
अथाह गहराई


ऊपर वाले ने दुनिया बनाते-बनाते, उस में थोड़ा राग-रंग डालना चाहा .
बड़े जतन से रंग-बिरंगी, ढेरों रचनाएँ बनाईं.
फिर कला, नृत्य भरे एक ख़ूबसूरत, सौंदर्य बोध वाले मोर को भी रच डाला.
धरा की हरियाली, रिमझिम फुहारें देख मगन मोर नृत्य में डूब गया.
काले कागों….कौओं को बड़ा नागवार गुज़रा यह नया खग .
उन जैसा था, पर बड़ा अलग था.
कागों ने ऊपर वाले को आवाज़ें दी?
यह क्या भेज दिया हमारे बीच? इसकी क्या ज़रूरत थी?
बारिश ना हो तो यह बीमार हो जाता है, नाच बंद कर देता है।
बस इधर उधर घुमाता अौ चारा चुंगता है.
वह तो तुम सब भी करते हो – उत्तर मिला.
कागों ने कोलाहकल मचाया – नहीं-नहीं, चाहिये।
जहाँ से यह आया है वहीं भेज दो. यहाँ इसकी जगह नहीं है.
तभी काक शिशुअों ने गिरे मयूर पंखों को लगा नृत्य करने का प्रयास किया.
कागों ने काकदृष्टि से एक-दूसरे को देखा अौर बोले –
देखो हमारे बच्चे कुछ कम हैं क्या?
दुनिया के रचयिता मुस्कुराए और बोले –
तुम सब तो स्वयं भगवान बन बैठे हो.
तुम्हें शायद मेरी भी ज़रूरत नहीं.

#SushantSinghRajput,
#BollywoodNepotism
प्रश्न बङा कठिन है।
दार्शनिक भी है, तात्त्विक भी है।
पुराना है, शाश्वत-सनातन भी है।
तन अौर आत्मा या कहो रुह और जिस्म !!
इनका रिश्ता है उम्रभर का।
खोज रहें हैं पायें कैसे?
दोनों को एक दूसरे से मिलायें कैसे?
कहतें हैं दोनों साथ हैं।
फिर भी खोज रहें हैं – मैं शरीर हूँ या आत्मा?
चिंतन-मनन से गांठें खोलने की कोशिश में,
अौर उलझने बढ़ जातीं हैं।
मिले उत्तर अौर राहें, तब बताना।
पूरे जीवन साथ-साथ हैं,
पर क्यों मुश्किल है ढूंढ़ पाना ?
सूरज ङूबने के बाद
क्षितिज़ के उत्तर में
दमकता है एक सितारा…..
शाम का सितारा,
राह दिखाता,
रौशन क़ुतबी सितारा
यह ध्रुव तारा….
अटल और दिव्यमान रहने के
संदेश के साथ .
प्रश्न करते -करते जिंदगी से,
थक कर जब उत्तर की आस छोङ दी…..
तब वह जवाब अपने आप देने लगी।
दूसरों को देखना छोङ, खुद को देखो…..
मुक्त कर दो अपने आप को –
गलती, प्यार, गुस्सा विश्वासघात, हार-जीत से………….
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