सुनहरा अवसर!

सभी कवियों और रचनाकारों के लिए सुनहरा अवसर! डॉ. रेखा रानी सहाय की आगामी पुस्तक “कतरा-कतरा ज़िंदगी का” में अपनी उत्कृष्ट कविता निःशुल्क प्रकाशित करवाएं। अपने शब्दों को दें एक नया और प्रतिष्ठित मंच।

Rate this:

सुनहरा अवसर - कतरा-कतरा ज़िंदगी का

📢 सुनहरा अवसर!

सभी रचनाकारों और कवियों के लिए…

हर इंसान के दिल में एक कोना ऐसा होता है, जहाँ कुछ यादें, कुछ जज़्बात और कुछ अनकही कहानियाँ छिप कर रहती हैं। हम उन्हीं एहसासों को एक किताब में पिरोने जा रहे हैं।

हमारी आगामी पुस्तक

“कतरा-कतरा ज़िंदगी का”

में अपनी कविता प्रकाशित करवाएं!

क्यों जुड़ें हमारे साथ?

  • 🌿
    यह एक निःशुल्क (Free) साहित्यिक पहल है।
  • 👥
    आपके शब्दों को एक नया और प्रतिष्ठित मंच मिलेगा।
  • 📖
    देश के बेहतरीन रचनाकारों के साथ आपकी कविता भी प्रकाशित होगी!

“अपनी कलम उठाईए… अपने दिल के अनछुए कोनों को पन्नों पर उतरने दीजिए…” 🖋️❤️

अपनी एक उत्कृष्ट कविता और अपना संक्षिप्त परिचय हमें यहाँ भेजें:


✉️ rekharanisahay@gmail.com

🗓️ अंतिम तिथि:
30 अक्टूबर!

अधिक जानकारी के लिए हमारे WhatsApp ग्रुप से जुड़ें:

WhatsApp QR Code


💬 WhatsApp ग्रुप ज्वाइन करें

भरम

जिंदगी सबसे बड़ी गुरु है, जो हमें तब तक सबक सिखाती है जब तक हम ‘भरम’ से बाहर निकलकर असल ‘इल्म’ (ज्ञान) नहीं सीख लेते। डॉ. रेखा रानी की एक बेहद गहरी और प्रेरणादायक कविता।

Rate this:

Bharam - Dr Rekha Rani Poetry

भरम

जिंदगी गुरु बन, तब तक सबक दोहराती रही,
हमें तराशने और खोने-पाने के
भरम से निकालने के लिए,
जब तक इल्म सीख न लिया।

~ Dr. Rekha Rani ♥️

कुछ गुल खिले और बिखर गए !

जीवनसाथी को खोने के दर्द, अनमोल यादों और फिर से उठ खड़े होने की उम्मीद को दर्शाती डॉ. रेखा रानी की हृदयस्पर्शी कविता “कुछ गुल खिले और बिखर गए”।

Rate this:

कविता पाठ (मेरी आवाज़ में)

कुछ गुल खिले

कुछ गुल खिले और हवा में बिखर गए! उनकी ख़ुशबुओं को ना पकड़,
वे फ़िज़ा में घुल गए।

हम न किसी के साथ आए थे,
न साथ किसी के जाएँगे।
न साथ खिले थे,
न साथ मुरझाएँगे।

कुछ गुल खिले और हवा में —-बिखर गए।

न भूल थी बयार की,
न भूल थी नसीब की।
न डाल दोष हवा पर,
न डाल दोष बूँदों पर।

अख़्तियार न था साँसों पर,
आग़ाह न था मुस्तकबिल का,
नावाक़िफ़ थे आने वाले कल से।

फूलों की इक डाली हवा से लचकी,
कई ज़िंदगियों को जुंबिशें दे,
पंखुड़ियाँ बिखर गईं। 

कुछ गुल खिले और हवा में बिखर गए।

कई पल बिना आवाज़
युगों से गुज़र गए,
और हम बिखर गए।

न पूछ बार–बार वो मंज़र,
फिर ले जाते हैं
उसी ग़म के समंदर।

किसने सोचा था—
बहारें आई हैं,
पतझड़ भी आएगा।

हम सँवरा करते,
आईना सँवारा करता था।
अब ख़ुद ही ख़्वाबों की दुकानें सजाते है,
ख़ुद ही ख़रीदार बन जाते हैं।

