रूह से रूह तक

बिखरी पड़ी है तेरी रौशनी हर ओर।

 हम ढूँढते रहते हैं मंदिरों-मस्जिदों-गिरजों में।

आवाज़ें देते रहते हैं माजरों-समाधियों पर।

 सुनते नहीं लौट कर आती सदायें….गूँज अपने अंदर की.

क्यों भूल जातें हैं-

मेरा मुझमें कुछ नहीं, जो कुछ है सो तेरा है।

बस तेरी अमानतें हैं, जो लौटनीं है।

 रूह से रूह तक प्रेम पहुँचाना है।

4 thoughts on “रूह से रूह तक

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