कुछ गुल खिले और बिखर गए !

जीवनसाथी को खोने के दर्द, अनमोल यादों और फिर से उठ खड़े होने की उम्मीद को दर्शाती डॉ. रेखा रानी की हृदयस्पर्शी कविता “कुछ गुल खिले और बिखर गए”।

Rate this:

🍂 🥀 🍂

कुछ गुल खिले और बिखर गए !

यादों, भावनाओं और फिर से उठ खड़े होने की एक दास्तान…

कुछ गुल खिले और हवा में बिखर गए!
उसकी ख़ुशबुओं को ना पकड़,
वे फ़िज़ा में घुल गए।
हम ना किसी के साथ आए थे, ना साथ किसी के जाएँगे।
ना साथ खिले थे, ना साथ मुरझाएँगे।

कुछ गुल खिले और बिखर गए!
ना भूल थी बयार की, ना भूल था नसीब का।
ना डाल दोष हवा पर, ना डाल दोष फुहार पर।
अख़्तियार ना था साँसों पर,
आगाह ना था मुस्तकबिल का… आने वाले समय का।

कुछ गुल खिले और बिखर गए!
फूलों की इक डाली थी।
हलकी सी लचकी,
और पंखुड़ियाँ बिखर गईं।
कई ज़िंदगियाँ इन जुंबिशों से बिखर गईं।

कुछ गुल खिले और बिखर गए!
कई पल बिना आवाज़, युगों से गुजर गए,
और हम बिखर गए।
ना पूछ बार-बार, वो मंजर,
यादें फिर ले जातीं हैं उन्हीं ग़मों के समंदर।

कुछ गुल खिले और बिखर गए!
किसने सोचा था बहारें आई हैं, पतझड़ भी आएगा।
हम सँवरा करते, आईना सवाँरा करता था।
अब खुद हीं यादों-ख़्वाबों की दुकान सजाते हैं,
खुद हीं ख़रीदार बन जातें हैं।

कुछ गुल खिले और बिखर गए!
ज़िंदगी हिसाब है वफ़ाओं,
जफ़ाओं और ख़ताओं की।
जो सदायें गूंजती हैं, गूंजने दे।
फिर बहारें आएगी, गुलशन सजाएँगी।

कुछ गुल खिले और बिखर गए।
आफ़ताब फिर आएगा,
गुनगुनी धूप की चादर फैलाएगा।
जो बिखर गया, वो बिखर गया।
रंज-ओ-मलाल में ना डूब।
चलानी है कश्ती ज़िंदगी की।

कुछ गुल खिले और बिखर गए।
ना ग़म कर, ना कम कर रौशनी अपनी,
ना बिखरने दे पंखुड़ियाँ अपनी,
फ़िज़ा में फैलने दे ख़ुशबू अपनी।
गुल खिलते हैं ख़ुशबू बिखेरने अपनी।

– – ✤ – –

कविता पाठ (मेरी आवाज़ में) 🎙️

अपने जीवनसाथी को खोने के बाद यह कविता मैंने लिखी थी,
आज वही कविता आपसे साझा कर रही हूँ।
आशा है, मेरे दिल से निकली यह आवाज़ आपके दिल तक पहुँचेगी।
क्योंकि सच्चा दर्द शब्दों में नहीं,
बस महसूस किया जाता है… दिल से दिल तक।

कुछ गुल खिले और बिखर गए !

“मेरी कविता में गुलों की खुशबू, फूलों की डाली, उनका बिखरना जीवन की क्षणभंगुरता के बारे में है। यादें, भावनाएँ और अनुभव अनमोल होती हैं। अक्सर दिल की कसक अंतरात्मा की गहराईयों से निकल लफ़्ज़ों में प्रतिबिम्ब हो कविता बन जातीं हैं। धैर्य और साहस से कठिनाइयों का सामना करना हीं जिंदगी है। जीवन-प्रवाह रुकता नहीं। किसी भी हादसे… चोट के बाद ख़ुद से, फिर से खुशियां खोजनी पड़ती है।”

यह कविता मैंने 2018 में मेरे पति के निधन के बाद लिखी थी।
(पहला ड्राफ्ट: 14 फरवरी 2021)

भावपूर्ण अभिव्यक्ति,

डॉ. रेखा रानी

अतीत से भविष्य तक

​डॉ. रेखा रानी का यह शोधपरक लेख ‘अतीत से भविष्य तक नारी की यात्रा’ महिलाओं के बदलते मनोवैज्ञानिक, सामाजिक और आर्थिक स्वरूप को गहराई से दर्शाता है। पढ़ें यह सशक्त लेख!

