साँस

हर साँस के साथ ज़िंदगी कम होती है.

फिर भी क्यों ख़्वाहिशें अौर हसरतें कम नहीं होतीं?

 

शाम की दहलीज़ पे !!

हमेशा की तरह,

आज भी शाम की दहलीज़ पे,

आफ़ताब आसमान में सिंदूर फैलाए

इंतज़ार करता रहा चाँद का और तारों की बारात का.

क्या वह जानता नहीं

उसके तक़दीर में इंतज़ार और ढलना लिखा है?

 

पीड़ा का आकार

अक्सर सुना था,

दर्द भी रचना बन सकती है.

जाना एक दिन.

जब अंतर्मन से लावा सी बहती-पिघलती

पीड़ा को आकार में ढलने दिया.

सामने खड़ी मिली एक भावपूर्ण कविता.

ज़िंदगी के रंग – 190

एक बात तय है

आजाद खयालों ,

विचारों का होना….

चट्टानों पर सर पटकने…टकराने,

आंधी और तूफान से

लड़ने जैसी चुनौती है।