Tag: हिंदी कविता
यादों के चंदन
चंदन के साथ रखे थे कुछ
यादें अौ
ख़्वाब !
कुछ ख़्वाब
पूरे हुए,
कुछ अधूरे हैं।
पर संदल की ख़ुशबू से भर गये हैं।
चिड़ियों की मीटिंग
अहले सुबह नींद खुली मीठी, गूँजती आवाज़ों से.
देखा बाहर परिंदों की सभा है.
शोर मचाते-बतियाते किसी गम्भीर मुद्दे पर, सभी चिंतित थे
– इन इंसानों को हुआ क्या है?
बड़े शांत हैं? नज़र भी नहीं आते?
कहीं यह तूफ़ान के पहले की शांति तो नहीं?
हाल में पिंजरे से आज़ाद हुए हरियल मिट्ठु तोते ने कहा –
ये सब अपने बनाए कंकरीट के पिंजरों में क़ैद है.
शायद हमारी बद्दुआओं का असर है.
ज़िंदगी के रंग- 199
ज़िंदगी की परेशान घड़ियों में अचानक
किसी की बेहद सरल और सुलझी बातें
गहरी समझ और सुकून दे जातीं हैं, मलहम की तरह।
किसी ने हमसे कहा – किसी से कुछ ना कहो, किसी की ना सुनो !
दिल से निकलने वाली बातें सुनो,
और अपने दिल की करो।
गौर से सुना, पाया……
दिल के धड़कन की संगीत सबसे मधुर अौर सच्ची है।
सूरज ङूब गया
जीवन की शाम हो चली थी,
थका-हारा सूरज झुका,
थोङा रुका
….गुफ्तगु के इरादे से या
शायद फिर से आने का
वायदा करना चाहता था धरा से।
पर तभी छा गये बीच में काले बादल।
अौर बिना रुके…..
बिना कुछ कहे सूरज ङूब गया,
कभी नहीं वापस आने को।
आदत
इक अजीब सी आदत जाती नहीं.
जब भी परेशां होतें हैं-
तुमसे बातें करने की हसरत जागती हैं।
पर मिलोगे कहाँ?
रास्ता और पता मालूम नहीं.
ज़िंदगी के रंग – 196
बहते बहते उम्र के बहाव में,
ज़िंदगी के बदलते पड़ाव में,
हर किसी को ज़िंदगी में,
उन्हीं कहानियों का सामना करना पड़ता है,
जो सनातन काल से शाश्वत है.
ज़िंदगी क्षण भंगुर है –
यह जानते हुए भी उलझ जातें हैं माया मोह में.
और जब यह मायावी स्वप्न टूटता है,
तब ख़्याल आता है – मृत्यु तो सब की आती है.
पर जीवन जीना कितने लोगों को आता है?

सैलाब
गीले आँखों से बरसते सैलाब को
देख जाती हुई बारिस ने भी
रुक कर साथ देना तय कर लिया है.

जिंदगी के पन्ने
जिंदगी के किताब के पन्ने,
हवा के शरारती झोंके से,
फड़फड़ाते शोर मचाते पलटते देखा।
खूबसूरत नाजुक, लम्हे फिसलते देखा,
बेइंतहा इम्तिहानो से जिंदगी को गुजरते देखा,
जरूरत के वक्त रिश्तो को बदलते देखा,
पुराने फीके, पीले पन्नों जैसे फीके पङते यादों को जी कर देखा।
बस इतना ही समझ आया –
कभी समय नहीं गुजरता और कभी-कभी समय नहीं ठहरता।
और वक्त गुजरने में वक्त नहीं लगता।
कभी कभी टूटने दो हमें !!
शब्दों से…सहारे से…ना समझाओ हमें,
कि हमने सब संभाल रखा है बड़े अच्छे से।
जब हम न संभाल सकें
टूटने दो हमें भी कभी कभी ……..
चाह नहीं है हमें हमेशा पहाड़ों को जीतने की।
कभी कभी पेड़ों के झुरमुट में चुपचाप चलना,
चँद बुंद आँसू बहाना भी अच्छा लगता है.


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