कम लफ़्ज़

बेआवाज़ सदायें

असर

मुनासिब

रूह का सफ़र

ख़ुद में उतरने का हुनर

इश्क़-ए-रूह

रूह की राहें

चराग़-ए-रहगुज़र रौशन करता है।
मुसाफिर की अँधेरी राहों को।
जब दिल में चराग़ जल उठते हैं,

रौशन करते हैं रूह की राहें को।

अर्थ –
चराग़-ए-रहगुज़र – lamp on the way

तुम चाहते हो….

चाहत मेरी या चाहत तेरी,

है क्या रूबरू हक़ीक़त से?

कहते हैं मिल जाती है कायनात,

चाहो ग़र शिद्दत से।

पर कुछ हसरतें, रह जातीं हैं हसरतें।

ग़र तुम चाहते हो किसी को रूह से

तब बनी रहेगी यह

मद्धम सी लौ-ए-चाहत अनंत तक।

आसमाँ और ज़मीं, सूरज और चाँद की उल्फ़त सी।

कुछ चाहतों में मिलन नहीं,

होती हैं ये चाहतें, चाहते रहने के लिये।

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विचलित नहीं होना मन मेरे

विचलित नहीं होना मन मेरे, देख कफ़न का सफ़ेद नूर।

यह तो है राह-ए-सुकून, दुनिया के दुःख-दर्द से दूर।

होते हैं कई बदकिस्मत बे-कफ़न

होते है कुछ जीते-जी मद में चूर।

भूल जाते है ज़िंदगी है रूहानियत,

समझदारी है, नही रखने में ग़ुरूर।

कफ़न में जेब नहीं होती, यह है मशहूर।

कर्मों की वसीयत होती है रूह पर ज़रूर।

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