अतृप्त तृष्णा

डॉ. रेखा रानी की मार्मिक कविता ‘अतृप्त तृष्णा’ अब प्रतिष्ठित ‘प्रतिज्ञान’ पत्रिका में प्रकाशित। इंसानी इच्छाओं के इस गहरे जीवन-दर्शन को Amazon Kindle पर पढ़ें।

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अत्यंत खुशी के साथ साझा कर रही हूँ!

मुझे आप सभी को यह बताते हुए बेहद खुशी हो रही है कि मेरी लिखी हुई कविता ‘अतृप्त तृष्णा’ प्रतिष्ठित ‘प्रतिज्ञान’ (Pratigyan) पत्रिका में प्रकाशित हुई है!

साहित्य की इस नई पहचान का हिस्सा बनना मेरे लिए बहुत गर्व की बात है। यह पत्रिका अब Amazon Kindle पर भी उपलब्ध है।

Atript Trishna Poem in Pratigyan Magazine

अतृप्त तृष्णा

हर इंसान आजीवन लड़ता रहता है,

नज़र न आने वाले

कई अनकहे युद्धों से-

कभी ख़ुद से,

कभी ज़माने से,

कभी लोगों से,

और कभी अपनी अतृप्त तृष्णाओं से।


यही तृष्णा

सुकून को मृगतृष्णा बना देती है,

इंसान भूल जाता है,

सफ़र-ए-ज़िंदगी कोई जंग नहीं,

बल्कि वह रूहानी सफ़र है,

जो हर अनुभव से,

हर ज़ख्म से हमें तराशता है।

ताकि हम

ख़ुद को ख़ुद से

बेहतर बना सके।

ताकि सुकून से भरे,

रौशन वजूद के साथ

जीवन के अगले मुकाम का

इस्तक़बाल कर सके।

आप सभी से अनुरोध है कि कृपया नीचे दिए गए लिंक पर जाकर किंडल (Kindle) पर पूरी पत्रिका पढ़ें और अपना प्यार एवं आशीर्वाद दें। 🙏

सधन्यवाद स्नेह,

डॉ. रेखा रानी

जिंदगी के अनदेखें तमगे

काव्य प्रतियोगिता में विजेता रही डॉ. रेखा रानी की हृदयस्पर्शी कविता ‘जिंदगी के अनदेखे तमगे’। यह कविता जीवन के संघर्षों, तकलीफों और मानवता के गहरे पाठ को खूबसूरती से दर्शाती है।

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🏆काव्य प्रतियोगिता में विजयी!🏆

मुझे यह साझा करते हुए अत्यंत खुशी हो रही है कि “India’s Biggest Book Giveaway – काव्य प्रतियोगिता” में मेरी इस कविता को शीर्ष 5 विजेताओं में चुना गया है। आप सभी के प्रेम, प्रोत्साहन और समर्थन के लिए हृदय से आभार!

Poetry Winner Announcement

जिंदगी के अनदेखें तमगे

( कविता – मानवता )

ऊंची पथरीली चट्टानों,
शैल-शिखरों पर उगने वाले
दरख़्तों की जड़े
वक्त की सख्त मार,
तूफानों के थपेड़े सह,
वक्त से पहले जिम्मेदार
गहरी मजबूत हो जाती है।

❖ ❖ ❖

जिंदगी भी कुछ यूं ही,
चोटें, जख्म, तकलीफें दे
फना होने की हद तक आजमाती है।
जो इन तमाम दर्दों से उठकर
आगे बढ़ता है,
उसकी जड़ें भी गहरी, मजबूत हो जाती हैं।
वे दूसरों के संघर्षों को
समझना और सम्मान देना सीख जाते हैं।

❖ ❖ ❖

जीवन के थपेड़े सहकार,
गिर कर भी जो संभल जाएं,
उनके कदमों को फिर
कोई तूफान डिगा नहीं सकता।
बेरहम वक्त की मार से बने
ये जख्म और उनके निशान ही असल में
जिंदगी के पाठ और अनदेखें तमगे हैं।

~ डॉ. रेखा रानी

बातें

चेहरा

चेहरे पर ना जाओ,

चेहरे की मुस्कान पर ना जाओ।

यह कुछ बताती है,

पर बहुत कुछ है छुपाती।

बाँसुरी की मीठी तान

उसके अंदर के ख़ालीपन….

