सोने का मुल्लमा

किताब-ए-ज़िंदगी

का पहला सबक़ सीखा।

रिश्तों को निभाने के लिए,

अपनों की गिलाओ पर ख़ामोशी के

सोने का मुल्लमा चढ़ना अच्छा है।

पर अनमोल सबक़ उसके बाद के

पन्नों पर मिला –

सोने के पानी चढ़ाने से पहले

देखो तो सही…

ज़र्फ़….सहनशीलता तुम्हारी,

कहीं तुम्हें हीं ग़लत इल्ज़ामों के

घेरे  में ना खड़ा कर दे.

स्पर्श

बिना स्पर्श क्यारिश्ते बनते नहीं ?क्या हर रिश्ते कानाम ज़रूरी है ?क्या कहते है इसे ?जो मीरा ने किया श्याम से ? 

रेत की घड़ी

वक्त फिसलता है

रेत की तरह,

कितना  भी पकङो

मुट्ठी मे  या रेत घड़ी में।

नदी के जल में हो

या

रेगिस्तान के बालुका ढेर में  हो।

सरक हीं जाता है जकङ से।

रेत हो या वक्त

बस रह जाती हैं यादें  !!!!!!

रिश्ते

झुक कर रिश्ते निभाते-निभाते एक बात समझ आई,
कभी रुक कर सामनेवाले की नज़रें में देखना चाहिये।
उसकी सच्चाई भी परखनी चाहिये।
वरना दिल कभी माफ नहीं करेगा
आँखें बंद कर झुकने अौर भरोसा करने के लिये।

खूबसूरती  से निभाना

रिश्ते बनाने, रूलाने, झुकाने या भँजाने के लिये नहीं

निश्छलता अौर खूबसूरती  से निभाने के लिये होते हैं !

जीने की कला   Art of living 

सम्बन्धों को बनाये रखना ,

 ईमानदारी से रिश्ते निभाये रखना ,

जीवन जीने की कला है। 

वरना …..

टूटते रिश्ते , बिखरते लोगों को देखा है ,

आसमान के आँसुओं को ओस  बन कर टपकते देखा है ।

जंग

 

कहते है अपनों से हुए जंग हार जाना चाहिये,

पर बार-बार  हारते हुए,

सामने वालो को भूल का एहसास ना दिलाने 

अौर बस  ढोते रहने से,

 रिश्तों मे जो जंग लग जाती है

उसका क्या?

जिंदगी के रंग – 26

 

IndiSpire – Ideas for Edition 185

Do you have that one person who was once your best companion but now a complete stranger? What changed?

जिंदगी के सफर में जब भी  रिश्तों की

कश्ती ङूबती है

कभी माँझी,  कभी मौसम अौर

कभी  नदी  के भँवर ………. बदनाम होते हैं।

पर जब नाव का  छुपा सुराख़ ही उसे

ङूबाने लगे  ,

 तब  वफा – वेवफा, टूटना – छूटना,

अपना -पराया क्या मतलब रखतें हैं?

धोखा… अविश्वास का  सुराख़…..

किसी  को मार  ङालने

के लिये अकेले हीं काफी है।

यह

    रिश्तों  को जीने  नहीं देता………

रिश्तों में गहराई

इन रिश्तों का क्या करें , जिस में गहराई पता हीं ना चले  ?

यह  पता ही ना चले – यह प्यार है या जरुरत…

????

तरीके और हथियार ( कविता )

w

उसके पति ने कहा ,
सजावट की तरह रहो ,
कौन तुम्हें मदद करेगा ?
यह पुरुषों की दुनियाँ हैं.
सब के सब , कभी न कभी
ऐसे रिश्ते बनाते हैं.
अगर तुमने मेरी जिंदगी मॆं
ज्यादा टाँग अडाई ,
तब सब से कह दूँगा –
                       यह औरत पागल हैं.

उसने नज़रें उठाई और कहा-
सब के सब तुम्हारे जैसे नहीँ हैं.
तुम्हारे ये तरीके और हथियार पुराने हो गये ,
मुझ पर काम नहीँ करते.
हाँ , जो तुम जैसे हैं ,
वहीं तुम्हारा साथ देते हैं.

मैं नारी हूँ, रानी हूँ, शक्ति हूँ।
इसलिये शर्मिंदा होने का समय तुम्हारा हैं.
मेरा नहीँ.

durga

आज़ के आधुनिक समय में अभी भी  कुछ ऐसे लोग  मिल जाते हैं , जो नारी को समानता  का दर्ज़ा देने में विश्वाश  नही रखते.

 

 

छायाचित्र इंद्रजाल /   internet   से।