आईना

 

आईना भी इस नासमझी पर

खुद से माफी नहीं मागँने देता।

कि खुद को दर्द क्यों पहुँचाना?

जमाना बैठा है इस काम के लिये।

तरीके और हथियार ( कविता )

मेरी पाँच कविताएँ / My 5 Poems Published in She The Shakti, Anthology– POEM 3

 

उसके पति ने कहा ,
सजावट की तरह रहो ,
कौन तुम्हें मदद करेगा ?
यह पुरुषों की दुनियाँ हैं.
सब के सब , कभी न कभी
ऐसे रिश्ते बनाते हैं.
अगर तुमने मेरी जिंदगी मॆं
ज्यादा टाँग अडाई ,
तब सब से कह दूँगा –
यह औरत पागल हैं.

उसने नज़रें उठाई और कहा-
सब के सब तुम्हारे जैसे नहीँ हैं.
तुम्हारे ये तरीके और हथियार पुराने हो गये ,
मुझ पर काम नहीँ करते.
हाँ , जो तुम जैसे हैं ,
वहीं तुम्हारा साथ देते हैं.

मैं नारी हूँ, रानी हूँ, शक्ति हूँ।
इसलिये शर्मिंदा होने का समय तुम्हारा हैं.
मेरा नहीँ.

आज़ के आधुनिक समय में अभी भी कुछ ऐसे लोग मिल जाते हैं , जो नारी को समानता का दर्ज़ा देने में विश्वाश नही रखते.

Source: तरीके और हथियार ( कविता )

जिंदगी के रंग -कविता 9


Indian Bloggers

Female weeper / weeping woman / professional mourners  –  In some part of    Rajasthan, India,  women (of a specific  caste ) are hired as professional mourners . They   are know as  “rudaali” /female weeper/ weeping woman  . Their job is to publicly express grief for family members who are not permitted to display emotion due to social status.

कुछ लोग हँस  कर ,

और कुछ हँसा कर

कमाते हैं.

कुछ लोग रो कर (रुदाली )

और कुछ लोगों को रुला कर.

रुलाने वाले क्या जवाब देंगे ?

   जब

ऊपर वाला उनसे पूछेगा –

उन्होंने क्या कमाया  ?

राजस्थान में कुछ  स्थानों पर  ऐसी प्रथा हैं. जिसमें सम्पन्न परिवारों में रो कर मातम मानने  के लिये रुदाली ( जाति  विशेष की महिलायें ) बुलायी जाती हैं.

rudaali

 

 

 

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हाजी अली दरगाह #Hajiali

Haji Ali Dargah (shrine built over the grave of a revered religious figure, often a Sufi saint or dervish)  ban is illegal, let women enter Haji Ali sanctum, says Bombay HC. still some voices  of protest are there.

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हाजी अली दरगाह के भीतरी भाग तक महिलाओं को जाने की इजाज़त मिल गई है.बॉम्बे हाइकोर्ट ने 2012 से महिलाओं के जाने पर लगी पाबंदी को असंवैधानिक बताते हुए हटा लिया है। पर कुछ नापसंदगी के बयान आ रहे हैं।

यह विचार कुछ अनोखा है,

वह सिर्फ जन्म दे सकती है।

मृत्यु  के समय शामिल होने के अधिकार,

का  निर्णय कोई अौर लेगा।

यह समस्या धर्म का नही

समाज का है।

                     जो  उन्हें चाँद पर तो भेजता हैं 

 पर…………….

                    ऊपर वाला भी सोंचता होगा,

मेरी सबसे खुबसूरत, बेहतरीन

रचना का क्या हश्र  हो रहा है?

