Tag: हिंदी कविता
कोरोना से संघर्षरत हिंदुस्तान
Don’t shoot them with your camera !
यह कोरोना से थका-हारा, संघर्षरत हिंदुस्तान है।
मैदाने-जंग या फ़ोटोग्राफ़ी कॉम्पटिशन नहीं!
गिद्ध और नन्ही बच्ची की तस्वीर से
पुलित्ज़र पुरस्कार जीतने वाला
रॉबर्ट हेडली भी अपने अपराध बोध से जीत नहीं पाया।
सोंचो वास्तव में गिद्ध कौन है?
यहाँ सब ने किसी ना किसी को खोया है।
मदद करो!
पेश आओ सहानुभूति और हमदर्दी से।
तांडव #Covid19
कहते हैं जीवन के अंतिम सत्य का एहसास श्मशान में होता है।
सचमुच यह सत्य महसूस हुआ बाँस घाट श्मशान के पास से गुजरते हुऐ,
अौर काशी में मणिकर्णिका घाट की अविराम जलतीं चितायें देख कर।
मोक्ष की आकांक्षा से खिंचे चले आते हैं लोग काशी।
अौर चिता की अग्नि धधकती रहती है इस महाश्मशान में।
एक चिता की अग्नि बुझे ना बुझे
धधक उठतीं हैं दूसरी चिता की लाल-पीली लपटें ।
आज रोज़ मिल रहीं हैं किसी ना किसी के निर्वाण की दुखद खबरें।
बन गईं हैं सारी श्मशानें, महाश्मशान, ….
…निरंतर जलती, हवा में अजीब गंध बिखेरती।
थके व्यथित परिजन अस्पताल, ईलाज़, ऑक्सीजन , दवा की लाइनों
के बाद पंक्ति बना रहें गुजरे स्वजनों के अंतशय्या के लिये मसानों में।
बिजली और गैस शव दाह गृह, क्रेमाटोरियम
की दीवारें, भट्टियां, लोहे गल रहे अनवरत जलती अपनी हीं आग में ।
क्या यह संहारक शिव का तांडव है?
या जल रहें हैं हम सब मानव,
मानवता अौर नैतिकता भूल अपनी हीं गलतियों के आग में?
प्रार्थना
आँखें बंद कर हाथ जुड़ गए,
ऊपर वाले के सामने।
प्रार्थना करते हुए मुँह से निकला –
विधाता ! तुम दाता हो।
तुमसे प्रार्थना है –
जिसने मुझे जो, जितना दिया।
तुम उसे वह दुगना दो!
यह सुन ना जाने क्यों कुछ लोग नाराज़ हो गए।
ज़िंदगी के रंग – 216

Eternal Shine !!
नज़रिया
उन्मुक्त हवा-बयार बंधन में नहीं बँध सकती है।
दरिया में जहाज़ चलना हो,
तो मस्तूल या पाल को साधना होता है।
ख़ुशियाँ चाहिए तब,
नज़र आती दुनिया को नहीं
अपने नज़रिए को साधना होता है।
पक्षपात !!
यह खबर पढ़ कर सभी पक्षियों को बड़ी हैरानी हुई. इंसानों ने रवायत, नियमों को अपने आप पर लागू होते देख बोल पड़े खग – बड़े विचित्र हैं ये ! बिना हमारी कामना जाने हमें क़ैद में रख कर मन बहलाना तो इनका पुराना शग़ल था. पर ये नहीं मालूम था अपने यहाँ के रीत और कुरीति हम पर भी थोप रहें हैं. नर-नारी, नर-मादा के मूल्यों में भी श्रेष्ठता, उच्चता-निम्नता का खेल? इनसे ज़्यादा समझदार तो हम हैं. खुले आसमान में खुला और बंधनविहीन जीवन जीतें हैं.

अनुगच्छतु प्रवाह !
जीवन प्रवाह में बहते-बहते आ गये यहाँ तक।
माना, बहते जाना जरुरी है।
परिवर्तन जीवन का नियम है।
पर जब धार के विपरीत,
कुछ गमगीन, तीखा मोङ आ जाये,
किनारों अौर चट्टानोँ से टकाराने लगें,
जलप्रवाह, बहते आँसुअों से मटमैला हो चले,
तब?
तब भी,
जीवन प्रवाह का अनुसरण करो।
यही है जिंदगी।
प्रवाह के साथ बहते चलो।
अनुगच्छतु प्रवाह ।।




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