीं की गिरहों में,

ज़ेहन सवालों में,

दिल दुआओँ में।

सब्र बेसब्र करे,

रज़ा की चाहों में।

राह खोजें सुकून की,

रब तेरी पनाहों में।

सात्विक प्रेम क्या है : आध्यात्मिक अनुराग?

“पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय।

ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होए।।”

~ कबीर

आत्मा का परमात्मा से निर्विकार मन से मिलन की तड़प—आध्यात्मिक प्रेम है। जहाँ तन नहीं, पाने की प्यास नहीं, आत्मा की पहचान और एकाकार होने की चाह होती है। यह प्यार पावन है— राधा-कृष्ण, मीरा-कृष्ण, कबीर-राम, रूमी-शम्स जैसे आत्मिक और आध्यात्मिक प्रेम ।

आजकल इसी तर्ज़ पर कुछ शब्द बेहद प्रचलन में हैं— सोल-कनेक्शन, सोल-लव, सोलमेट, ट्विन-फ्लेम आदि, यानी जीवन को जीवंत बनाने वाला साथी।

इश्क़ का मनोविज्ञान : मन को टटोलें

मनोविज्ञान मानता है कि इश्क़ हमारी इमोशनल ज़रूरतों से जुड़ा होता है। हम सामने वाले को चाहते हैं, पर उसमें अपनी भावनात्मक ज़रूरतें भी ढूँढते हैं— जैसे एक्सेप्टेंस, अपने आप को स्वीकार किए जाने की चाह, वैलिडेशन, सुरक्षा, अपनापन, समझे जाने की इच्छा, ख़ुद का मोल समझा जाना।

मनोविज्ञान का मानना है कि मोहब्बत हमारे बचपन के अनुभवों, अटैचमेंट स्टाइल और अकेलेपन से जुड़ी होती है। इसीलिए इश्क़ इंसान को कभी मज़बूत बनाता है और कभी-कभी कमज़ोर और अति-संवेदनशील भी।

इश्क़ का विज्ञान : आइए झाँकें, दिमाग़ के अंदर क्या चल रहा है

विज्ञान कहता है—इश्क़ दिल का मामला नहीं है। यह दिमाग़ में चलने वाली केमिकल हलचल है। वास्तव में यह एक तार्किक और न्यूरोलॉजिकल प्रक्रिया है, जो हमें किसी एक इंसान के साथ जोड़ने और टिके रहने के लिए प्रोग्राम करती है। प्यार केमिकल बदलाव लाता है, और कुछ केमिकल बदलाव प्यार जैसी भावनाओं को जन्म देते हैं। यह एक दो-तरफ़ा प्रक्रिया है।

जब डोपामाइन Hormone का स्त्राव बढ़ जाता है— यह खुशी, एक्साइटमेंट और रिवॉर्ड का एहसास कराता है। बढ़ा हुआ ऑक्सीटोसिन भरोसा और बॉन्डिंग बढ़ाता है। एड्रेनालिन के बहाव से घबराहट और दिल की धड़कनें तेज़ हो जाती हैं।

कम सेरोटोनिन ऑब्सेशन और बार-बार एक ही बात सोचने की आदत बढ़ा देता है। इसी कारण इंसान जुनूनी, क्रेज़ी होकर एक ही इंसान पर फ़ोकस करने लगता है। ये सारे बदलाव व्यवहार में साफ़ नज़र आने लगते हैं।

क्या इश्क़ एडिक्शन या नशा है?

कुछ वैज्ञानिक अध्ययन बताते हैं कि इश्क़ में दिमाग़ का वही हिस्सा एक्टिव हो जाता है जो ड्रग्स और एडिक्शन में होता है। इसीलिए बात न हो तो बेचैनी होती है, और एक मैसेज या कॉल से मूड बेहतर हो जाता है। किसी के दूर जाने का ख़याल डराता है।

यानी इश्क़ एक स्वाभाविक नशा है, जो इंसान के पूरे सिस्टम पर असर डालता है। और एक ख़ास इंसान जीवन का रिवॉर्ड सिस्टम बन जाता है।

आख़िर में — प्रेम क्या है?

प्रेम के कई रूप होते हैं— रोमांटिक प्रेम की कशिश और आकर्षण, माँ-बच्चे का ममता-भरा निश्छल प्यार, पति-पत्नी का विश्वासपूर्ण साथ, परिवार और भाई-बहनों का स्नेह, और निस्वार्थ मित्रों की संगति।

प्रेम न सिर्फ़ हार्मोन है, न सिर्फ़ दिमाग़ की चाल। प्रेम वह हालत है जहाँ इंसान अपने “मैं” से निकलकर किसी “हम” की तरफ़ बढ़ता है। प्रेम जो इंसान को थोड़ा खो देता है, लेकिन सही प्रेम मिले तो ख़ुद को खुद से बेहतर भी बना देता है।

“Love is the water of life.

Drink it down with heart and soul.”

~ Rumi