 

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आज की द्रौपदी (कहानी )

baby
वह हमारे घर के पीछे रहती थी। वहाँ पर कुछ कच्ची झोपङियाँ थीं। वह वहीं रहती थी। कुछ घरों में काम करती थी। दूध भी बेचती थी। लंबी ,पतली, श्यामल रंग, तीखे नयन नक्श अौर थोङी उम्र दराज़। उसका सौंदर्यपुर्ण, सलोना अौर नमकीन चेहरा था। उसकी बस्ती में जरुर उसे सब रुपवती मानते होंगे।

जब भी मैं उधर से गुजरती । वह मीठी सी मुसकान बिखेरती मिल जाती। उसकी मुसकान में कुछ खास बात थी। मोनालिसा की तरह कुछ रहस्यमयी , उदास, दर्द भरी हलकी सी हँसी हमेशा उसके होठों पर रहती। एक बार उसे खिलखिला कर हँसते देखा तब लगा मोनालिसा की मुसकान मेरे लेखक मन की कल्पना है।

एक दिन उसकी झोपङी के सामने से गुजर रही थी। वह बाहर हीं खङी थी। मुझे देखते हँस पङी अौर मजाक से बोल पङी – मेरे घर आ रही हो क्या? मैं उसका मन रखने के लिये उसके झोपङी के द्वार पर खङे-खङे उससे बातें करने लगी। उसका घर बेहद साफ-सुथरा, आईने की तरह चमक रहा था। मिट्टी की झोपङी इतनी साफ अौर व्यवस्थित देख मैं हैरान थी।

एक दिन, सुबह के समय वह अचानक अपने पति के साथ हमारे घर पहुँच गई। दोनों के चेहरे पर चिन्ता की लकीरें थीं। पति के अधपके बाल बिखरे थे। उसके कपङे मैले-कुचैले थे। शायद उम्र में उससे कुछ ज्यादा हीं बङा था। पर वह बिलकुल साफ-सुथरी थी। तेल लगे काले बाल सलिके से बंधे थे। बहुत रोकने पर भी दोनों सामने ज़मीन पर बैठ गये।

पता चला, उनका बैंक पासबुक पति से कहीं खो गया था। वह बङी परेशान सी मुझ से पूछ बैठी -“ अब क्या होगा? पैसे मिलेंगे या नहीं ?” दोनों भयभीत थे। उन्हें लग रहा था, अब बैंक से पैसे नहीं मिलेगें। वह पति से नाराज़ थी। उसकी अोर इंगित कर बोलने लगी – “देखो ना, बूढे ने ना जाने “बेंक का किताब” कहाँ गिरा दिया है।” जब उसे समझ आया । पैसे अौर पासबुक दोनों बैंक जा कर बात करने से मिल जायेंगें, तब उसके चेहरे पर वही पुरानी , चिरपरिचित मोनालिसा सी मुसकान खेलने लगी।

उस दिन मैं उसके घर के सामने से गुजर रही थी। पर उसका कहीं पता नहीं था। मेरे मन में ख्याल आया, शायद काम पर गई होगी। तभी वह सामने एक पेंङ के नीचे दिखी। उसने नज़रें ऊपर की। उसकी हमेशा हँसती आखोँ में आसूँ भरे थे। मैं ने हङबङा कर पूछा – “ क्या हुआ? रो क्यों रही हो?”

***

उसका बाल विवाह हुआ था। कम वयस में दो बच्चे भी हो गये। वह पति अौर परिवार के साथ सुखी थी। उसके रुप, गुण अौर व्यवहार की हर जगह चर्चा अौर प्रशंसा होती थी। एक दिन उसका पति उसे जल्दी-जल्दी तैयार करा कर अपने साथ कचहरी ले गया। वहां एक अधेङ व्यक्ति को दिखा कर कहा – अब तुम इसके साथ रहोगी। मैं ने तुम्हें बेच दिया है।“ वह जब रो -रो कर ऐसा ना करने की याचना करने लगी। तब पति ने बताया, यह काम कचहरी में लिखित हुआ है। अब कुछ नहीं हो सकता है।

उसकी कहानी सुन कर , मुझे जैसे बिजली का झटका लगा। मैं अविश्वाश से चकित नेत्रों से उसे देखते हुए बोलने लगी – “ यह तो नाजायज़ है। तुम गाय-बकरी नहीं हो। तुम उसकी जायदाद नहीं । जो दाव पर लगा दे या तुम्हारा सौदा कर दे। उसने तुम से झूठ कहा है। यह सब आज़ के समय के लिये कलकं है।”

