मगरपट्टा सिटी भजन संध्या

गणपति उत्सव के पावन अवसर पर हमारी सीनियर सिटीजन महिला समूह द्वारा प्रस्तुत एक सुमधुर भजन संध्या। इस विशेष प्रस्तुति में मराठी, संस्कृत, हिंदी और तमिल भाषाओं में गाए गए भजनों का आनंद लें।

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🌸 गणपति उत्सव की हार्दिक शुभकामनाएँ! 🌸

इस भजन संध्या में हमारी महिला समूह ने दर्शकों के समक्ष मराठी, संस्कृत, हिंदी, और तमिल— चार भाषाओं में भजन प्रस्तुत किया ।

🙏 विशेष मार्गदर्शन: इस समूह में हमारी गुरु Kalyani Gurumurthy जी का विशेष मार्गदर्शन और आशीर्वाद हमें प्राप्त है।

🎤 इस प्रस्तुति में भाग लिया था

1. Aparna Mahesh
2. Chandraprabha Kaushal
3. Chithra Jaggar
4. Chithra Jayashilan
5. Jaishri Zanwar
6. Lakshmi Moni
7. Prema Thakur
8. Rajalakshmi Raman
9. Rajalakshmi Rangarajan
10. Shyamala Shrinivas
11. Sonia Sidhwani
12. Sonal Arora
13. Veena murthy
14. Shanta ji

15. Rekha Sahay

🎵 वाद्ययंत्र संगत (Accompanists)

🎹 Harmonium: Shishir ji
🪘 Dholki: Vignesh
🥁 Mridangam: Ramakrishnan ji

‘ढाक के तीन पात’

‘ढाक के तीन पात’ मुहावरे की उत्पत्ति से लेकर पलाश वृक्ष के पर्यावरणीय, सांस्कृतिक और आयुर्वेदिक महत्व तक—जानिए क्यों यह अद्भुत वृक्ष पथरीली जमीन में भी जीवन का संदेश देता है और भारतीय परंपरा में विशेष स्थान रखता है।

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कहां से आया ‘ढाक के तीन पात’ वाला मुहावरा, एक पौधा जो पथरीली जमीन में भी उग जाता है

✍️ डॉ. रेखा रानी

Palash Tree Full View

‘जंगल की ज्वाला‘ – पलाश का वृक्ष

दक्षिण एशिया और भारतीय उपमहाद्वीप के इंडो-गंगा मैदानों और वनों में पाया जाने वाला पलाश सिर्फ एक पेड़ नहीं बल्कि पर्यावरण संतुलन और पारिस्थितिक तंत्र का एक महत्वपूर्ण आधार है। पलाश, वन्य जीवों के साथ गहराई से जुड़ा है। होली के आसपास इस पर्णपाति वृक्ष के सभी पत्ते गिर जाते हैं। इसके बाद से यह केसरिया-नारंगी फूलों से ढक जाता है, तब ‘जंगल ज्वाला’ पलाश दूर से आग जैसा प्रतीत होता है। पलाश के फूलों को उबालकर प्राकृतिक केसरिया रंग बनाया जाता है। इस त्रिपर्णी ढाक वृक्ष की डंडियों में हमेशा तीन पत्ते होते। इसी से प्रसिद्ध मुहावरा, ‘ढाक के तीन पात’ बना है।

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पथरीली जमीन पर भी उगता है पलाश

पलाश कड़ी गर्मी, शुष्क, पथरीली और बंजर भूमि में भी सरलता से उगता और पनपता है। इसकी मजबूत, गहरी जड़ें और कठोर बनावट इसे सूखा-रोधी बनता है। इससे यह विपरीत परिस्थितियों में भी अपने आस-पास हरियाली बनाए रखता है। पलाश, परागण करने वाले जीवों के लिए एक मजबूत सपोर्ट सिस्टम है। पलाश के चटक नारंगी फूल तोते की चोंच की तरह मुड़े हुए और आकाश की ओर ऊपर उठे होते हैं, जो पक्षियों, मधुमक्खियां और तितलियों को आकर्षित कर परागण को बढ़ावा देते हैं।

