रेत के कण ( कविता ) #LessonOfLife


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क्या रेत के कणों को देख कर क्या

यह समझ आता है कि कभी ये

किसी पर्वत की चोटी पर तने अकडे

महा भीमकाय चट्टान होंगे
या कभी

किसी विशाल चट्टान को देख कर मन

में यह ख्याल आता है कि समय की

मार इसे चूर-चूर कर रेत बना देगी?

नहीं न?

इतना अहंकार भी किस काम का?

तने रहो, खड़े रहो पर विनम्रता से।

क्योंकि यही जीवन चक्र है।

जो कभी शीर्ष पर ले जाता है और

अगले पल धूल-धूसरित कर देता है।

शब्दार्थ- Word meaning

रेत -Sand

कण-Particles

पर्वत की चोटी – the top of the mountain

भीमकाय चट्टान – giant rock

चूर-चूर – Shattered

अहंकार – narcissism , Ego, high-and-mighty

विनम्रता- politeness, humbleness

जीवन चक्र- Life Cycle

शीर्ष – Top

What is the best lesson that life has taught you so far? #LessonOfLife

Source: रेत के कण ( कविता )

विश्वास- कविता faith- poem


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जिंदगी निकल गई खुश रहने की कोशिश अौर,

लोगों को खुश करने की कोशिश में।

दूसरों को खुबसूरती दिखाने अौर,

खुबसूरत दिखने की कोशिश में।

अब समझा आया, खुबसूरती अपने अंदर होती है।

अपने को पसंद करो अौर स्वंय खुश   रखो।

जीवन  की बदलती करवटें

सोंच पैदा करतीं हैं।

फिर लगता है ,

शायद ये, जिंदगी सीधी कर रहीं हैं।

बस विश्वास का ङोर थामे रखो।

 

जिंदगी के रंग -कविता 9


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Female weeper / weeping woman / professional mourners  –  In some part of    Rajasthan, India,  women (of a specific  caste ) are hired as professional mourners . They   are know as  “rudaali” /female weeper/ weeping woman  . Their job is to publicly express grief for family members who are not permitted to display emotion due to social status.

कुछ लोग हँस  कर ,

और कुछ हँसा कर

कमाते हैं.

कुछ लोग रो कर (रुदाली )

और कुछ लोगों को रुला कर.

रुलाने वाले क्या जवाब देंगे ?

   जब

ऊपर वाला उनसे पूछेगा –

उन्होंने क्या कमाया  ?

राजस्थान में कुछ  स्थानों पर  ऐसी प्रथा हैं. जिसमें सम्पन्न परिवारों में रो कर मातम मानने  के लिये रुदाली ( जाति  विशेष की महिलायें ) बुलायी जाती हैं.

rudaali

 

 

 

Images from Internet.

इंद्रधनुष -कविता Rainbow -poem


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There is nothing in this world that is not a gift from you  ~  Rumi.

 

ज़िंदगी के सात रंगों को भूल,

       हम जीवन को ढूँढ रहे हैं

          काले-सफ़ेद रंगों के धुआँ अौर  धुंध में।

                   भाग रहें हैं,  अनजानी राहों पर ,

                       दुनिया के मायावी  मृगतृष्णा के पीछे।

                            आंगन की खिली धूप, खिलते फूल,

                                  बच्चों की किलकारी, 

                                   ऊपरवाले की हर रचना है न्यारी।

                                       अगर कुछ ना कर सको ,

                                        तो थमा दो ऊपर वाले को अपनी ङोर।

                                           खुबसूरत सतरंगी  इंद्रधनुषी  लगेगी,

                                                 ज़िंदगी हर अोर। 

 

 

image from internet.

जिंदगी के रंग ( कविता) 8

life

जिंदगी ने ना जाने कितने रंग बदले।

रेगिस्तान  के रेत की तरह

कितने निशां बने अौर मिटे

हर बदलते रंग को देख ,

दिल में तकलिफ हुई।

काश,  जिंदगी इतनी करवटें  ना ले।

पर , फिर समझ आया ।

यही तो है जिंदगी।

 

चोट (कविता)

strong

जीवन के इस

                                                    दौङ

में ना जाने कितनी बार

चोटें लगीं।

आँखों में कुछ कतरे

आँसू   भी छलक आए।

पर अब जाना।

वे तो हौसला-अफजाई कर गये।

मजबूत बना गये।

हिम्मत बढ़ा गये।

 

छाया चित्र इंटरनेट  से।

life- poetry जिंदगी -कविता

The philosophy of life and sea waves are similar.

They return , whatever is give  to them.

