Category: The Bard’s Apprentice!
William Wordsworth was spot on when he said “Poetry is the spontaneous overflow of powerful feelings: it takes its origin from emotion recollected in tranquility.” When my pen meets the paper, it always captures the many moods and their wild swings and emotions and their detours which overflows from my heart spontaneously into the paper transmogrifying into verses!!
कहानी
सदायें
मिट्टी
विचारों के गहरे सागर में अकेले
ङूबते-उतराते मन में एक ख्याल,
एक प्रश्न आया।
हम सब मिट्टी से उपज़ें हैं,
एक दिन मिट्टी में मिल जायेंगें।
यह जानते हुए भी,
जीवन से मोह इतना गहरा क्यों होते है?
दरिया पर बरसते बादल !!
दोनों ने एक दूसरे को देखा ग़ौर से,
फिर दरिया पर बरसते बादल से पूछा
दरिया ने –
मुझे मेरा दिया हीं लौटा रहे हो?
या अपने राज मेरे कानों में गुनगुना रहे हो …
क्या अपने दिल की बातें मुझे सुना रहे हो?

शाम की दहलीज़ पे !!
हमेशा की तरह,
आज भी शाम की दहलीज़ पे,
आफ़ताब आसमान में सिंदूर फैलाए
इंतज़ार करता रहा चाँद का और तारों की बारात का.
क्या वह जानता नहीं
उसके तक़दीर में इंतज़ार और ढलना लिखा है?

आफ़ताब
इसे इबादत कहें या डूबना?
ज़र्रे – ज़र्रे को रौशन कर
क्लांत आतिश-ए-आफ़ताब,
अपनी सुनहरी, पिघलती, बहती,
रौशन आग के साथ डूब कर
सितारों और चिराग़ों को रौशन होने का मौका दे जाता है.

अर्थ:
आफ़ताब-सूरज
आतिश – आग
इबादत-पूजा
क्लांत –थका हुआ
माँ या मानवता !!
उस दिन मौत किसकी हुई ?
माँ की ?
या मानवता की ?
या दोनों की ??
क्यों कोई नहीं आया उसे गोद में उठाने ?

जिंदगी के रंग -207
प्रश्न बङा कठिन है।
दार्शनिक भी है, तात्त्विक भी है।
पुराना है, शाश्वत-सनातन भी है।
तन अौर आत्मा या कहो रुह और जिस्म !!
इनका रिश्ता है उम्रभर का।
खोज रहें हैं पायें कैसे?
दोनों को एक दूसरे से मिलायें कैसे?
कहतें हैं दोनों साथ हैं।
फिर भी खोज रहें हैं – मैं शरीर हूँ या आत्मा?
चिंतन-मनन से गांठें खोलने की कोशिश में,
अौर उलझने बढ़ जातीं हैं।
मिले उत्तर अौर राहें, तब बताना।
पूरे जीवन साथ-साथ हैं,
पर क्यों मुश्किल है ढूंढ़ पाना ?
खबरें
सब कहते हैं – प्रकृति निष्ठुर हो गई है।
पर क़ुदरत से बेरुखी किया हम सब नें ।
कभी सोंचा नहीं यह क्या कहती है?
क्यों कहती हैं?
कटते पेङ, मरती नदियाँ आवाज़ें देतीं रहीं।
जहर बना जल, सागर, गगन।
हवाएँ कहती रहीं –
अनुकूल बनो या नष्ट हो जाअो…….
अब, पता नही खफ़ा है ?
दिल्लगी कर रही है?
या अपने नियम, कानून, सिद्धांतों पर चल रही है यह ?
खबरें पढ़ कर विचार आता है –
आज हम पढ़तें हैं हङप्पा अौर मोहनजोदाङो,
हजारों साल बाद क्या कोई हमें पढ़ेगा?




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