       उसने बङी ठंङी आवाज़ में कहा – “ तब मैं कम उम्र की थी। यह सब मालूम नहीं था। जब वह मुझे पैसे के लिये बेच सकता है। तब उसकी बातों का क्या मोल है। अब सब समझती हूँ। यह सब पुरानी बात हो गई।”  मैं अभी भी सदमें से बाहर नहीं आई थी। गुस्से से मेरा रक्त उबल रहा था। आक्रोश से मैं ने उससे पूछ लिया – “ फिर क्यों रो रही हो ऐसे नीच व्यक्ति के लिये।”

उसने सर्द आवाज़ में जवाब दिया – “ आज सुबह लंबी बीमारी के बाद उसकी मृत्यु हो गई। उसके परिवार के लोगों ने खबर किया है । पर तुम्हीं बताअो, क्या मैं विधवा हूँ? मेरा बूढा तो अभी जिंदा है। मैं उसके लिये नहीं रो रहीं हूँ। उसकी मौत की बात से मेरे बूढे ने कहा, अगर मैं चाहूँ, तो विधवा नियम पालन कर सकती हूँ। मैं रो रही हूँ , कि मैं किसके लिये पत्नी धर्म निभाऊँ? मैंने तो दोनों के साथ ईमानदारी से अपना धर्म निभाया है।
उसकी बङी-बङी आँखो में आँसू के साथ प्रश़्न चिंह थे। पर चेहरे पर वही पुरानी मोनालिसा की रहस्यमयी , उदास, दर्द भरी हलकी सी हँसी , जो हमेशा उसके होठों पर रहती थी।

 

 

छायाचित्र  इंद्रजाल से।

Just like Abhimanyu (poem)

baby

 just like abhimanyu

I – unborn baby,

listen to all worldly voices,

People were saying –

Save girl child, educate them..…

I don’t know wether I am a girl or boy.

but certainly,

I am completely safe here.

 One day  

I heard a voice saying – It’s a girl.

somebody whispered,  Remove her …….

 

 

Abhimanyu is an important character of the Mahabharat epic. While in his mother’s womb he had heard his father explain the way to break the most difficult chakravyuha.

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पाषाण (कविता )

rock

 

एक थी खूबसूरत सी लड़की,

 सब से नाराज़, बेजार , 

उखड़ी -उखड़ी , थोड़ी  कटी-कटी.

पूछा , तब उसने बताया –

तलाकशुदा हैं ,

इसलिये कुछ  उसे उपलब्ध मानते हैं.

कुछ चुभने वाली बातें करते हैं.

किसी ने कहा – इन बातों से भागो  मत.

जवाब दो , सामना करो.

अगली बार छेड़े जाने पर उसने ,

पलट कर कहा – हाँ, अकेली हूँ.

पर क्या तुम पत्थर हो ? पाषाण हो 

क्या तुम्हारे घर की लड़कियों के साथ ,

ऐसा नहीँ हो सकता ?

मदद नही कर सकते हो , ना करो.

पर अपमानित तो मत करो.

 

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धोखा (कहानी)

सुषमा  बड़ी साधारण सी लड़की थी. बदसूरत तो नहीँ कहेंगे. पर सुंदरता के भी कोई विशेष चिन्ह नहीँ थे उसमे. चपटी और आगे से फैली नासिका ने चेहरे को थोड़ा और बिगाड़ दिया था. 

अचानक ही एक दिन  बड़े अच्छे परिवार से रिश्ता आया. सब हैरान थे. चट मँगनी और पट ब्याह हो गया. बारात और दूल्हे को देख सुषमा की साखियां, रिश्तेदा और मुहल्ला रश्क़ से बोल उठा   – सब  इतना अच्छा  है. तो क्या हुआ , लड़का तो बेरोजगार ही है ना ? 

ससुराल पहुँच कर सुषमा भी वहाँ की रौनक  देख बौरा गई. उसे अपने सौभाग्य पर विश्वाश ही नहीँ हो रहा था. पति भी उसके पीछे दीवाना हुआ उसके चारो और लट्टू की तरह  घूमता रहता. कभी बाज़ार घुमाता कभी सिनेमा दिखलाता.  सास नवेली बहू कह कर उसे कुछ काम नहीँ करने देती. देवर और जेठ भी लाड बरसाते.  उसे लगता ,  यह सब सपना तो नहीँ है ?