जिंदगी अौर सागर की लहरें

एक सी लगती हैं। 

जो दो
कभी ना कभी वापस
लौटाती हैं जरुर।

जिंदगी अौर सागर का फ़लसफा

शायद एक है।

coco

दशरथ मांझी और दाना मांझी (कविता)

Dashrath Manjhi -Mountain Man  single-handedly carved a path through a mountain in 22 years using only a hammer and chisel  to make a short cut rout to near by town. Because in the remote village his wife died , as she could not get medical facilities on time.

*

A poor tribal man in Odisha walked nearly 10 -12 kilometres with his daughter, carrying his wife’s body on his shoulder, after he was denied a mortuary van from a government hospital.

एक ने पहाड़ का सीना ,

चीर

बीमार पत्नी को समय पर

 इलाज ना दे पाने पर ,

पर्वत में राह बनाया.

वह था दशरथ मांझी.

दूसरे ने पत्नी का हर कर्ज

चुकाया ,

ना जाने कितने दूर ,

काँधे पर उसका शव उठा ,

दाना मांझी

मीलों चलता आया.

सिर्फ पत्नी धर्म की बातें

होती हैं.

पुरुषों के इस समाज में

पति धर्म निभाने वाले ऐसे भी

लोग होते हैं.

(बिहार  में दशरथ मांझी के माउंटन मैन बनने  की कहानी उनकी पत्नी  और अस्पताल के बीच खड़े  पहाड़  की देंन हैं. वक्त  पर इलाज नहीं मिलने से  वह  चल बसीं. तब इस गरीब मजदूर ने सिर्फ एक छेनी और हथौडी की सहायता से अकेले , पहाड़ के बीचो बीच रास्ता बनाया. जिससे 55  किलोमीटर का रास्ता मात्र 15 किलोमीटर    रह गया. इस काम में उन्हें 22 साल लग गये.

.  उडिसा के एक अस्पताल में निर्धन दाना मांझी की पत्नी की  मृत्यु हो गई. कोई व्यवस्था ना देख , दाना ने पत्नी के शव को कंधे पर 12 किलोमीटर की दूरी पर , श्मशान घाट ले गये   

 वेदना  और हृदय की पीडा को कर्मठता में बदल देने वाले नायकों को सलाम  )

 

orissa-dana-majhi-kalahandi-Favim.com-4674147

अनुत्तरित प्रश्न …(ये है जिन्दगी ?)

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वियतनामी महिला ने १ करोङ ५७ हजार रुपये की बीमा के लिये हाथ-पैर कटवाए (समाचार 26 Aug 2016)

वियतनामी महिला ने १ करोङ ५७ हजार रुपये की बीमा के लिये हाथ-पैर कटवाए। आज के इस समाचार ने दिल दहला दिया। मन में हलचल पैदा हो गई। उसकी ऐसी क्या मजबूरी रही होगी? सिर्फ पैसों के लालच में ऐसा किया या कुछ अौर परेशानी थी ? ये है जिन्दगी ?

हजारों अनुत्तरित प्रश्न ………….

आज की द्रौपदी (कहानी )

baby
वह हमारे घर के पीछे रहती थी। वहाँ पर कुछ कच्ची झोपङियाँ थीं। वह वहीं रहती थी। कुछ घरों में काम करती थी। दूध भी बेचती थी। लंबी ,पतली, श्यामल रंग, तीखे नयन नक्श अौर थोङी उम्र दराज़। उसका सौंदर्यपुर्ण, सलोना अौर नमकीन चेहरा था। उसकी बस्ती में जरुर उसे सब रुपवती मानते होंगे।

जब भी मैं उधर से गुजरती । वह मीठी सी मुसकान बिखेरती मिल जाती। उसकी मुसकान में कुछ खास बात थी। मोनालिसा की तरह कुछ रहस्यमयी , उदास, दर्द भरी हलकी सी हँसी हमेशा उसके होठों पर रहती। एक बार उसे खिलखिला कर हँसते देखा तब लगा मोनालिसा की मुसकान मेरे लेखक मन की कल्पना है।

एक दिन उसकी झोपङी के सामने से गुजर रही थी। वह बाहर हीं खङी थी। मुझे देखते हँस पङी अौर मजाक से बोल पङी – मेरे घर आ रही हो क्या? मैं उसका मन रखने के लिये उसके झोपङी के द्वार पर खङे-खङे उससे बातें करने लगी। उसका घर बेहद साफ-सुथरा, आईने की तरह चमक रहा था। मिट्टी की झोपङी इतनी साफ अौर व्यवस्थित देख मैं हैरान थी।

