
भरम
जिंदगी गुरु बन, तब तक सबक दोहराती रही,
हमें तराशने और खोने-पाने के
भरम से निकालने के लिए,
जब तक इल्म सीख न लिया।
~ Dr. Rekha Rani ♥️
जिंदगी सबसे बड़ी गुरु है, जो हमें तब तक सबक सिखाती है जब तक हम ‘भरम’ से बाहर निकलकर असल ‘इल्म’ (ज्ञान) नहीं सीख लेते। डॉ. रेखा रानी की एक बेहद गहरी और प्रेरणादायक कविता।
जीवनसाथी को खोने के दर्द, अनमोल यादों और फिर से उठ खड़े होने की उम्मीद को दर्शाती डॉ. रेखा रानी की हृदयस्पर्शी कविता “कुछ गुल खिले और बिखर गए”।
कविता पाठ (मेरी आवाज़ में)
कुछ गुल खिले और हवा में बिखर गए! उनकी ख़ुशबुओं को ना पकड़,
वे फ़िज़ा में घुल गए।
हम न किसी के साथ आए थे,
न साथ किसी के जाएँगे।
न साथ खिले थे,
न साथ मुरझाएँगे।
कुछ गुल खिले और हवा में —-बिखर गए।
न भूल थी बयार की,
न भूल थी नसीब की।
न डाल दोष हवा पर,
न डाल दोष बूँदों पर।
अख़्तियार न था साँसों पर,
आग़ाह न था मुस्तकबिल का,
नावाक़िफ़ थे आने वाले कल से।
फूलों की इक डाली हवा से लचकी,
कई ज़िंदगियों को जुंबिशें दे,
पंखुड़ियाँ बिखर गईं।
कुछ गुल खिले और हवा में बिखर गए।
कई पल बिना आवाज़
युगों से गुज़र गए,
और हम बिखर गए।
न पूछ बार–बार वो मंज़र,
फिर ले जाते हैं
उसी ग़म के समंदर।
किसने सोचा था—
बहारें आई हैं,
पतझड़ भी आएगा।
हम सँवरा करते,
आईना सँवारा करता था।
अब ख़ुद ही ख़्वाबों की दुकानें सजाते है,
ख़ुद ही ख़रीदार बन जाते हैं।
ज़िंदगी हिसाब है
वफ़ाओं, जफ़ाओं
और ख़ताओं का।
जो सदाएँ गूँजती हैं,
गूँजने दे।
फिर बहारें आएँगी,
गुलशन सजाएँगी।
आफ़ताब फिर आएगा,
गुनगुनी धूप की चादर फैलाएगा।
कुछ गुल खिले और हवा में बिखर गए!
उनकी ख़ुशबुओं को न पकड़।
जो बिखर गए,
वो बिखर गए।
रंजो–मलाल में डूब नहीं,
चलानी है कश्ती ज़िंदगी की।
न ग़म कर,
न कम कर रौशनी अपनी।
फ़िज़ा में फैलने दे,
ख़ुशबू अपनी।
न ग़म कर,
न कम कर रौशनी अपनी।
फ़िज़ा में फैलने दे
ख़ुशबू अपनी।
कुछ गुल खिले और हवा में बिखर गए!
उनकी ख़ुशबुओं को न पकड़,
वे फ़िज़ा में घुल गए।
“मेरी कविता में गुलों की खुशबू, फूलों की डाली, उनका बिखरना जीवन की क्षणभंगुरता के बारे में है। यादें, भावनाएँ और अनुभव अनमोल होती हैं। अक्सर दिल की कसक अंतरात्मा की गहराईयों से निकल लफ़्ज़ों में प्रतिबिम्ब हो कविता बन जातीं हैं। धैर्य और साहस से कठिनाइयों का सामना करना हीं जिंदगी है। जीवन–प्रवाह रुकता नहीं। किसी भी हादसे… चोट के बाद ख़ुद से, फिर से खुशियां खोजनी पड़ती है।“
यह कविता मैंने 2018 में मेरे पति के निधन के बाद लिखी थी।
भावपूर्ण अभिव्यक्ति,
डॉ. रेखा रानी
काव्य प्रतियोगिता में विजेता रही डॉ. रेखा रानी की हृदयस्पर्शी कविता ‘जिंदगी के अनदेखे तमगे’। यह कविता जीवन के संघर्षों, तकलीफों और मानवता के गहरे पाठ को खूबसूरती से दर्शाती है।
🏆काव्य प्रतियोगिता में विजयी!🏆
मुझे यह साझा करते हुए अत्यंत खुशी हो रही है कि “India’s Biggest Book Giveaway – काव्य प्रतियोगिता” में मेरी इस कविता को शीर्ष 5 विजेताओं में चुना गया है। आप सभी के प्रेम, प्रोत्साहन और समर्थन के लिए हृदय से आभार!

( कविता – मानवता )
ऊंची पथरीली चट्टानों,
शैल-शिखरों पर उगने वाले
दरख़्तों की जड़े
वक्त की सख्त मार,
तूफानों के थपेड़े सह,
वक्त से पहले जिम्मेदार
गहरी मजबूत हो जाती है।
❖ ❖ ❖
जिंदगी भी कुछ यूं ही,
चोटें, जख्म, तकलीफें दे
फना होने की हद तक आजमाती है।
जो इन तमाम दर्दों से उठकर
आगे बढ़ता है,
उसकी जड़ें भी गहरी, मजबूत हो जाती हैं।
वे दूसरों के संघर्षों को
समझना और सम्मान देना सीख जाते हैं।
❖ ❖ ❖
जीवन के थपेड़े सहकार,
गिर कर भी जो संभल जाएं,
उनके कदमों को फिर
कोई तूफान डिगा नहीं सकता।
बेरहम वक्त की मार से बने
ये जख्म और उनके निशान ही असल में
जिंदगी के पाठ और अनदेखें तमगे हैं।
~ डॉ. रेखा रानी
कल की छुई-मुई बेटियां कब बड़ी होकर घर-परिवार की जिम्मेदारी कंधों पर उठा लेती हैं, पता ही नहीं चलता। डॉ. रेखा सहाय की यह मर्मस्पर्शी कविता बेटियों के त्याग, ममता और उनके अटूट साहस को एक भावपूर्ण सलाम है। जरूर पढ़ें और साझा करें।