पीड़ा का आकार

अक्सर सुना था,

दर्द भी रचना बन सकती है.

जाना एक दिन.

जब अंतर्मन से लावा सी बहती-पिघलती

पीड़ा को आकार में ढलने दिया.

सामने खड़ी मिली एक भावपूर्ण कविता.

ज़िंदगी के रंग – 190

एक बात तय है

आजाद खयालों ,

विचारों का होना….

चट्टानों पर सर पटकने…टकराने,

आंधी और तूफान से

लड़ने जैसी चुनौती है।