कुछ गुल खिले और बिखर गए !

जीवनसाथी को खोने के दर्द, अनमोल यादों और फिर से उठ खड़े होने की उम्मीद को दर्शाती डॉ. रेखा रानी की हृदयस्पर्शी कविता “कुछ गुल खिले और बिखर गए”।

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कुछ गुल खिले और बिखर गए !

यादों, भावनाओं और फिर से उठ खड़े होने की एक दास्तान…

कुछ गुल खिले और हवा में बिखर गए!
उसकी ख़ुशबुओं को ना पकड़,
वे फ़िज़ा में घुल गए।
हम ना किसी के साथ आए थे, ना साथ किसी के जाएँगे।
ना साथ खिले थे, ना साथ मुरझाएँगे।

कुछ गुल खिले और बिखर गए!
ना भूल थी बयार की, ना भूल था नसीब का।
ना डाल दोष हवा पर, ना डाल दोष फुहार पर।
अख़्तियार ना था साँसों पर,
आगाह ना था मुस्तकबिल का… आने वाले समय का।

कुछ गुल खिले और बिखर गए!
फूलों की इक डाली थी।
हलकी सी लचकी,
और पंखुड़ियाँ बिखर गईं।
कई ज़िंदगियाँ इन जुंबिशों से बिखर गईं।

कुछ गुल खिले और बिखर गए!
कई पल बिना आवाज़, युगों से गुजर गए,
और हम बिखर गए।
ना पूछ बार-बार, वो मंजर,
यादें फिर ले जातीं हैं उन्हीं ग़मों के समंदर।

कुछ गुल खिले और बिखर गए!
किसने सोचा था बहारें आई हैं, पतझड़ भी आएगा।
हम सँवरा करते, आईना सवाँरा करता था।
अब खुद हीं यादों-ख़्वाबों की दुकान सजाते हैं,
खुद हीं ख़रीदार बन जातें हैं।

कुछ गुल खिले और बिखर गए!
ज़िंदगी हिसाब है वफ़ाओं,
जफ़ाओं और ख़ताओं की।
जो सदायें गूंजती हैं, गूंजने दे।
फिर बहारें आएगी, गुलशन सजाएँगी।

कुछ गुल खिले और बिखर गए।
आफ़ताब फिर आएगा,
गुनगुनी धूप की चादर फैलाएगा।
जो बिखर गया, वो बिखर गया।
रंज-ओ-मलाल में ना डूब।
चलानी है कश्ती ज़िंदगी की।

कुछ गुल खिले और बिखर गए।
ना ग़म कर, ना कम कर रौशनी अपनी,
ना बिखरने दे पंखुड़ियाँ अपनी,
फ़िज़ा में फैलने दे ख़ुशबू अपनी।
गुल खिलते हैं ख़ुशबू बिखेरने अपनी।

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कविता पाठ (मेरी आवाज़ में) 🎙️

अपने जीवनसाथी को खोने के बाद यह कविता मैंने लिखी थी,
आज वही कविता आपसे साझा कर रही हूँ।
आशा है, मेरे दिल से निकली यह आवाज़ आपके दिल तक पहुँचेगी।
क्योंकि सच्चा दर्द शब्दों में नहीं,
बस महसूस किया जाता है… दिल से दिल तक।

कुछ गुल खिले और बिखर गए !

“मेरी कविता में गुलों की खुशबू, फूलों की डाली, उनका बिखरना जीवन की क्षणभंगुरता के बारे में है। यादें, भावनाएँ और अनुभव अनमोल होती हैं। अक्सर दिल की कसक अंतरात्मा की गहराईयों से निकल लफ़्ज़ों में प्रतिबिम्ब हो कविता बन जातीं हैं। धैर्य और साहस से कठिनाइयों का सामना करना हीं जिंदगी है। जीवन-प्रवाह रुकता नहीं। किसी भी हादसे… चोट के बाद ख़ुद से, फिर से खुशियां खोजनी पड़ती है।”

यह कविता मैंने 2018 में मेरे पति के निधन के बाद लिखी थी।
(पहला ड्राफ्ट: 14 फरवरी 2021)

भावपूर्ण अभिव्यक्ति,

डॉ. रेखा रानी

अतृप्त तृष्णा

डॉ. रेखा रानी की मार्मिक कविता ‘अतृप्त तृष्णा’ अब प्रतिष्ठित ‘प्रतिज्ञान’ पत्रिका में प्रकाशित। इंसानी इच्छाओं के इस गहरे जीवन-दर्शन को Amazon Kindle पर पढ़ें।

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अत्यंत खुशी के साथ साझा कर रही हूँ!

मुझे आप सभी को यह बताते हुए बेहद खुशी हो रही है कि मेरी लिखी हुई कविता ‘अतृप्त तृष्णा’ प्रतिष्ठित ‘प्रतिज्ञान’ (Pratigyan) पत्रिका में प्रकाशित हुई है!

साहित्य की इस नई पहचान का हिस्सा बनना मेरे लिए बहुत गर्व की बात है। यह पत्रिका अब Amazon Kindle पर भी उपलब्ध है।

Atript Trishna Poem in Pratigyan Magazine

अतृप्त तृष्णा

हर इंसान आजीवन लड़ता रहता है,

नज़र न आने वाले

कई अनकहे युद्धों से-

कभी ख़ुद से,

कभी ज़माने से,

कभी लोगों से,

और कभी अपनी अतृप्त तृष्णाओं से।


यही तृष्णा

सुकून को मृगतृष्णा बना देती है,

इंसान भूल जाता है,

सफ़र-ए-ज़िंदगी कोई जंग नहीं,

बल्कि वह रूहानी सफ़र है,

जो हर अनुभव से,

हर ज़ख्म से हमें तराशता है।

ताकि हम

ख़ुद को ख़ुद से

बेहतर बना सके।

ताकि सुकून से भरे,

रौशन वजूद के साथ

जीवन के अगले मुकाम का

इस्तक़बाल कर सके।

आप सभी से अनुरोध है कि कृपया नीचे दिए गए लिंक पर जाकर किंडल (Kindle) पर पूरी पत्रिका पढ़ें और अपना प्यार एवं आशीर्वाद दें। 🙏

सधन्यवाद स्नेह,

डॉ. रेखा रानी