हाँ ,  दो पुत्रियों की माता , उसकी जेठानी ज़रूर थोड़ी उखड़ी -उखड़ी रहती. पर वह रसोई और बेटियों मॆं ही ज्यादा उलझी रहती. कभी उनकी दोनों प्यारी -प्यारी बेटियाँ छोटी माँ – छोटी माँ करती हुई उसके पास पहुँच जाती. ऐसे में एक दिन जेठानी भी उनके पीछे -पीछे उसके कमरे मॆं आ गई. कुछ अजीब सी दृष्टि से उसे देखती हुई बोल पड़ी -” क्यों जी , दिन भर कमरे मॆं जी नहीँ घबराता ? जानती हो … ”   वह कुछ  कहना चाह रहीं थी.

 अभी जेठानी  की बात अधूरी ही थी. तभी उसकी  सास कमरे में पहुँच गई. बड़ी नाराजगी से बड़ी बहू से कहने लगी -” सुषमा को परेशान ना करो. नई बहू है.  हाथों की मेहन्दी भी नहीँ छूटी है. घर के काम मैं इससे सवा  महीने तक नहीँ करवाऊगी.  यह तुम्हारे जैसे बड़े घर की नहीँ है. पर मुन्ना की पसंद है.” सुषमा का दिल  सास का बड़प्पन देख भर आया. 

 

नाग पंचमी का दिन था. सुषमा पति के साथ मंदिर से लौटते समय  गोलगप्पे खाने और सावन के  रिमझिम फुहार मॆं भीगने  पति को भी  खींच लाई. जब गाना गुनगुनाते अध भीगे  कपडों में सुषमा ने  घर में प्रवेश किया. तभी सास गरज उठी -“यह क्या किया ? पानी मॆं भींगने से मुन्ना की तबियत खराब हो जाती है.”  वे दवा का डब्बा उठा लाईं. जल्दी-जल्दी  कुछ दवाईया देने लगी. सुषमा हैरान थी.  ज़रा सा भीगने से सासू माँ इतना नाराज़ क्यों हो गई ?

शाम होते ही उसके पति को तेज़ पेट दर्द और ज्वर हो गया. सास  उससे बड़ी नाराज थीं.  पारिवारिक , उम्रदराज डाक्टर आये. वह  डाक्टर साहब के लिये चाय ले कर कमरे के द्वार पर पहुँची.  अंदर हो रही बातें सुनकर  सन्न रह गई. डाक्टर  सास से धीमी आवाज़ मॆं कह रहे थे – लास्ट स्टेज में यह बदपरहेजी  ठीक नहीँ  है. आपको मैंने इसकी शादी करने से भी रोका था. 

story

सुषमा के आँखों के सामने अँधेरा छाने लगा. लगा जैसे चक्कर खा कर गिर जायेगी. तभी न जाने कहाँ से आ कर जेठानी ने उसे सहारा दिया. उसे बगल के कमरे में खींच कर ले गई. उन्होने फुसफुसाते हुए बताया , उसके पति को कैंसर है. इस बात को छुपा कर उससे विवाह करवाया गया. ताकि उसका पति मरने से पहले  गृहस्थ  सुख भोग ले. 

सास ने सिर्फ अपने बेटे के बारे में  सोचा. पर उसका क्या होगा ? पति से उसे वितृष्णा होने  लगी. ऐसे सुख की क्या लालसा , जिसमे दूसरे को सिर्फ भोग्या समझा  जाये. तभी सास उसे पुकारती हुई आई – ” सुषमा….सुषमा..तुम्हें मुन्ना बुला रहा है. जल्दी चलो. वह भारी मन से कमरे के द्वार पर जा खड़ी हुई.।

बिस्तर पर उसका पति जल बिन  मछली की तरह तड़प रहा था. पीडा  से ओठ नीले पड गये थे. सुषमा ने कभी मौत को इतने करीब से नहीँ देखा था. घबराहट से  उसके क़दम वही थम गये. तभी अचानक उसके पति  का शरीर पीडा से ऐंठ गया और  आँखों की पुतलिया  पलट गई. 

