आँखें बंद कर हाथ जुड़ गए,
ऊपर वाले के सामने।
प्रार्थना करते हुए मुँह से निकला –
विधाता ! तुम दाता हो।
तुमसे प्रार्थना है –
जिसने मुझे जो, जितना दिया।
तुम उसे वह दुगना दो!
यह सुन ना जाने क्यों कुछ लोग नाराज़ हो गए।


Eternal Shine !!

यह खबर पढ़ कर सभी पक्षियों को बड़ी हैरानी हुई. इंसानों ने रवायत, नियमों को अपने आप पर लागू होते देख बोल पड़े खग – बड़े विचित्र हैं ये ! बिना हमारी कामना जाने हमें क़ैद में रख कर मन बहलाना तो इनका पुराना शग़ल था. पर ये नहीं मालूम था अपने यहाँ के रीत और कुरीति हम पर भी थोप रहें हैं. नर-नारी, नर-मादा के मूल्यों में भी श्रेष्ठता, उच्चता-निम्नता का खेल? इनसे ज़्यादा समझदार तो हम हैं. खुले आसमान में खुला और बंधनविहीन जीवन जीतें हैं.

जीवन प्रवाह में बहते-बहते आ गये यहाँ तक।
माना, बहते जाना जरुरी है।
परिवर्तन जीवन का नियम है।
पर जब धार के विपरीत,
कुछ गमगीन, तीखा मोङ आ जाये,
किनारों अौर चट्टानोँ से टकाराने लगें,
जलप्रवाह, बहते आँसुअों से मटमैला हो चले,
तब?
तब भी,
जीवन प्रवाह का अनुसरण करो।
यही है जिंदगी।
प्रवाह के साथ बहते चलो।
अनुगच्छतु प्रवाह ।।
अहले सुबह नींद खुली मीठी, गूँजती आवाज़ों से.
देखा बाहर परिंदों की सभा है.
शोर मचाते-बतियाते किसी गम्भीर मुद्दे पर, सभी चिंतित थे
– इन इंसानों को हुआ क्या है?
बड़े शांत हैं? नज़र भी नहीं आते?
कहीं यह तूफ़ान के पहले की शांति तो नहीं?
हाल में पिंजरे से आज़ाद हुए हरियल मिट्ठु तोते ने कहा –
ये सब अपने बनाए कंकरीट के पिंजरों में क़ैद है.
शायद हमारी बद्दुआओं का असर है.
ज़िंदगी की परेशान घड़ियों में अचानक
किसी की बेहद सरल और सुलझी बातें
गहरी समझ और सुकून दे जातीं हैं, मलहम की तरह।
किसी ने हमसे कहा – किसी से कुछ ना कहो, किसी की ना सुनो !
दिल से निकलने वाली बातें सुनो,
और अपने दिल की करो।
गौर से सुना, पाया……
दिल के धड़कन की संगीत सबसे मधुर अौर सच्ची है।
जीवन की शाम हो चली थी,
थका-हारा सूरज झुका,
थोङा रुका
….गुफ्तगु के इरादे से या
शायद फिर से आने का
वायदा करना चाहता था धरा से।
पर तभी छा गये बीच में काले बादल।
अौर बिना रुके…..
बिना कुछ कहे सूरज ङूब गया,
कभी नहीं वापस आने को।
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