शून्यता और रिक्तता के दर्द से है बहती।

 

आँखों की हँसी पर ना जाओ।

शुष्क नदी देखी है कभी?

गौर से देखो तब नज़र आएगी नमी।

ऊपर से सूखी निर्झरिणी फल्गु के

रेत के नीचे भी है बहती एक नदी।

 

पूरे चाँद के रात की

बिखरी चाँदनी पर ना जाओ।

मिला है उसे यह ज्योत्सना,

चाँद के अमावस से पूनम तक के

अधूरे-पूरे होने के सफ़र से।

 

दमकते चेहरे पर ना जाओ।

रौशन आफ़ताब से पूछो

दमकने और उजाला फैलाने की तपिश।

हर चेहरे के पीछे छुपे होतें हैं,

हज़ारों चेहरे।

पढ़ सको तो पढ़ो।

 

काँपते-लरजते होंठों की मुस्कुराहट पर ना जाओ

कि………

रौशन रहते हैं समाधि और मज़ार भी चरागों से।

 

 

किवदन्तियाँ / पौराणिक कहानी- फल्गु नदी गया, बिहार में है। यह ऊपर से सूखी दिखती है। इसके रेत को हटाने से जल मिलता है। कहते है कि राम और सीता यहाँ राजा दशरथ का पिंडदान करने गए। राम समय पर नही आ सके। अतः ब्राह्मण के कहने पर सीता जी ने पिंडदान सम्पन्न कर दिया। राम के आने पर, उनके क्रोध से बचने के लिए फल्गु नदी ने झूठ कहा कि माता सीता ने पिंडदान नहीं किया है। माता सीता ने आक्रोशित होकर फल्गु नदी को अततः सलिला ( रेत के नीचे बहाने का) होने का श्राप दे दिया.

बेख़ुदी में

क़बूल भी नहीं कर सकते और इनकार भी नहीं कर सकते……

सचमुच देखा था तुम्हें क़रीब अपने.

हाथ भी बढ़ाया छूने के लिए.

तभी नींद खुल गईं और देखा बाहें शून्य में फैलीं हैं.

शायद सपने में घड़ी की सुईयों को पीछे घुमाते चले गए थे.

शायद बेख़ुदी में तुमको पुकारे चले गए थे.

 

Image- Aneesh

पड़ाव

जब भी कहीं डेरा डालना चाहा.

रुकना चाहा.

ज़िंदगी आ कर कानों में धीरे से कह गई-

यह भी बस एक पड़ाव है…

ठहराव है जीवन यात्रा का.

अभी आगे बढ़ना है,

चलते जाना है. बस चलते जाना है.

 

image courtesy – Aneesh

फासले भी मायने रखते हैं !!

हमेशा क़रीब होना हीं सही नही।

बहुत क़रीब से देखने पर पूरे दृश्य को नहीं देखा जा सकता है।

वे धुँधली हो जातीं हैं।

परिदृश्य या घटना का हिस्सा बन कर पूरी बातें नहीं समझी जा सकती हैं.

जैसे चित्र में रह कर चित्र देखा नहीं जा सकता.

थोङे फासले भी मायने रखते हैं।

तारीख़ों में छुपी कहानियाँ

तारीख़ों में छुपी हैं कितनी कहानियाँ.

किसी तारीख़ से जुड़ी होतीं हैं यादें,

किसी से दर्द, किसी से ख़ुशियाँ.

किसी से उम्मीद, आशाएँ और अरमान.

 और कुछ तारीख़ें कब आ कर चली जातीं हैं,

पता हीं नहीं चलता.

ग़ज़ल सी ज़िंदगी…..

सँवरी, ग़ज़ल सी ज़िंदगी जीने की हसरतें

 किसकी नहीं होती? अौर, जो मिला है वही ग़ज़ल है।

यह समझते समझते ज़िंदगी निकल जाती है.

सूरज तो निकलेगा !

टिमटिमाते तारे, जगमगाते जुगनू, दमकता चाँद , नन्हें दीपक की हवा से काँपती लौ, सभी अपनी पूरी ताक़त से रात के अंधेरे का सामना करते हैं. फिर हम क्यों नहीं कर सकते सामान ? सहर तो होगी हीं….सूरज तो निकलेगा हीं….