ज़िंदगी हिसाब है
वफ़ाओं, जफ़ाओं
और ख़ताओं का।

जो सदाएँ गूँजती हैं,
गूँजने दे। 

फिर बहारें आएँगी,
गुलशन सजाएँगी।
आफ़ताब फिर आएगा,
गुनगुनी धूप की चादर फैलाएगा।

कुछ गुल खिले और हवा में बिखर गए!
उनकी ख़ुशबुओं को न पकड़।
जो बिखर गए,
वो बिखर गए।

रंजो–मलाल में डूब नहीं,
चलानी है कश्ती ज़िंदगी की।
न ग़म कर,
न कम कर रौशनी अपनी।
फ़िज़ा में फैलने दे,
ख़ुशबू अपनी। 

न ग़म कर,
न कम कर रौशनी अपनी।
फ़िज़ा में फैलने दे
ख़ुशबू अपनी। 

कुछ गुल खिले और हवा में बिखर गए!
उनकी ख़ुशबुओं को न पकड़,
वे फ़िज़ा में घुल गए।  

“मेरी कविता में गुलों की खुशबू, फूलों की डाली, उनका बिखरना जीवन की क्षणभंगुरता के बारे में है। यादें, भावनाएँ और अनुभव अनमोल होती हैं। अक्सर दिल की कसक अंतरात्मा की गहराईयों से निकल लफ़्ज़ों में प्रतिबिम्ब हो कविता बन जातीं हैं। धैर्य और साहस से कठिनाइयों का सामना करना हीं जिंदगी है। जीवन–प्रवाह रुकता नहीं। किसी भी हादसे… चोट के बाद ख़ुद से, फिर से खुशियां खोजनी पड़ती है।“

यह कविता मैंने 2018 में मेरे पति के निधन के बाद लिखी थी।

भावपूर्ण अभिव्यक्ति,

डॉ. रेखा रानी

अतृप्त तृष्णा

डॉ. रेखा रानी की मार्मिक कविता ‘अतृप्त तृष्णा’ अब प्रतिष्ठित ‘प्रतिज्ञान’ पत्रिका में प्रकाशित। इंसानी इच्छाओं के इस गहरे जीवन-दर्शन को Amazon Kindle पर पढ़ें।

Rate this:

🎉 📖 ✨

अत्यंत खुशी के साथ साझा कर रही हूँ!

मुझे आप सभी को यह बताते हुए बेहद खुशी हो रही है कि मेरी लिखी हुई कविता ‘अतृप्त तृष्णा’ प्रतिष्ठित ‘प्रतिज्ञान’ (Pratigyan) पत्रिका में प्रकाशित हुई है!

साहित्य की इस नई पहचान का हिस्सा बनना मेरे लिए बहुत गर्व की बात है। यह पत्रिका अब Amazon Kindle पर भी उपलब्ध है।

Atript Trishna Poem in Pratigyan Magazine

अतृप्त तृष्णा

हर इंसान आजीवन लड़ता रहता है,

नज़र न आने वाले

कई अनकहे युद्धों से-

कभी ख़ुद से,

कभी ज़माने से,

कभी लोगों से,

और कभी अपनी अतृप्त तृष्णाओं से।


यही तृष्णा

सुकून को मृगतृष्णा बना देती है,

इंसान भूल जाता है,

सफ़र-ए-ज़िंदगी कोई जंग नहीं,

बल्कि वह रूहानी सफ़र है,

जो हर अनुभव से,

हर ज़ख्म से हमें तराशता है।

ताकि हम

ख़ुद को ख़ुद से

बेहतर बना सके।

ताकि सुकून से भरे,

रौशन वजूद के साथ

जीवन के अगले मुकाम का

इस्तक़बाल कर सके।

आप सभी से अनुरोध है कि कृपया नीचे दिए गए लिंक पर जाकर किंडल (Kindle) पर पूरी पत्रिका पढ़ें और अपना प्यार एवं आशीर्वाद दें। 🙏

सधन्यवाद व स्नेह,

डॉ. रेखा रानी

मेरी पुस्तक समीक्षा!

मेरी पुस्तक की प्रतिष्ठित ‘प्रतिज्ञान पत्रिका’ में प्रकाशित विशेष समीक्षा मेरे साहित्यिक सफर का एक महत्वपूर्ण पड़ाव है—यह लेख उसी खुशी और उपलब्धि की एक झलक है।

Rate this:

✧ ✦ ✧

“प्रतिज्ञान पत्रिका” में मेरी पुस्तक की विशेष समीक्षा! 🌟

Pratigyan Patrika Review

नमस्कार!