Rate this:

समाज

अतीत से भविष्य तक नारी की यात्रा : कल, आज और कल

✍️ रेखा रानी | 🗓️ August 22, 2026

Journey of Women: Past to Future

आज का दौर तेजी से बदल रहा है। ऐसे में महिलाओं के जीवन, सोच और सामाजिक भूमिका में भी व्यापक परिवर्तन हो रहे हैं। महिलाएं समाज की लगभग 50 प्रतिशत आबादी का प्रतिनिधित्व करती हैं। इसलिए उनके व्यक्तित्व, दृष्टिकोण और जीवन-शैली में आने वाला परिवर्तन केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि परिवार, समाज और राष्ट्र—तीनों को प्रभावित करता है।

महिलाएं समाज की आधारशिला हैं। उनके विकास और परिवर्तन का प्रभाव परिवार व आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचता है। वास्तव में परिवर्तन प्रकृति का अटल और शाश्वत नियम है। समय के साथ सामाजिक परिस्थितियाँ, शिक्षा, तकनीक, आर्थिक अवसर और जीवन-मूल्य बदलते रहते हैं, तो व्यक्ति का व्यक्तित्व और आत्मबोध भी बदलता है। यही कारण है कि बीते समय की महिला और आज की महिला के विचारों, आकांक्षाओं तथा जीवन-दृष्टि में स्पष्ट अंतर दिखाई देता है।

बीते कल की नारी

पहले अधिकांश महिलाएं अपनी पहचान स्वयं के व्यक्तित्व से अधिक, दूसरों के दृष्टिकोण और रिश्तों के माध्यम से खोजती थीं। वे किसी की माँ, पत्नी, बहन या बेटी के रूप में ही अपनी सामाजिक पहचान प्राप्त करती थीं। सहनशील होना, अपनी इच्छाओं और भावनाओं को व्यक्त न करना तथा परिवार के लिए स्वयं का त्याग करना आदर्श महिला के गुण माने जाते थे।

उस समय आर्थिक निर्णयों में महिलाओं की भागीदारी अत्यंत सीमित थी। आर्थिक आत्मनिर्भरता लगभग नगण्य थी और वित्तीय निर्णय मुख्यतः पुरुषों के हाथों में केंद्रित रहते थे। शिक्षा, रोजगार और सामाजिक अवसर भी अपेक्षाकृत सीमित थे। किन्तु आज शिक्षा, करियर, तकनीकी विकास, वैश्विक संपर्क और बढ़ती सामाजिक जागरूकता के कारण महिलाओं के व्यवहार, व्यक्तित्व, सेल्फ कॉन्सेप्ट, यानी उनका अपने बारे में नजरिया और जीवन-दृष्टि में उल्लेखनीय परिवर्तन आया है।

आज की नारी : सकारात्मक बदलाव

आज महिलाएं शिक्षा, विज्ञान, प्रशासन, न्यायपालिका, खेल, उद्यमिता, चिकित्सा, सेना, राजनीति तथा प्रौद्योगिकी जैसे अनेक क्षेत्रों में उल्लेखनीय उपलब्धियां प्राप्त कर रही हैं। वे केवल परिवार की धुरी ही नहीं, बल्कि सामाजिक, आर्थिक और राष्ट्रीय विकास की सक्रिय सहभागी भी बन चुकी हैं।

मनोवैज्ञानिक प्रभाव : बदलता ‘सेल्फ कॉन्सेप्ट’

आधुनिक नारी में हो रहे इस परिवर्तन को मनोविज्ञान की दृष्टि से बदलता हुआ सेल्फ कॉन्सेप्ट (Self-concept) कहा जा सकता है।