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सास जलती नज़रों से उसे देख कर बुदबुदा उठी – भाग्यहीन , मनहूस, मेरे बेटे को खा गई. उससे लाड़ करनेवाला ससुराल , और उसे प्यार से पान के पत्ते जैसा फेरने वाली सास पल भर में बदल गये.  सास हर समय कुछ ना कुछ उलाहना देती रहती.सुषमा प्रस्तर पाषाण प्रतिमा बन कर  रह गई. उसके बाद सुषमा को कुछ सुध ना रहा. सास ने ठीक तेरहवीं के दिन, सफेद साड़ी में, सारे गहने उतरवा कर घर के पुराने ड्राइवर के साथ उसे उसके मैके भेज दिया. 

सुषमा की माँ ने दरवाजा खोला. सुषमा द्वार  पर वैधव्य बोझ से सिर झुकाये खड़ी थी.  वह सचमुच पत्थर बन गई थी. वह  पूरा दिन किसी अँधेरे  कोने मॆं बैठी  रहती. सास के कहे शब्द  उसके मन – मस्तिष्क में जैसे नाचते रहते – भाग्यहीन,  मनहूस…. उसका पूरा परिवार सदमें मॆं था.  तभी एक और झटका लगा. पता चला सुषमा माँ बनने वाली हैं.   

तब  सुषमा के पिता ने कमर कस लिया. वैसी हालत  में  ही सुषमा का  दाखिल तुरंत नर्सिंग की पढाई के लिये  पारा मेडिकल कॉलेज  में करवा दिया. सुषमा बस कठपुतली की तरह उनके कहे अनुसार काम करते रहती. उसके पापा हर रोज़ अपनी झुकती जा रही कमर सीधी करते हुए,  बच्चों की तरह उसका हाथ पकड़ कर कालेज ले जाते  और छुट्टी के समय उसे लेने गेट पर खड़े मिलते. 

मई की तपती गर्मी में  सुषमा के पुत्र ने जन्म लिया. सुषमा अनमने ढंग से बच्चे की देखभाल करती. कहते हैं, समय सबसे बड़ा मरहम होता है. सुषमा के घाव भी भरने लगे थे. पर पुत्र की और से उसका मन उचाट रहता. जिस समय ने उसके घाव भरे थे. उसी बीतते समय ने उसके वृद्ध होते  पिता को तोड़  दिया था. ऊपर से शांत दिखने वाले पिता के दिल में उठते ज्वार-भाटे  ने उन्हें दिल के दौरे से अस्पताल पहुँचा दिया. अडिग चट्टान जैसा सहारा देने वाले अपने पिता को कमजोर पड़ते देख सुषमा जैसी  नींद से जागी. उसने पिता की रात दिन सेवा शुरू कर दी. 

पिता की तबियत अब काफी ठीक लग रही थी. उनके चेहरे पर वापस लौटती रंगत देख सुषमा आश्वस्त हो गई. वह रात में पापा के अस्पताल के बेड के बगल के सोफे पर ही सोती थी. वह पुनम की रात थी. खिड़की से दमकते चाँद की चाँदनी कमरे के अंदर तक बिखर गई थी. तभी पापा ने उसे अपने पास बुला कर बिठाया और उसके सिर पर हाथ फेरते हुए बोले  बोले -” बेटा, तुम्हे अपने पैरों पर खड़ा होना है. मज़बूती से….समझी ? 

सुषमा ने हिचकते हुए जवाब दिया -” मेरे जैसी भाग्यहीन… ”  पिता ने उसकी  बात काटते हुए कहा – “तुम भग्यहीन  नहीँ हो.बस एक धोखे और दुर्घटना की शिकार हो. जिसमें गलती तुम्हारी नहीँ , मेरी थी. अक्सर मुझे पश्चाताप होता है.  तुम्हारी शादी करने से पहले मुझे और छानबीन करनी  चहिये थी.”

भीगे नेत्रों से उन्हों ने अपनी बात आगे बढाई  -“पर जानती हो बिटिया, असल गुनाहगार धोखा देनेवाले लोग है. एक बात और बेटा, तुम इसका प्रतिशोध  अपने पुत्र से नहीँ ले सकती हो. उसका ख्याल तुम्हें  ही रखना है.”  थोड़ा मौन रह कर उसके नेत्रों में देखते हुए पिता ने कहा – “भाग्यहीन  तुम नहीँ तुम्हारी सास है. बेटे को तो गंवाया ही. बहू और पोते को भी गँवा दिया. पर कभी ना कभी ईश्वर उन्हें उनकी गलतियों का आईना ज़रूर दिखायेगा. ईश्वर के न्याय पर मुझे पूर्ण विश्वाश हैं.”

