शब्दों से…सहारे से…ना समझाओ हमें,
कि हमने सब संभाल रखा है बड़े अच्छे से।
जब हम न संभाल सकें
टूटने दो हमें भी कभी कभी ……..
चाह नहीं है हमें हमेशा पहाड़ों को जीतने की।
कभी कभी पेड़ों के झुरमुट में चुपचाप चलना,
चँद बुंद आँसू बहाना भी अच्छा लगता है.
शब्दों से…सहारे से…ना समझाओ हमें,
कि हमने सब संभाल रखा है बड़े अच्छे से।
जब हम न संभाल सकें
टूटने दो हमें भी कभी कभी ……..
चाह नहीं है हमें हमेशा पहाड़ों को जीतने की।
कभी कभी पेड़ों के झुरमुट में चुपचाप चलना,
चँद बुंद आँसू बहाना भी अच्छा लगता है.
इंसान की फ़ितरत होती है ,
मधुर यादों और
सुहानी कल्पनाओं में जीने की.
अपने अतीत की यादों
और भविष्य की संभावनाओं में
अपने को सीमित न करें .

बिगड़ी बातों को बनाना ,
नाराज़गी को संभालना,
तभी होता हैं जब
बिगाड़ने या नाराज़ होने वाला चाहे .
यह छोटी पर गूढ़ बात
बड़ी देर से समझ आई….
कि एक हाथ से ताली नहीं बजती.
हम कई बार खुद को
बिसार देते हैं।
खुद का ख्याल रखना भूल जाते हैं,
अपनों के लिए अपने-आप को सहेजना है जरुरी।
स्पष्ट सुलझे दिलो-दिमाग अौ मन के लिये
टूट कर बिखरने से खुद को खुद से है संभालना है जरुरी।

बरसात में बिन बोए भी
कुकुरमुते निकल आते है,
वैसे ही जैसे बिन बुलाए बरस जाते है बादल .
पहाड़ों में दी आवाज़ें भी
गूँज बन लौट आती है वापस.
फिर क्यों कभी – कभी ,
किसी किसी को बुलाने पर भी जवाब नहीं आता ?
कहाँ खो जाती है ये सदाये…… ये पुकार …… ये लोग ?

बरसात की हलकी फुहार
के बाद सात रंगों की
खूबसूरती बिखेरता इंद्रधनुष निकल आया।
बादलों के पीछे से सूरज की किरणें झाँकतीं
कुछ खोजे लगी….. बोली….
खोज रहीं हूँ – कहाँ से इंद्रधनुष निकला है ?
इंद्रधनुष की सतरंगी आभा खिलखिला कर हँसी अौर
कह उठी – तुम अौर हम एक हीं हैं,
बस जीवन रुपी वर्षा की बुँदों से गुजरने से
मेरे अंदर छुपे सातों रंग दमकने लगे हैं।
हमारे अंदर भी क्या बदलते मौसम हैं ?
क्या कभी बसंत अौर कभी पतझङ होते हैं ?
कभी कभी सुनाई देती है गिरते पत्तों की उदास सरसराहट
या शरद की हिम शीतल खामोशियाँ
अौर कभी बसंत के खिलते फूलों की खुशबू….
ऋतुअों अौर मन का यह रहस्य
बङा अबूझ है………
हम समझते हैं कि
हम सब समझते हैं।
पर ऊपर बैठ,
जो अपनी ऊँगलीं के धागे से
हम सबों को नचा रहा है कठपुतली सा।
उसे हम कैसे भूल जाते हैं?
कालरात्रि सा सघन अँधेरा ,
आता है जीवन में हर रोज़ .
पर
आकाश के एक एक कर
बूझते सितारे,
करते है सूरज
औ भोर की
किरणों का आगाज …..
बस याद रखना है –
हर रात की होती है
सुहानी भोर !!!
हाथ पकङना साथ नहीं होता
हाथ छूटना , संबंध टूटना नहीं होता।
अकेले रिश्ते निभाये नहीं जाते,
जैसे एक हाथ से ताली बजाई नहीं जाती।
एक दूसरे के लिये इज़्जत और ईमानदारी हो तो
रिश़्तों का निभाना अौर निभना
अपने आप हो जाता है……
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