आज का दिन मेरे साहित्यिक सफर के लिए बेहद खास और उत्साहवर्धक है। एक लेखिका के रूप में जब आपके शब्दों और विचारों को सही पहचान और सराहना मिलती है, तो वह पल शब्दों में बयां करना मुश्किल होता है। मुझे आप सभी के साथ यह साझा करते हुए अत्यंत प्रसन्नता हो रही है कि मेरी पुस्तक की “प्रतिज्ञान पत्रिका” में एक बेहद विस्तृत और खूबसूरत समीक्षा प्रकाशित हुई है!

इस खास मौके और खुशी की एक छोटी सी झलक आप मेरे इस इंस्टाग्राम रील में देख सकते हैं:

साहित्य प्रेमियों के लिए ‘प्रतिज्ञान’ एक बहुत ही प्रतिष्ठित नाम है। हाल ही में उन्होंने अपना ‘वार्षिक संचयन २०२६’ पेपरबैक के रूप में प्रकाशित किया है। यह संचयन बीते एक वर्ष की बेहतरीन साहित्यिक रचनाओं — कहानियों, कविताओं और समीक्षाओं — का एक अनूठा संग्रह है। ऐसे उत्कृष्ट और विविध विधाओं से सजे संस्करण में मेरी पुस्तक की चर्चा होना, मेरे लिए बहुत बड़े सम्मान की बात है。

मैं चाहूँगी कि आप सभी साहित्य के इस खूबसूरत उत्सव का हिस्सा बनें। यदि आप बेहतरीन साहित्यिक रचनाओं को पढ़ने के शौकीन हैं, तो यह वार्षिक अंक आपकी बुकशेल्फ़ की शोभा अवश्य बढ़ाएगा। आप इस विशेषांक की अपनी प्रति सीधे यहाँ से ऑर्डर कर सकते हैं:

हृदय से आभार! ❤️

अंत में, मैं अपने सभी पाठकों और शुभचिंतकों का हृदय से धन्यवाद करना चाहती हूँ। आपके निरंतर प्रेम, समर्थन और प्रोत्साहन के बिना यह साहित्यिक यात्रा संभव नहीं थी। अपना स्नेह ऐसे ही बनाए रखें। लिंक पर क्लिक करके अपनी प्रति अवश्य ऑर्डर करें, और इंस्टाग्राम पर रील देखकर मुझे अपने विचार और प्रतिक्रिया ज़रूर बताएं!

सस्नेह,
डॉ. रेखा रानी ✨

✧ ✦ ✧

प्रतिज्ञान

प्रेम विशेषांक में मेरी नई रचना ‘भरम’

कविता भरम - प्रतिज्ञान

साहित्य और मानवीय संवेदनाओं के इस खूबसूरत सफर में, मुझे यह साझा करते हुए अपार हर्ष हो रहा है कि ‘प्रतिज्ञान प्रकाशन’ के नवीनतम अंक (अंक 6 – प्रेम विशेषांक) में मेरी स्वरचित कविता ‘भरम’ प्रकाशित हुई है।

यह अंक प्रेम के उन अनछुए और यथार्थवादी पहलुओं पर बात करता है जो अक्सर खामोशियों में छिपे रह जाते हैं। मेरी कविता ‘भरम’ भी इश्क़ की उसी अजब कहानी और दूर क्षितिज पर सागर-आसमान के मिलन जैसी बेचैनी को दर्शाती है।

भरम

अजब है इश्क़ की ये कहानी,
आसमान की नीली परछाइयों में रंगा है समुंदर,
दूर क्षितिज पर आसमान–सागर
के मिलन का है भरम भरा नजरिया।
हर लहर में मिलन की तड़प है।
हर सैलाब में बेचैनी, पूनम की रातों में
नज़र आती है……
फ़लक छू लेने की आरजू-ए-बेचैनी हैं।
इश्क़ पर टिकी ज़िंदगानी,
अजब है इश्क़ की ये कहानी।

यदि आप भी साहित्य प्रेमी हैं और प्रेम के इस सफर को महसूस करना चाहते हैं, तो इस अंक को जरूर पढ़ें और अपना स्नेह दें।

— डॉ. रेखा रानी