Stay happy, healthy and safe – 90

You gain strength, courage and confidence

by every experience in which

you really stop to look fear in the face.

You must do the thing you think you cannot do.

 

Eleanor Roosevelt

Stay Happy, Healthy and Safe – 83

Character cannot be developed in ease and quiet.

Only through experience of

trial and suffering can the soul be strengthened,

ambition inspired, and success achieved.

 

 

Helen Keller

 

 

Happiness is contagious !

If you want to be happy, spend time with other happy people.


A study published in the British Medical Journal asserts that happiness is contagious!  People who spend time around other happy people find that they themselves  experience more positive emotions.

Stay happy, healthy and safe – 52

Mind is indeed the Builder . . .

what is held in the act of mental vision

becomes a reality in the material experience.

We are gradually builded to that

image created within our own mental being.

 


― Edgar Cayce also known as The Sleeping Prophet.

We are rubies

We are all Spiritual beings
having a physical experience.

We are rubies
in the midst of granite.

We are imbued with
resplendent majesty but

We insist on
remaining shriveled
and withered in our prison of dust.

Why not become fresh
from the gentleness of the heart-spring?

Why not laugh…
like a rose?

Why not spread
perfume?

❤ Rumi

#SurnameChangeनाम में क्या रखा है? ( Blog related topic )

नाम में क्या रखा है? अक्सर शादी के बाद नाम बदलने / नया उपनाम जोड़ने के समय कहा जाता है। पर जानते हैं  सच्चाई क्या है? कहा जाता है कि किसी भी व्यक्ति को सबसे प्यारा शब्द अपना नाम लगता है।

इस संबंध में मुझे अपनी एक सहेली की बात याद आती है। शादी के बाद कुछ ही वर्षों में उसका पति से अलगाव हो गया। उसका तलाक का केस चल रहा था। वह अपने पति को बेहद नापसंद करती थी। उसने ऐसे में मुझ से एक ऐसी बात कही। जो मैं आज भी भूल नहीं पाई हूँ। उसने मुझसे कहा – ‘ जिस आदमी की वजह से मेरे जिंदगी बर्बाद हुई मुझे उसका उसका नाम  / सरनेम ढोना पड़ रहा है”।

यह विडम्बना ही है ना कि शादी अर्थात नया सरनेम। आप चाहो या ना चाहो। कुछ दिनो पहले मेरे बचपन की सहेली लिली ने लगभग 36 वर्षों बाद मुझे खोज निकाला और फेस -बुक मैसेंजर पर मेसेज भेजा। नाम जाना हुआ था। पर सरनेम नया होने से मैं काफी देर तक दुविधा में रही। और एक अन्य सहेली ने तो उस ठीक से न पहचान पाने के कारण फेस बुक में स्वीकार / एक्सेप्ट ही नहीं किया।

ऐसा महिलाओं के साथ ही क्यों? यह सवाल अक्सर मन में आता है। यह  व्यवस्था कुछ सोच कर बनाई गई होगी । पहले शायद ऐसा इसलिए रहा होगा क्योंकि महिलाएं घर के भीतर चारदीवारों में रहती थीं। अतः परेशानी नहीं होती होगी। पर आज समाज का स्वरूप बादल गया है। महिलाओं की अपनी एक पहचान हो गई है। पर प्रथा पुरानी हीं चल रही है।

मैं बहुत अरसे से एक पुरानी सहेली को फेस बुक पर खोजने का नाकामयाब प्रयास कर रहीं हूँ। अपनी अन्य सहेलियों से भी पूछ रहीं हूँ। सबका एक ही प्रश्न है – उसका नया सरनेम क्या है?

आज-कल एक नया चलन हो गया है दोनों उपनामों को लगाना। अपना पुराना और पति का नया उपनाम जोड़ दिया जाता है। जैसे ऐश्वर्या राय बच्चन या क़रीना कपूर खान। पर सोचिए जरा दो या तीन जेनरेशन के बाद हमारी बेटियों के नाम में कितने उपनाम जुट चुके होंगे। पर इसका उपाय क्या है?