
भरम
जिंदगी गुरु बन, तब तक सबक दोहराती रही,
हमें तराशने और खोने-पाने के
भरम से निकालने के लिए,
जब तक इल्म सीख न लिया।
~ Dr. Rekha Rani ♥️
जिंदगी सबसे बड़ी गुरु है, जो हमें तब तक सबक सिखाती है जब तक हम ‘भरम’ से बाहर निकलकर असल ‘इल्म’ (ज्ञान) नहीं सीख लेते। डॉ. रेखा रानी की एक बेहद गहरी और प्रेरणादायक कविता।
मेरी पुस्तक की प्रतिष्ठित ‘प्रतिज्ञान पत्रिका’ में प्रकाशित विशेष समीक्षा मेरे साहित्यिक सफर का एक महत्वपूर्ण पड़ाव है—यह लेख उसी खुशी और उपलब्धि की एक झलक है।
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नमस्कार!
आज का दिन मेरे साहित्यिक सफर के लिए बेहद खास और उत्साहवर्धक है। एक लेखिका के रूप में जब आपके शब्दों और विचारों को सही पहचान और सराहना मिलती है, तो वह पल शब्दों में बयां करना मुश्किल होता है। मुझे आप सभी के साथ यह साझा करते हुए अत्यंत प्रसन्नता हो रही है कि मेरी पुस्तक की “प्रतिज्ञान पत्रिका” में एक बेहद विस्तृत और खूबसूरत समीक्षा प्रकाशित हुई है!
इस खास मौके और खुशी की एक छोटी सी झलक आप मेरे इस इंस्टाग्राम रील में देख सकते हैं:
साहित्य प्रेमियों के लिए ‘प्रतिज्ञान’ एक बहुत ही प्रतिष्ठित नाम है। हाल ही में उन्होंने अपना ‘वार्षिक संचयन २०२६’ पेपरबैक के रूप में प्रकाशित किया है। यह संचयन बीते एक वर्ष की बेहतरीन साहित्यिक रचनाओं — कहानियों, कविताओं और समीक्षाओं — का एक अनूठा संग्रह है। ऐसे उत्कृष्ट और विविध विधाओं से सजे संस्करण में मेरी पुस्तक की चर्चा होना, मेरे लिए बहुत बड़े सम्मान की बात है。
मैं चाहूँगी कि आप सभी साहित्य के इस खूबसूरत उत्सव का हिस्सा बनें। यदि आप बेहतरीन साहित्यिक रचनाओं को पढ़ने के शौकीन हैं, तो यह वार्षिक अंक आपकी बुकशेल्फ़ की शोभा अवश्य बढ़ाएगा। आप इस विशेषांक की अपनी प्रति सीधे यहाँ से ऑर्डर कर सकते हैं:
हृदय से आभार! ❤️
अंत में, मैं अपने सभी पाठकों और शुभचिंतकों का हृदय से धन्यवाद करना चाहती हूँ। आपके निरंतर प्रेम, समर्थन और प्रोत्साहन के बिना यह साहित्यिक यात्रा संभव नहीं थी। अपना स्नेह ऐसे ही बनाए रखें। लिंक पर क्लिक करके अपनी प्रति अवश्य ऑर्डर करें, और इंस्टाग्राम पर रील देखकर मुझे अपने विचार और प्रतिक्रिया ज़रूर बताएं!
सस्नेह,
डॉ. रेखा रानी ✨
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साहित्य और मानवीय संवेदनाओं के इस खूबसूरत सफर में, मुझे यह साझा करते हुए अपार हर्ष हो रहा है कि ‘प्रतिज्ञान प्रकाशन’ के नवीनतम अंक (अंक 6 – प्रेम विशेषांक) में मेरी स्वरचित कविता ‘भरम’ प्रकाशित हुई है।
यह अंक प्रेम के उन अनछुए और यथार्थवादी पहलुओं पर बात करता है जो अक्सर खामोशियों में छिपे रह जाते हैं। मेरी कविता ‘भरम’ भी इश्क़ की उसी अजब कहानी और दूर क्षितिज पर सागर-आसमान के मिलन जैसी बेचैनी को दर्शाती है।
अजब है इश्क़ की ये कहानी,
आसमान की नीली परछाइयों में रंगा है समुंदर,
दूर क्षितिज पर आसमान–सागर
के मिलन का है भरम भरा नजरिया।
हर लहर में मिलन की तड़प है।
हर सैलाब में बेचैनी, पूनम की रातों में
नज़र आती है……
फ़लक छू लेने की आरजू-ए-बेचैनी हैं।
इश्क़ पर टिकी ज़िंदगानी,
अजब है इश्क़ की ये कहानी।
यदि आप भी साहित्य प्रेमी हैं और प्रेम के इस सफर को महसूस करना चाहते हैं, तो इस अंक को जरूर पढ़ें और अपना स्नेह दें।
— डॉ. रेखा रानी