आदतें भी बड़ी अजीब होतीं हैं.
इनमे भी नशा वाजिब होते है.
ना कोई वायदा, ना लौटने के इरादे.
ना जाने कौन सा अनजान सफ़र अौर राहें.
मालूम है, वे हैं वन-वे राहें.
मालूम है दरवाज़ा खड़का होगा हवा से,
मगर उम्र कट रही है इंतज़ार में.
आदतें भी बड़ी अजीब होतीं हैं.
इनमे भी नशा वाजिब होते है.
ना कोई वायदा, ना लौटने के इरादे.
ना जाने कौन सा अनजान सफ़र अौर राहें.
मालूम है, वे हैं वन-वे राहें.
मालूम है दरवाज़ा खड़का होगा हवा से,
मगर उम्र कट रही है इंतज़ार में.
#CoronaLockdownDay – 135
~~Rabindranath Tagore
On the death anniversary of Nobel Prize-winning poet and writer of the national anthem of India – Gurudev Rabindranath Tagore.
~~Rabindranath Tagore
#CoronaLockdownDay – 134
Mother Teresa
दरख़्तों…पेड़ों को कटाते,
पसीने से तर-ब-तर पेशानी और चेहरा पोछते,
छाया खोजती निगाहे ऊपर उठीं,
था खुला आकाश और चिलचिलाती धूप !
कटे कराहते दरख़्तों और डालियों ने कहा,
अब तपिश से बचाने को हमारा साया….छाया नहीं.
करो इंतज़ार धूप ढलने का.
तुमने हमारे साये में हमें हीं काट डाला!
image- Aneesh
#CoronaLockdownDay – 133

Buddha
बिखरी पड़ी है तेरी रौशनी हर ओर।
हम ढूँढते रहते हैं मंदिरों-मस्जिदों-गिरजों में।
आवाज़ें देते रहते हैं माजरों-समाधियों पर।
सुनते नहीं लौट कर आती सदायें….गूँज अपने अंदर की.
क्यों भूल जातें हैं-
मेरा मुझमें कुछ नहीं, जो कुछ है सो तेरा है।
बस तेरी अमानतें हैं, जो लौटनीं है।
रूह से रूह तक प्रेम पहुँचाना है।
#CoronaLockdownDay – 132
– Buddha
जो बनते रहें हैं अपने.
कहते हैं पहचान नहीं पाए तुम्हें !
आँखों पर गुमान की पट्टी ऐसी हीं होती है.
अच्छा है अगर लोंग पहले पहचान लें ख़ुद को।
ज़िंदगी के राहों में,
हम ने बख़ूबी पहचान लिया इन्हें!
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