तुम्हें शायद मेरी भी ज़रूरत नहीं !!!!

ऊपर वाले ने दुनिया बनाते-बनाते, उस में थोड़ा राग-रंग डालना चाहा .

बड़े जतन से रंग-बिरंगी, ढेरों रचनाएँ बनाईं.

फिर कला, नृत्य भरे एक ख़ूबसूरत, सौंदर्य बोध वाले मोर को भी रच डाला.

धरा की हरियाली, रिमझिम फुहारें देख मगन मोर नृत्य में डूब गया.

काले कागों….कौओं को बड़ा नागवार गुज़रा यह नया खग .

उन जैसा था, पर बड़ा अलग था.

कागों ने ऊपर वाले को आवाज़ें दी?

यह क्या भेज दिया हमारे बीच? इसकी क्या ज़रूरत थी?

बारिश ना हो तो यह बीमार हो जाता है, नाच बंद कर देता है।

 बस इधर उधर घुमाता अौ चारा चुंगता है.

वह तो तुम सब भी करते हो – उत्तर मिला.

कागों ने कोलाहकल मचाया – नहीं-नहीं, चाहिये।

जहाँ से यह आया है वहीं भेज दो. यहाँ इसकी जगह नहीं है.

तभी काक शिशुअों ने गिरे मयूर पंखों को लगा नृत्य करने का प्रयास किया.

कागों ने काकदृष्टि से एक-दूसरे को देखा अौर बोले –

देखो हमारे बच्चे कुछ कम हैं क्या?

दुनिया के रचयिता मुस्कुराए और बोले –

तुम सब तो स्वयं भगवान बन बैठे हो.

तुम्हें शायद मेरी भी ज़रूरत नहीं.

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#SushantSinghRajput,

#BollywoodNepotism

बॉलीवुड, रजतपट, मायानगरी, या अंधेर नगरी?

जिन्हें हम तीन घंटे सुनते हैं. उन्हें यहाँ अनसुना कर दिया जाता है। किसी को भी ङरा कर अकेलेपन का एहसास दिला कर बड़ी आसानी से डिप्रेशन के गर्त में ठेला जा सकता है.

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       बॉलीवुड एक मायानगरी है, जो ज़िंदगी के जंग से जूझते सामान्य लोगों के लिए सपने बुनता है, मनोरंजन ले कर आता है. जिसके पात्रों को आम लोग रोल मॉडल मानते हैं, सराहते हैं. हर तबके के लोग अपने गाढ़ी कमाई से टिकट ख़रीदते हैं, सिनेमा के तीन घंटे में अपने दुःख दर्द भूलने के लिए.

           इस रुपहले  पर्दे के पीछे की सच्चाई इतनी कटु है? यहाँ जीवन-मौत एक खेल बन चुका है ? सिनेमा के सीन की तरह? इनके अपने नियम क़ानून हैं? जिसे चाहें बैन कर दें? यह हक़ इन्हें कैसे मिला? अगर आम लोग या तथाकथित बाहरी लोग इन्हें बैन कर दें? इनके सिनेमा को देखना बैन कर दें? तब क्या करेंगे ये रूपहले पर्दे के जागीरदार ? जिसे ये बाहरी मानते हैं, उनसे हीं  इनका व्यवसाय चलता है.

            ऐसे अनेकों शोध हैं जो स्पष्ट बताते हैं कि किसी को  भी बुली / bully कर, ङरा कर,  आईसोलेट कर, अकेलेपन का एहसास दिला कर बड़ी आसानी से डिप्रेशन  के गर्त में ठेला जा सकता है. आश्चर्य की बात है, जिन्हें हम तीन घंटे सुनते हैं. उन्हें यहाँ अनसुना कर दिया जाता है? होनहार कलाकारों को बैन करनेवाले ये लोग, शायद बेहद कमज़ोर, छिछले और डरपोक हैं. इन्हें अंधो में काना राजा बन कर रहने की आदत है.  इसलिये  प्रतिभावान लोगों से इस क़दर डरते हैं.

 

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आप सबों के विचार आमंत्रित हैं।

अक़्स !

तराशते रहें ख़्वाबों को,

कतरते रहे अरमानों को.

काटते-छाँटते रहें ख़्वाहिशों को.

जब अक़्स पूरा हुआ,

 मुकम्मल हुईं तमन्नाएँ,

साथ और हाथ छूट चुका था.

सच है …..

सभी को  मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता,

किसी को जमीं,

किसी को आसमाँ नहीं मिलता.

 

जिंदगी के रंग – 209

गर गुल ना खिले गुलशन में,

मौसम, मृत्तिका….माटी, बीज  में कमी खोजते हैं सब,

ना कि फूलों में ।

पर अजब बात और ख़यालात है हमारे,

कोई  जिंदगी ठोकर से  खिलने ना पाये,

टूट जाए,

मुरझा जाये।

तब लोग उस में हीं  कमी खोजते हैं.

 

एक कप चाय!!

कभी,

चाय पीने की आदत नहीं थी हमारी.

मालूम हीं नहीं चला

कब चाय आदत में शुमार हो गई.

और चाय का मतलब तुम हो गये.

सुकून

सागर के दिल पर तिरती- तैरती नावें,

याद दिलातीं हैं – बचपन की,

बारिश अौर अपने हीं लिखे पन्नों से काग़ज़ के बने नाव।

 नहीं भूले कागज़ के नाव बनाना,

पर अब ङूबे हैं  जिंदगी-ए-दरिया के तूफान-ए-भँवर में।

तब भय न था कि गल जायेगी काग़ज की कश्ती।

अब समझदार माँझी  

कश्ती को दरिया के तूफ़ाँ,लहरों से बचा

तलाशता है सुकून-ए-साहिल।

 

जिंदगी के रंग – 208

दुनिया में होङ लगी है आगे जाने की…

किसी भी तरह सबसे आगे जाने की। 

कोई ना कोई तो आगे होगा हीं।  

हम आज जहाँ हैं,

वहाँ पहले कोई अौर होगा….. उससे भी पहले कोई अौर।

ज़िंदगी सीधी नहीं एक सर्कल में चलती है। 

जैसे यह दुनिया गोल है।

ज़िंदगी का यह अरमान, ख़्वाब  –

सबसे आगे रहने का, सबसे आगे बढ़ने का……

क्या इस होड़ से अच्छा नहीं  है –

सबसे अच्छा करने का।

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Image courtesy- google.

नकाब

People don’t  change, Sometimes their mask falls off.

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जानते थे उन्हें ज़माने से।

अचानक बदले रूख को देख कर लगा।

क्या लोग बदल जाते हैं?

ज़माने बदलने के साथ?

फिर  समझ आया,

यह तो नकाब था,

जो खिसक गया था चेहरे से । 

 

ख्वाब

आघात – प्रतिघात  

The true mark of maturity is when somebody hurts you and you try to understand their situation instead of trying to hurt them back.

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कई तरह के लोगों को देखा है।

 कुछ तो खोए रहते हैं अपने आप में, कुछ अपने दर्द में।

पर बीमार अौर खतरनाक वे हैं जिन्हें मजा आता है,

दूसरों को बिन कारण दर्द और तकलीफ पहुंचाने में।

 सबसे सही संतुलित कौन  है?

ऐसे भी लोगों को देखा है,

जो चोट खा कर भी चोट नहीं करते।

आघात के बदले प्रतिघात नहीं करते।

 क्योंकि

वे पहले दूसरे की मनःस्थिति को समझने की कोशिश करते हैं।