पापा से बातें कर सुषमा को लगा जैसे उसके सीने पर से भारी बोझ उतर गया. पढाई करके उसे शहर के एक अच्छे अस्पताल में नौकरी मिल गई. वह बेटे के साथ खेल कर अपना दुःख भूल  खिलखिलाने लगी । किसी न किसी से  उसे अपने  ससुराल की ख़बरें  मिलती रहती. देवर की शादी और उसे बेटी होने  की  खबरें मिली. पर सुषमा को ससुरालवालों ने कभी उसे याद नहीँ किया. सुषमा ने भी पीछे मुड़ कर देखने के बदले  अपने आप को और बेटे को सम्भालने पर ध्यान दिया.

उस दिन सुषमा अस्पताल पहुँची. वह  आईसीयू के सामने से गुजर रही थी. तभी सामने देवर और जेठ आ खडे  हुए. पता चला सास  बीमार है. इसी अस्पताल में भर्ती हैं. उन्हें इस बात का बहुत ग़म है कि  सुषमा के पुत्र के अलावा  उन्हें पोता नहीँ सिर्फ पोतिया ही है. अब वह सुषमा और उसके बेटे को याद करते रहती हैं. एक बार पोते क मुँह देखना चाहती हैं.

देवर ने कहा – “भाभी, बस एक बार मुन्ना भैया के बेटे को अम्मा के पास ले आओ.  सुना है बिल्कुल भैया जैसा है. ”  तभी जेठ बोल पड़े – सुषमा , मैं तो कहता हूँ. अब तुम हमारे साथ रहने आ जाओ.  मैं कल सुबह ही तुम्हे लेने आ जाता हूँ. सुषमा बिना कुछ जवाब दिये अपनी ड्यूटी कक्ष में चली गई.वह  उनकी बेशर्मी देख वह अवाक थी. वह चुपचाप अपना काम कर रहीं थी. पर उसके माथे पर पड़े शिकन से स्पष्ट था, उसके मन में बहुत सी बातो का तूफान चल रहा हैं.

 वह सोंच रहीं थी , पहले तो उसे खिलौना समझ मरनासन्न पुत्र की कामना पूरी करने के लिये धोखे से विवाह करवाया. बाद में दूध में पड़ी मक्खी की तरह फेंक दिया. आज़ अपनी पौत्रियों को पौत्र से कम आँका जा रहा है. क्योंकि वे लड़कियाँ हैं.  अच्छा है वह आज़ ऐसे ओछे परिवार  का हिस्सा नहीँ है. क्या उसके पुत्र को ऐसे लोगों के साथ रख कर उन जैसा बनने देना  चाहिये ? बिल्कुल नहीँ. वह ऐसा नहीँ होने देगी.  मन ही मन उसने कुछ निर्णय लिया. घर जाने से पहले उसने छुट्टी की अर्जी दी.

उसी रात को वह  ट्रेन से बेटे को ले कर निकट के दूसरे शहर चली गई. वहाँ के अच्छे बोर्डिंग स्कूल में बेटे का नाम लिखवा दिया. काफी समय से बेटे का दाखिला इस स्कूल में करवाने का मन बना रहीं थी.  वह तीन -चार दिनों  के बाद वापस घर लौटी.अगले दिन अस्पताल के सामने ही देवर मिल गया. उसे देख कर लपकता हुआ आया और बोल पड़ा -भाभी , अम्मा की तबियत और बिगड़ गई हैं. आप कहाँ थी ?

सुषमा चुपचाप हेड मेट्रन के कमरे में अपनी ड्यूटी  मालूम करने चली  गई. उस दिन उसकी ड्यूटी उसके सास के कमरे में थी. वह कमरे में जा कर दवाईया देने लगी. सास उसके बेटे के बारे में पूछने लगी. सुषमा ने शालीनता से कहा – “ईश्वर ने आपके घर इतनी कन्याओं को इसलिये भेजा हैं ताकि आप उनका सम्मान  करें. जब तक आप यह नहीँ सीखेंगी , तब तक आप अपने इकलौते पौत्र  का मुँह नहीँ देख सकतीं.”

