कोविड-19

बात  बड़ी महत्वपूर्ण है। दुनिया है तो बीमारियां होंगी ही और वायरस भी होंगे । पहले भी चीन से  कुछ इंफेक्शन फैले हैं – 2002 में सार्स,  h7 n9 आदि।  पर   कोरोना या कोविड-19 सबसे भयंकर है।  यदि चमगादड़ों की समस्या इतनी गंभीर थी कि 2005 से उस पर शोध  चल रहे थे। इसके लिए बैटवुमैन जैसे शब्द चर्चे में थे। तब क्या समय रहते चेतावनी और रोकथाम या अन्य देशों से मदद लेने का प्रयास नहीं किया जाना चाहिए था? शायद लाखों लोगों की जानें बच जातीं।

China’s bat woman  warns coronavirus is just the tip of the iceberg

Shi Zhengli, a virologist renowned for her work on coronavirus in bats, emphasized on the need for studying viruses among wild animals in advance to prevent another pandemic. BLOOMBERG NEWS25 May, 2020 9:44 pm IST

जिंदगी के रंग -206

कलम थामे

     लिखती उंगलियाँ आगे बढ़ती जातीं हैं।

           तब  एक जीवंत रचना उभरती हैं।

                ये उंगलियाँ संदेश हैं –

                        जिंदगी आगे बढ़ते जाने का नाम है।

                                 आधे पर रुक कर,

पंक्तियोँ…लाइनों को अधूरा छोङ कर,

       लिखे अक्षरों को आँसूअों से धुँधला कर,

                 सृजनशीलता…रचनात्मकता का अस्तित्व संभव नहीं।

                         यही पंक्तियाँ… कहानियाँ… कविताएँ,

                                   पन्नों पर उतर,

                                             आगे बढ़नें  की राहें  बन जातीं हैं। 

 

दर-ओ-दीवार

दूरियाँ- नज़दीकियाँ तो दिलों के बीच की बातें हैं।

 दीवारों पर इल्ज़ाम क्यों? 

जो खुद चल नहीं सकतीं वे दूसरों की दूरियाँ क्या बढ़ाएँगीं?

अक्सर  दीवारें रोक लेतीं हैं ग़म अौर राज़ सारे अपने तक,

अौर समेटे रहतीं हैं इन्हें  दिलों में अपने।

किलों, महलों, हवेलियों, मकानों, घरों से पूछो……

इनके दिलों में छुपे  हैं कितने राज़, कितनी कहानियाँ।

अगर बोल सकतीं दर-ओ-दीवारें…….

बतातीं दीवार-ए-ज़ुबान से,  सीलन नहीं आँसू हैं ये उसके।

वह तो गनिमत है कि….. 

दीवारों के सिर्फ कान होते हैं ज़ुबान नहीं।

जिंदगी के रंग -205

जीवन में खुश रहने और  सार्थकता ढूंढने में क्या अंतर हैं? 

क्या दोनों साथ-साथ चल सकतें हैं? 

अर्थपूर्णता…सार्थकता के खोज  में अतीत, वर्तमान और भविष्य शामिल होतें हैं।

इसके लिये सही-गलत सीखना पङता है

 खुशियों  के लिये कोई समय, सही-गलत,  कोई शर्त नही होती।

खुशियाँ अपने अंदर होतौं हैं, किसी से मांगनी नहीं पङती है।

सार्थकता जुड़ा है – कर्तव्य,  नैतिकता से।

सार्थकता और अर्थ  खोजने में कभी-कभी  खुशियाँ  पीछे छूट जाती है।

पर जीवन से संतुष्टि के लिये दोनों जरुरी हैं। 

 

 

 

 

दर्पण का सच !

जब सच्चा अक्स देखना या दिखाना हो,

 तब आईना याद आता है।

पर सब  भूल जाते हैं दर्पण तो छल करता है।

वह हमेशा उलटी छवि दिखाता है। 

  इंसानों की फितरत भी ऐसी होती है शायद ।

पर अंतर्मन….अपने मन का  आंतरिक दर्पण क्या कहता है?