सेल्फ कॉन्सेप्ट का अर्थ है—व्यक्ति स्वयं को किस प्रकार देखता है, अपनी भूमिका को समाज में किस रूप में समझता है, अपने आत्मसम्मान को कैसे परिभाषित करता है तथा स्वयं को कितना स्वीकार करता है। शिक्षा, रोजगार, आर्थिक आत्मनिर्भरता, सामाजिक सम्मान और व्यक्तिगत उपलब्धियाँ इसके निर्माण के प्रमुख आधार माने जाते हैं।

सामाजिक प्रभाव : शोध क्या कहते हैं?

  • 1. शिक्षा और आत्मनिर्भरता: UNESCO (2024) तथा भारत के All India Survey on Higher Education के अनुसार उच्च शिक्षा में महिलाओं की भागीदारी निरंतर बढ़ रही है। इसने महिलाओं में निर्णय लेने की क्षमता और आत्मविश्वास विकसित किया है।
  • 2. आर्थिक स्वतंत्रता: Humanities and Social Sciences Communications (Nature, 2025) के अनुसार आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर महिलाओं में निर्णय लेने की क्षमता और सामाजिक सहभागिता अधिक पाई गई है।
  • 3. परिवार की बदलती संरचना: International Journal of Family Studies (2024) के अनुसार आधुनिक परिवारों में महिलाओं की निर्णय-निर्माण प्रक्रिया में समान भागीदारी उनके आत्मसम्मान तथा वैवाहिक संतुष्टि को बढ़ाती है।
  • 4. अधिकारों के प्रति जागरूकता: UN Women (2024) के अनुसार कानूनी जागरूकता, शिक्षा और सामाजिक सहभागिता महिलाओं के सशक्तिकरण के प्रमुख आधार हैं।

आज : बदलाव का दूसरा पक्ष – नकारात्मक बदलाव

तेजी से बदलते समाज में लोगों की अपेक्षाएं, जीवन-शैली और व्यवहार भी बदलते हैं। यदि इस परिवर्तन के साथ नैतिक संतुलन, भावनात्मक परिपक्वता और सामाजिक उत्तरदायित्व का विकास न हो, तो अनेक प्रकार की चुनौतियाँ सामने आने लगती हैं।

महिलाओं में अपराध और मनोवैज्ञानिक दबाव:
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) और UNODC की रिपोर्टें संकेत देती हैं कि गंभीर अपराधों में महिलाओं की भागीदारी आज भी पुरुषों की तुलना में काफी कम है। अपराधशास्त्री Robert Agnew की General Strain Theory (1992) के अनुसार जब व्यक्ति की आकांक्षाओं और वास्तविक परिस्थितियों के बीच गहरा अंतर उत्पन्न होता है, तब तनाव असामान्य व्यवहार को जन्म दे सकता है।

आज अनेक महिलाएं परिवार और कार्यस्थल—दोनों की दोहरी जिम्मेदारियाँ निभा रही हैं। WHO (2023) के अनुसार लंबे समय तक बना रहने वाला तनाव भावनात्मक नियंत्रण को प्रभावित कर सकता है। अपराध के पीछे व्यक्तिगत, सामाजिक, आर्थिक और परिस्थितिजन्य कई कारक एक साथ कार्य करते हैं।

आने वाले कल की नारी

आने वाले कल की नारी केवल शिक्षित और आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर ही नहीं होगी, बल्कि मानसिक रूप से अधिक सशक्त, आत्मविश्वासी, संवेदनशील और विवेकशील भी होगी। यदि उसे समान अवसर, सुरक्षित वातावरण, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा तथा भावनात्मक सहयोग प्राप्त होगा, तो वह इन चुनौतियों को अवसरों में बदलने में सक्षम होगी। वह केवल स्वयं का भविष्य नहीं गढ़ेगी, बल्कि एक अधिक संवेदनशील, न्यायपूर्ण और प्रगतिशील समाज के निर्माण में भी अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।