सास क चेहरा तमतमा गया.  लाल और  गुस्से भरी आँखों से उसे घुरते हुए बोल पड़ी – “भाग्यहीन .. तुम धोखा कर रहीं हो , मेरे पौत्र को छुपा कर नहीँ रख सकतीं हो. lतुम्हारे जैसी मामूली लड़की की औकात नहीँ थी मेरे घर की बहू बनने की…”  सुषमा ने उनकी बात बीच में काटते हुए कहा “भाग्यहीन  मैं नहीँ आप हैं. सब पा कर भी खो दिया. आपने मुझे धोखा दिया पर भगवान को धोखा दे  पाई क्या ? आपको क्या लगता हैं एक सामान्य और मामूली लड़की का दिल नहीँ होता हैं ? उसे दुख तकलीफ़ की अनुभूति नहीँ होती? एक बात और हैं, देखिये आज़ आपको मेरे जैसी मामूली लड़की के सामने  इतना अनुनय – विनय करना पड  रहा है.”

अगली सुबह सास के कमरे के आगे भीड़ देख तेज़ कदमों से वहाँ पहुँची. पता चला अभी -अभी दिल का दौरा पड़ने से सास गुजर गई. पास  खडे  अस्पताल के वार्ड बॉय को कहते सुना -” दिल की मरीज थीं. कितनी बार डाक्टर साहब ने ने इन्हें शांत रहने की सलाह दी थी. अभी भी ये अपनी बहुओं को बेटा ना पैदा करने के लिये  जोर – जोर से कोस  रहीं थीं. उससे ही तेज़ दिल का  दौरा पड़ा.”

सुषमा  ने  पापा को  फोन कर सास के गुजरने की ख़बर दी. वह आफिस में माथे पर हाथ रखे बैठी  सोंचा में डूबी थी  -पौत्र से भेंट ना करा कर उसने गलती कर दी क्या ? तभी पीछे से पापा की आवाज़ आई –  ” सुषमा, जिसके पास सब कुछ  हो फ़िर भी खुश ना हो. यह उसकी नियति हैं. यह ईश्वर की मर्जी  और न्याय हैं.”

 

हमारे समाज में जब नारी की चर्चा होती है या विवाह की बातें होती हैं।  तब  विषय अक्सर उसका रुप -रंग होता है। विरले हीं कोई नारी की योग्यता को प्राथमिकता देता है। क्या नारी सिर्फ भोग्या रहेगी?

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Veils, Halos & Shackles     (book review of an international poetry collection)     बेडियों और  घूंघट में  उलझी नारी की आभा  मंडल  ( एक अन्तराष्ट्रीय पुस्तक की समीक्षा)

यह काव्य   महिलाओं पर हुई हिंसा , उत्पीड़न और भेदभाव की  घटनाओं पर आधारित  कविताओ का   संकलन हैं. महिलाओं पर  दुनिया में हो रहे दुर्व्यवहार को कविताओ  में पिरो कर, दुनिया को दिखाने की  अद्भुत और अनोखी  कोशिश हैं.

लौ दिलों में जलती रहे – महिलाओं के अपमान की कहानी सीता और द्रौपदी के काल से चली  आ रही हैं. पर आज़ इसका विकृत रुप डराने लगा हैं. इस पुस्तक का उद्देश्य हैं , हर जगह , हर काल में होनेवाली इस मानसिक विकृति को हम ना भूलें और इस जलती लौ को मशाल बना इसका सामना करे. इसके शिकार को नहीँ, दोषी को नीची नज़र से देखें. इसका सामना निर्भय हो कर करें.

24 देशों के 180 विचार लिखते कवि – नारी को सम्मान देनेवालों की कमी नहीँ हैं. इस संकलन में  दुनिया के दो  दर्जन देशों के विद्वानों -मनीषियों का योगदान हैं. उनकी भावनाओं की अभिव्यक्ति 250 से अधिक कविताओं के द्वारा हुई  हैं.

