सूरज

थका हरा सूरज रोज़ ढल जाता है.

अगले दिन हौसले से फिर रौशन सवेरा ले कर आता है.

कभी बादलो में घिर जाता है.

फिर वही उजाला ले कर वापस आता है.

ज़िंदगी भी ऐसी हीं है.

बस वही सबक़ सीख लेना है.

पीड़ा में डूब, ढल कर, दर्द के बादल से निकल कर जीना है.

यही जीवन का मूल मंत्र है.

वक़्त

वक़्त-वक़्त की बात है, कभी छुट्टियों की कमी की शिकायत थी, आज छुट्टियाँ है तब काम याद आ रहा है. कभी शोर-कोलाहल कानों को चुभता था. अब शांति हीं शांति है तब पुराने दिन याद आ रहें हैं. यह नाराज़गी और बेचैनी क्यों? यह वक़्त भी गुज़र जाएगा.

Image courtesy- Aneesh

चीन और चमगादड़ Wet market of China

लोग हो ना हों, हौसले इनके ज़िन्दा हैं.

इतनी जल्दी भूल गए,

वेट बाज़ार- कोरोना कितना बड़ा फंदा है?

अपनी नहीं चिंता अगर,

दुनिया की तो सोचों.

इन चमगादड़, पैंगोलीन, कुत्तों की सोचों…….