एक दिन, सुबह के समय वह अचानक अपने पति के साथ हमारे घर पहुँच गई। दोनों के चेहरे पर चिन्ता की लकीरें थीं। पति के अधपके बाल बिखरे थे। उसके कपङे मैले-कुचैले थे। शायद उम्र में उससे कुछ ज्यादा हीं बङा था। पर वह बिलकुल साफ-सुथरी थी। तेल लगे काले बाल सलिके से बंधे थे। बहुत रोकने पर भी दोनों सामने ज़मीन पर बैठ गये।

पता चला, उनका बैंक पासबुक पति से कहीं खो गया था। वह बङी परेशान सी मुझ से पूछ बैठी -“ अब क्या होगा? पैसे मिलेंगे या नहीं ?” दोनों भयभीत थे। उन्हें लग रहा था, अब बैंक से पैसे नहीं मिलेगें। वह पति से नाराज़ थी। उसकी अोर इंगित कर बोलने लगी – “देखो ना, बूढे ने ना जाने “बेंक का किताब” कहाँ गिरा दिया है।” जब उसे समझ आया । पैसे अौर पासबुक दोनों बैंक जा कर बात करने से मिल जायेंगें, तब उसके चेहरे पर वही पुरानी , चिरपरिचित मोनालिसा सी मुसकान खेलने लगी।

उस दिन मैं उसके घर के सामने से गुजर रही थी। पर उसका कहीं पता नहीं था। मेरे मन में ख्याल आया, शायद काम पर गई होगी। तभी वह सामने एक पेंङ के नीचे दिखी। उसने नज़रें ऊपर की। उसकी हमेशा हँसती आखोँ में आसूँ भरे थे। मैं ने हङबङा कर पूछा – “ क्या हुआ? रो क्यों रही हो?”

***

उसका बाल विवाह हुआ था। कम वयस में दो बच्चे भी हो गये। वह पति अौर परिवार के साथ सुखी थी। उसके रुप, गुण अौर व्यवहार की हर जगह चर्चा अौर प्रशंसा होती थी। एक दिन उसका पति उसे जल्दी-जल्दी तैयार करा कर अपने साथ कचहरी ले गया। वहां एक अधेङ व्यक्ति को दिखा कर कहा – अब तुम इसके साथ रहोगी। मैं ने तुम्हें बेच दिया है।“ वह जब रो -रो कर ऐसा ना करने की याचना करने लगी। तब पति ने बताया, यह काम कचहरी में लिखित हुआ है। अब कुछ नहीं हो सकता है।

उसकी कहानी सुन कर , मुझे जैसे बिजली का झटका लगा। मैं अविश्वाश से चकित नेत्रों से उसे देखते हुए बोलने लगी – “ यह तो नाजायज़ है। तुम गाय-बकरी नहीं हो। तुम उसकी जायदाद नहीं । जो दाव पर लगा दे या तुम्हारा सौदा कर दे। उसने तुम से झूठ कहा है। यह सब आज़ के समय के लिये कलकं है।”

       उसने बङी ठंङी आवाज़ में कहा – “ तब मैं कम उम्र की थी। यह सब मालूम नहीं था। जब वह मुझे पैसे के लिये बेच सकता है। तब उसकी बातों का क्या मोल है। अब सब समझती हूँ। यह सब पुरानी बात हो गई।”  मैं अभी भी सदमें से बाहर नहीं आई थी। गुस्से से मेरा रक्त उबल रहा था। आक्रोश से मैं ने उससे पूछ लिया – “ फिर क्यों रो रही हो ऐसे नीच व्यक्ति के लिये।”

उसने सर्द आवाज़ में जवाब दिया – “ आज सुबह लंबी बीमारी के बाद उसकी मृत्यु हो गई। उसके परिवार के लोगों ने खबर किया है । पर तुम्हीं बताअो, क्या मैं विधवा हूँ? मेरा बूढा तो अभी जिंदा है। मैं उसके लिये नहीं रो रहीं हूँ। उसकी मौत की बात से मेरे बूढे ने कहा, अगर मैं चाहूँ, तो विधवा नियम पालन कर सकती हूँ। मैं रो रही हूँ , कि मैं किसके लिये पत्नी धर्म निभाऊँ? मैंने तो दोनों के साथ ईमानदारी से अपना धर्म निभाया है।
उसकी बङी-बङी आँखो में आँसू के साथ प्रश़्न चिंह थे। पर चेहरे पर वही पुरानी मोनालिसा की रहस्यमयी , उदास, दर्द भरी हलकी सी हँसी , जो हमेशा उसके होठों पर रहती थी।

 

 

छायाचित्र  इंद्रजाल से।