कवियों के दिल में अनछुए कोने में  झांकने का द्वार -” वेल्स हैलोज़ और शैकेल्स ” यह मार्मिक संकलन आपको उनके दिलों के दर्द भरे पहलुओं के करीब ले जायेगा. इसमें लिखने वालों में से बहुतों ने निसंकोच अपने जीवन की दर्द भरी दास्तान बयाँ की  हैं. यह वास्तव में बड़े हिम्मत की बात हैं. वरना अक्सर लोग ऐसी बातों को दबाने में यकीन रखते हैं.

पुरुषों की दुनिया  – अक्सर कुछ लोगों की गलतियों की वजह से सभी  पुरुषों पर प्रश्न चिन्ह लग जाता  हैं. पर यह महाकाव्य पुरुषों की  दुनियाँ के पुरुष कवियों की व्यथा भरी कवितायें भी सुनाता हैं उन्हीं की जुबानी. जिन महिलाओं के साथ दुर्घटनायें होती हैं.उनके परिवार के पुरुषों पर क्या बीतती हैं ?भुक्त भोगी के परिवारों और मित्रों की व्यथाएं  कैसी होती हैं ? क्या कभी ख़याल आया हैं ? उनकी वेदना और व्यथा को कविताओं का रुप दिया हैं, इस संकलन ने.

 प्रेरणा के श्रोत– दुनिया की वह आधी आबादी जिसे हम शक्ति ,दुर्गा , काली , मरियम या मदर मैरी कहते हैं.सभी और अनाम नारी इस महा रचना की प्रेरणा श्रोत हैं.

दो दूर और अलग संस्कृति के  देश के सम्पादको का सम्मिलित प्रयास  – आज़ पूरा विश्व  ग्लोबल या  वैश्विक हो गया  हैं. ऐसे में इस समस्या को  वैश्विव स्तर पर देखने का प्रयास वास्तव में प्रशंसनीय हैं.  यह पुस्तक देश , भाषा , धर्म, सम्प्रदाय, आदि के बंधन से ऊपर उठ कर महिलाओं की अनसुनी आवाज़ को बुलंदी  और हौसला देता हैं.   इस  के दोनों सम्पादक तारीफ़ के हकदार हैं.  चार्ल्स फिश्मैन और  स्मिता सहाय  वे दो नाम हैं.

 2013 में निर्भया ज्योति के गुजरने के बाद से यह वृहद अभियान शुरू हुआ. इसका गर्भ काल लम्बा था. 2016 अप्रैल में  इसका जन्म हुआ और यह पुस्तक सामने  आया. अब यह पुस्तक आमेजन पर उपलब्ध हैं – 25% की छूट के साथ.

विश्व की सर्वश्रेष्ठ कविताओं का खजाना – यह दुनिया के नामी और आम  कविओ के कविताओं का संकलन हैं. यह भुक्तभोगी कवियों  और  कवित्रियों की  दर्द भरी  वास्तविक कविताओं का संकलन हैं. जो पाठकों के दिलों में उतर जाता हैं.

अपने पैरों पर खड़ी  महाकाव्य – इस संकलन की विशेषता हैं , यह आरम्भ से अंत तक बिना किसी सहायता या अनुदान के तैयार की गई  हैं.  आज़ इस बात ज़रूरत हैं कि ऐसी पुस्तकों को शैक्षणिक संस्थानों में स्थान दिया जाये और ग्रांट व  अनुदान से प्रोत्साहित किया जाये. ताकि भविष्य में भी ऐसी पुस्तकें सामने आयें.
वैसे , सम्मान की बात हैं कि निर्भया  से उपजी यह व्यथा कविता संकलन को विदेशों में पाठ्यक्रम में शामिल किया जा रहा हैं..

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शादी

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रोज़ के झिकझिक से परेशान ,
झूठी बातों  और धोखे से हैरान
जब भी उसने चाहा निकलना
सबने कहा -सात जन्मों का
बंधन हैं.
तुम्हे निभाना हैं.
पावन सम्बन्ध हैं
तुम्हे निभाना हैं.
पर यह तो सचमुच ऐसा बंधन हैं.
जो सिर्फ उसे निँभाना हैं.
ऐसा क्यों ?
काश ये बातें दोनों को कही जाती.

 

 

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