वह तो कभी छल नहीं करता।

 

मानव माइग्रेशन #LockdownIndianMigrants

ग्रेट वाइल्डबीस्ट माइग्रेशन – हर साल अफ्रीका में आश्चर्य जनक दृश्य दिखता है। तंजानिया के सेरेन्गेटी और केन्या के मसाई मारा में भोजन के लिये लाखों जानवरों का महा प्रवास।

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देखा था पशुअों का माइग्रेशन

केन्या, अफ्रिका के जंगलों में।

एक हीं दिशा में,

स्कूल के बच्चों जैसे अनुशासित और अनंत लंबी पंक्तियों में लयबद्ध दौङते,

भागते वाइल्डबीस्ट और ज़ेबरा के झुंङों को।

नदियों मे मगरमच्छों, धरा पर शेरों के शिकार बनते,

मैदान, नदी–नाले पार करते, क्रूर मौत से बचते–बचाते।

अौर सुना था…..

 बसंत आने के साथ होता है दुनिया भर में पक्षियों का माइग्रेशन।

पंखों के उड़ान की अद्भुत शक्ति के साथ

अपने घरों को लौटते हैं ।

  आर्कटिक टर्न पक्षी, चमगादड़, व्हेल, सामन मछलियां, तितलियाँ,  पेंगुइन……

 इन विश्व यात्रियों  की महा यात्रा युगों-युगों से

ऋतु परिवर्तन के साथ नियमित चली आ रही है।

यह प्रकृति का विधान है।

लेकिन देखा है पहली बार मानव-माइग्रेशन।

भूखे-प्यासे जलती-तपती धूप में जलते अौ चलते लोग,

अपने घरों की अोर………

दूर कहाँ ??

यह कविता ब्लॉगर दोस्त निमिष की अोर से सभार मेरे लिये।

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दूर कहाँ ??

तुम तो मेरे सबसे करीब हो

विकट से विकट क्षणों में सबसे निकट हो

हाँ , अब तुम मेरी निकटता पर संशय कर सकते

किसी तीसरे का दृष्टिकोण प्रस्तुत कर सकते

अनुपात , क्षेत्रफल , वेग आदि गणितीय दूरी माप सकते

एक-दूजे की नजदीकियों पर प्रश्नचिन्ह लग सकते

पर सत्य बड़ा सात्विक सरल है !!

मेरे सम्मुख खड़ा सजीव व्यक्ति भी मुझसे कोसों दूर है

तन-मन , तम-ताप , उत्सव-उल्लास हर जगह तुम साथ , मेरे करीब हो

शायद इसीलिये तुम 

ब्रम्हाण्ड के दूसरे सिरे से भी साफ साफ नजर आ रही हो….

साफ साफ नजर आ रही हो….

 

— Nimish (मेरी एक कविता आप दोनों के लिए)

दूरियाँ और दीवारें

आदत बन रहीं हैं दूरियाँ और दीवारें.

तमाम जगहों पर पसरा है सन्नाटा.

कमरों में क़ैद है ज़िंदगी.

किसी दरवाजे, दीवारों की दरारों से

कभी-कभी रिस आतीं हैं कुछ हँसी….कुछ आवाज़ें.

एक दूसरे का हाथ थामे खड़ी ये चार दीवारें,

 थाम लेतीं हैं हमें भी.

इनसे गुफ़्तुगू करना सुकून देता है.

 

 

बेख़ुदी में

क़बूल भी नहीं कर सकते और इनकार भी नहीं कर सकते……

सचमुच देखा था तुम्हें क़रीब अपने.

हाथ भी बढ़ाया छूने के लिए.

तभी नींद खुल गईं और देखा बाहें शून्य में फैलीं हैं.

शायद सपने में घड़ी की सुईयों को पीछे घुमाते चले गए थे.

शायद बेख़ुदी में तुमको पुकारे चले गए थे.

 

Image- Aneesh

गिनती बन कर रह गए!

श्रम के सैनिक निकल पड़े पैदल, बिना भय के बस एक आस के सहारे – घर पहुँचने के सपने के साथ. ना भोजन, ना पानी, सर पर चिलचिलाती धूप और रात में खुला आसमान और नभ से निहारता चाँद. पर उन अनाम मज़दूरों का क्या जो किसी दुर्घटना के शिकार हो गए. ट्रेन की पटरी पर, रास्ते की गाड़ियों के नीचे? या थकान ने जिनकी साँसें छीन लीं. जो कभी घर नहीं पहुँचें. बस समाचारों में गिनती बन कर रह गए.

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