कोई अपनी ही नजर से तो हमें देखेगा,
एक कतरे को समुद्र नजर आए कैसे
~~वसीम बरेलवी
“The Whole Is Greater Than The Sum Of Its Parts”. Likewise, The Cornucopian half of this blog encompasses my blog in its entirety which otherwise is scattered into the myriad hats I wear creatively!!
कोई अपनी ही नजर से तो हमें देखेगा,
एक कतरे को समुद्र नजर आए कैसे
~~वसीम बरेलवी




प्रेम करना, दर्द महसूस करना
है इंसानी स्वभाव।
पर अगर कोई
चोट देकर, चोट लगने का अभिनय करे
किसी का दर्द जानकर
भी उसे दर्द दे,
आँसू देखकर भी महसूस न करे,
यह बीमार नार्सिसिस्ट की निशानी है।
इंसानी फितरत का वह स्याह पहलू, जहाँ वह खुद को खुदा मान बैठता है।



विषय- कविता मंच: “बीते गुज़रे दिन” की और से
अहल्या, द्रौपदी, सीता, तारा,
मंदोदरी सती कहलायीं।
फिर नारी के लिए आज क्यों नए मापदंड और इतनी बंदिशें समाज ने रची?
अहल्या इंद्र के सतीत्व-हरण छल की शिकार हुई।
द्रौपदी भरी सभा में वस्त्रहरण से अपमानित हुई।
सीता ने पतित्यकता होने का दुःख सहा,
तारा और मंदोदरी ने दूसरा विवाह कर पुनः जीवन-पथ चुना।
फिर भी उनका स्मरण पुण्य माना गया—
“पंचकन्या स्मरेन्नित्यं महापातकनाशनम्॥”
जब आदर्शों में इतनी करुणा और व्यापकता थी,
तो आज नारी के लिए कसौटियाँ इतनी संकीर्ण क्यों हैं,
आज इतने रूढ़ियों का क़ैदी समाज क्यो है?
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