निष्कर्ष

आधुनिक महिला का बदलता सेल्फ कॉन्सेप्ट भारतीय समाज के लिए एक महत्वपूर्ण और सकारात्मक उपलब्धि है। महिलाओं के बदलते जीवन को केवल सामाजिक परिवर्तन के रूप में नहीं, बल्कि मनोवैज्ञानिक, आर्थिक और सांस्कृतिक दृष्टि से भी समझा जाना चाहिए। तभी आने वाले कल की नारी का व्यक्तित्व समग्र समाज के विकास और मानवीय मूल्यों की सशक्त वाहक बनकर एक नए भारत के निर्माण में अपनी निर्णायक भूमिका निभाएगी।

डॉ. रेखा रानी

(लेखिका, परामर्शदाता और पूर्व प्रोफेसर)


द डॉसियर (The Dossier) पर मूल लेख पढ़ें

Recognition that Inspires

Honoured to receive recognition from the Central Hindi Directorate, Government of India, for securing Third Prize in the Hindi Essay Writing Competition. A memorable milestone that inspires a deeper commitment to literature and the Hindi language.

Rate this:

Certificate of Recognition - Central Hindi Directorate

✦ ✦ ✦

Honoured by the Government of India

Humbled and honoured to receive this certificate from the Central Hindi Directorate, Government of India, today.

Awarded for securing the Third Prize in the online Hindi Essay Writing Competition, organized on the occasion of the 65th Anniversary of the establishment of the Directorate.

“Grateful for this recognition.”

– Dr. Rekha Rani

जिंदगी के अनदेखें तमगे

काव्य प्रतियोगिता में विजेता रही डॉ. रेखा रानी की हृदयस्पर्शी कविता ‘जिंदगी के अनदेखे तमगे’। यह कविता जीवन के संघर्षों, तकलीफों और मानवता के गहरे पाठ को खूबसूरती से दर्शाती है।

Rate this:

🏆काव्य प्रतियोगिता में विजयी!🏆

मुझे यह साझा करते हुए अत्यंत खुशी हो रही है कि “India’s Biggest Book Giveaway – काव्य प्रतियोगिता” में मेरी इस कविता को शीर्ष 5 विजेताओं में चुना गया है। आप सभी के प्रेम, प्रोत्साहन और समर्थन के लिए हृदय से आभार!

Poetry Winner Announcement

जिंदगी के अनदेखें तमगे

( कविता – मानवता )

ऊंची पथरीली चट्टानों,
शैल-शिखरों पर उगने वाले
दरख़्तों की जड़े
वक्त की सख्त मार,
तूफानों के थपेड़े सह,
वक्त से पहले जिम्मेदार
गहरी मजबूत हो जाती है।

❖ ❖ ❖

जिंदगी भी कुछ यूं ही,
चोटें, जख्म, तकलीफें दे
फना होने की हद तक आजमाती है।
जो इन तमाम दर्दों से उठकर
आगे बढ़ता है,
उसकी जड़ें भी गहरी, मजबूत हो जाती हैं।
वे दूसरों के संघर्षों को
समझना और सम्मान देना सीख जाते हैं।

❖ ❖ ❖

जीवन के थपेड़े सहकार,
गिर कर भी जो संभल जाएं,
उनके कदमों को फिर
कोई तूफान डिगा नहीं सकता।
बेरहम वक्त की मार से बने
ये जख्म और उनके निशान ही असल में
जिंदगी के पाठ और अनदेखें तमगे हैं।

~ डॉ. रेखा रानी

मेरी पुस्तक समीक्षा!

मेरी पुस्तक की प्रतिष्ठित ‘प्रतिज्ञान पत्रिका’ में प्रकाशित विशेष समीक्षा मेरे साहित्यिक सफर का एक महत्वपूर्ण पड़ाव है—यह लेख उसी खुशी और उपलब्धि की एक झलक है।

Rate this:

✧ ✦ ✧

“प्रतिज्ञान पत्रिका” में मेरी पुस्तक की विशेष समीक्षा! 🌟

Pratigyan Patrika Review

नमस्कार!