Palash Flowers Close Up

तोते की चोंच की तरह मुड़े पलाश के फूल

पलाश नाइट्रोजन स्थिरीकरण कर मिट्टी की उर्वरता बढ़ाता और पोषण चक्र सुदृढ़ करता है। इससे वनों और वनस्पतियों को लाभ मिलता है।

पलाश के फूल, पत्ते और बीज अनेक वन्य जीवों के लिए भोजन का स्रोत है। पक्षी और कीट इसके रस का सेवन करते हैं, जिससे परागण बढ़ता है। छोटे वन्य जीव इसके बीजों के प्रसार में सहायता करते हैं जो पलाश के जीवन चक्र को बनाए रखता है। यह तालमेल वन विविधता के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

पलाश, पर्यावरण संरक्षण के साथ वनों के सतत विकास के लिए भी उपयोगी है। अंतरराष्ट्रीय शोध में इसे नाइट्रोजन फिक्सिंग वृक्ष, पोलिनेटर सपोर्टिंग स्पीशीज और ड्राई फॉरेस्ट रेस्टोरेशन प्लांट माना गया है। भारतीय मान्यता के अनुसार पलाश रेन इंडिकेटर वृक्ष है।

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पलाश का सांस्कृतिक महत्व

पलाश के शुभ त्रिपत्रों को ब्रह्मा-विष्णु-महेश या सत-रज-तम का प्रतीक माना गया है। संस्कृत ग्रंथ इसे अग्नि ऊर्जा और पुनर्जन्म का प्रतीक मानते हैं। इसकी सूखी लकड़ियां यज्ञ और पुष्प लक्ष्मी प्राप्ति के लिए उपयोग में लाया जाता है। आयुर्वेद में पलाश के फूल, जड़ें, गोंद, पत्तियां और बीज कई रोगों के उपचार में इस्तेमाल की जाती हैं।

लोक कथा के मुताबिक किसी प्रेयसी के विरह-अश्रु से पलाश का जन्म हुआ। जिसकी विरह ज्वाला से इसके फूल अग्नि-रंग के हो गए। महाकवि कालिदास और जयदेव की रचनाओं में पलाश को प्रेम और विरह का प्रतीक बताया गया है। पलाश जैसे प्रतिष्ठित वृक्ष को अध्यात्म और आयुर्वेद, ज्ञान और मन-शरीर संतुलन से जोड़ते हैं। इस तरह की मान्यताएं पेड़ों का संरक्षण प्रदान करती हैं। पलाश वन्य-जीव और प्रकृति के बीच संतुलन की मजबूत कड़ी है। यह वृक्ष हमें सिखाता है- प्रकृति का हर तत्व ब्रह्मांड संतुलन का अनिवार्य हिस्सा है।

हमारी बेटियां

कल की छुई-मुई बेटियां कब बड़ी होकर घर-परिवार की जिम्मेदारी कंधों पर उठा लेती हैं, पता ही नहीं चलता। डॉ. रेखा सहाय की यह मर्मस्पर्शी कविता बेटियों के त्याग, ममता और उनके अटूट साहस को एक भावपूर्ण सलाम है। जरूर पढ़ें और साझा करें।

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Hamari Betiyan Image

हमारी बेटियां

कल की हमारी छुई-मुई बेटियां अचानक बड़ी हो जाती है…

अब वो रसोई संभालती है और रिश्ते भी,

बच्चे संभालती है और काम-काज भी।

कई हसरतों को दिल में क़ैद कर,

मुस्कान को इबादत बना लेती है।

कई बार अपनी ख़्वाहिशों को दरकिनार कर,

परिवार के अरमान संजों देती है।

थकान को चादर की तह में छुपाकर,

दर्द की तहरीर दिल में दबाकर,

लबों पर दुआ सजा लेती है।

वो आँचल में अमन की ख़ुशबू बसाए,

हर रोज़ ख़ुद को भूलकर भी

अपनी दुनिया सँवार लेती है।

कल की हमारी छुई-मुई बेटियाँ

अचानक बड़ी हो जाती है…