आज का दिन मेरे साहित्यिक सफर के लिए बेहद खास और उत्साहवर्धक है। एक लेखिका के रूप में जब आपके शब्दों और विचारों को सही पहचान और सराहना मिलती है, तो वह पल शब्दों में बयां करना मुश्किल होता है। मुझे आप सभी के साथ यह साझा करते हुए अत्यंत प्रसन्नता हो रही है कि मेरी पुस्तक की “प्रतिज्ञान पत्रिका” में एक बेहद विस्तृत और खूबसूरत समीक्षा प्रकाशित हुई है!

इस खास मौके और खुशी की एक छोटी सी झलक आप मेरे इस इंस्टाग्राम रील में देख सकते हैं:

साहित्य प्रेमियों के लिए ‘प्रतिज्ञान’ एक बहुत ही प्रतिष्ठित नाम है। हाल ही में उन्होंने अपना ‘वार्षिक संचयन २०२६’ पेपरबैक के रूप में प्रकाशित किया है। यह संचयन बीते एक वर्ष की बेहतरीन साहित्यिक रचनाओं — कहानियों, कविताओं और समीक्षाओं — का एक अनूठा संग्रह है। ऐसे उत्कृष्ट और विविध विधाओं से सजे संस्करण में मेरी पुस्तक की चर्चा होना, मेरे लिए बहुत बड़े सम्मान की बात है。

मैं चाहूँगी कि आप सभी साहित्य के इस खूबसूरत उत्सव का हिस्सा बनें। यदि आप बेहतरीन साहित्यिक रचनाओं को पढ़ने के शौकीन हैं, तो यह वार्षिक अंक आपकी बुकशेल्फ़ की शोभा अवश्य बढ़ाएगा। आप इस विशेषांक की अपनी प्रति सीधे यहाँ से ऑर्डर कर सकते हैं:

हृदय से आभार! ❤️

अंत में, मैं अपने सभी पाठकों और शुभचिंतकों का हृदय से धन्यवाद करना चाहती हूँ। आपके निरंतर प्रेम, समर्थन और प्रोत्साहन के बिना यह साहित्यिक यात्रा संभव नहीं थी। अपना स्नेह ऐसे ही बनाए रखें। लिंक पर क्लिक करके अपनी प्रति अवश्य ऑर्डर करें, और इंस्टाग्राम पर रील देखकर मुझे अपने विचार और प्रतिक्रिया ज़रूर बताएं!

सस्नेह,
डॉ. रेखा रानी ✨

✧ ✦ ✧

प्रतिज्ञान

प्रेम विशेषांक में मेरी नई रचना ‘भरम’

कविता भरम - प्रतिज्ञान

साहित्य और मानवीय संवेदनाओं के इस खूबसूरत सफर में, मुझे यह साझा करते हुए अपार हर्ष हो रहा है कि ‘प्रतिज्ञान प्रकाशन’ के नवीनतम अंक (अंक 6 – प्रेम विशेषांक) में मेरी स्वरचित कविता ‘भरम’ प्रकाशित हुई है।

यह अंक प्रेम के उन अनछुए और यथार्थवादी पहलुओं पर बात करता है जो अक्सर खामोशियों में छिपे रह जाते हैं। मेरी कविता ‘भरम’ भी इश्क़ की उसी अजब कहानी और दूर क्षितिज पर सागर-आसमान के मिलन जैसी बेचैनी को दर्शाती है।

भरम

अजब है इश्क़ की ये कहानी,
आसमान की नीली परछाइयों में रंगा है समुंदर,
दूर क्षितिज पर आसमान–सागर
के मिलन का है भरम भरा नजरिया।
हर लहर में मिलन की तड़प है।
हर सैलाब में बेचैनी, पूनम की रातों में
नज़र आती है……
फ़लक छू लेने की आरजू-ए-बेचैनी हैं।
इश्क़ पर टिकी ज़िंदगानी,
अजब है इश्क़ की ये कहानी।

यदि आप भी साहित्य प्रेमी हैं और प्रेम के इस सफर को महसूस करना चाहते हैं, तो इस अंक को जरूर पढ़ें और अपना स्नेह दें।

— डॉ. रेखा रानी