आफ़ताब

इसे इबादत कहें या डूबना?

ज़र्रे – ज़र्रे को रौशन कर 

क्लांत आतिश-ए-आफ़ताब,

अपनी सुनहरी, पिघलती, बहती,

रौशन आग के साथ डूब कर 

सितारों और चिराग़ों को रौशन होने का मौका दे जाता  है.

 

 

अर्थ:

आफ़ताब-सूरज

आतिश – आग

इबादत-पूजा

क्लांत –थका हुआ

खबरें

सब कहते हैं –  प्रकृति  निष्ठुर हो गई है।

पर क़ुदरत से बेरुखी किया हम सब नें ।

कभी सोंचा नहीं यह  क्या कहती है?

 क्यों कहती हैं?

कटते पेङ, मरती नदियाँ आवाज़ें देतीं रहीं। 

जहर बना जल, सागर, गगन। 

हवाएँ कहती रहीं

 अनुकूल बनो या नष्ट हो जाअो…….

अब, पता नही खफ़ा है ? 

 दिल्लगी कर रही है?

या अपने  नियम, कानून, सिद्धांतों पर चल रही है यह ?

खबरें पढ़ कर विचार आता है –

आज हम पढ़तें हैं हङप्पा अौर मोहनजोदाङो,

हजारों साल बाद क्या कोई हमें पढ़ेगा?

 

जिंदगी के रंग -206

कलम थामे

     लिखती उंगलियाँ आगे बढ़ती जातीं हैं।

           तब  एक जीवंत रचना उभरती हैं।

                ये उंगलियाँ संदेश हैं –

                        जिंदगी आगे बढ़ते जाने का नाम है।

                                 आधे पर रुक कर,

पंक्तियोँ…लाइनों को अधूरा छोङ कर,

       लिखे अक्षरों को आँसूअों से धुँधला कर,

                 सृजनशीलता…रचनात्मकता का अस्तित्व संभव नहीं।

                         यही पंक्तियाँ… कहानियाँ… कविताएँ,

                                   पन्नों पर उतर,

                                             आगे बढ़नें  की राहें  बन जातीं हैं। 

 

दर-ओ-दीवार

दूरियाँ- नज़दीकियाँ तो दिलों के बीच की बातें हैं।

 दीवारों पर इल्ज़ाम क्यों? 

जो खुद चल नहीं सकतीं वे दूसरों की दूरियाँ क्या बढ़ाएँगीं?

अक्सर  दीवारें रोक लेतीं हैं ग़म अौर राज़ सारे अपने तक,

अौर समेटे रहतीं हैं इन्हें  दिलों में अपने।

किलों, महलों, हवेलियों, मकानों, घरों से पूछो……

इनके दिलों में छुपे  हैं कितने राज़, कितनी कहानियाँ।

अगर बोल सकतीं दर-ओ-दीवारें…….

बतातीं दीवार-ए-ज़ुबान से,  सीलन नहीं आँसू हैं ये उसके।

वह तो गनिमत है कि….. 

दीवारों के सिर्फ कान होते हैं ज़ुबान नहीं।

दर्पण का सच !

जब सच्चा अक्स देखना या दिखाना हो,

 तब आईना याद आता है।

पर सब  भूल जाते हैं दर्पण तो छल करता है।

वह हमेशा उलटी छवि दिखाता है। 

  इंसानों की फितरत भी ऐसी होती है शायद ।

पर अंतर्मन….अपने मन का  आंतरिक दर्पण क्या कहता है?

वह तो कभी छल नहीं करता।

 

मानव माइग्रेशन #LockdownIndianMigrants

ग्रेट वाइल्डबीस्ट माइग्रेशन – हर साल अफ्रीका में आश्चर्य जनक दृश्य दिखता है। तंजानिया के सेरेन्गेटी और केन्या के मसाई मारा में भोजन के लिये लाखों जानवरों का महा प्रवास।

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देखा था पशुअों का माइग्रेशन

केन्या, अफ्रिका के जंगलों में।

एक हीं दिशा में,

स्कूल के बच्चों जैसे अनुशासित और अनंत लंबी पंक्तियों में लयबद्ध दौङते,

भागते वाइल्डबीस्ट और ज़ेबरा के झुंङों को।

नदियों मे मगरमच्छों, धरा पर शेरों के शिकार बनते,

मैदान, नदीनाले पार करतेक्रूर मौत से बचतेबचाते।

अौर सुना था…..

 बसंत आने के साथ होता है दुनिया भर में पक्षियों का माइग्रेशन।

पंखों के उड़ान की अद्भुत शक्ति के साथ

अपने घरों को लौटते हैं

  आर्कटिक टर्न पक्षीचमगादड़व्हेल, सामन मछलियां, तितलियाँ पेंगुइन……

 इन विश्व यात्रियों  की महा यात्रा युगों-युगों से

ऋतु परिवर्तन के साथ नियमित चली आ रही है।

यह प्रकृति का विधान है।

लेकिन देखा है पहली बार मानव-माइग्रेशन।

भूखे-प्यासे जलती-तपती धूप में जलते अौ चलते लोग,

अपने घरों की अोर………

दूर कहाँ ??

यह कविता ब्लॉगर दोस्त निमिष की अोर से सभार मेरे लिये।

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दूर कहाँ ??

तुम तो मेरे सबसे करीब हो

विकट से विकट क्षणों में सबसे निकट हो

हाँ , अब तुम मेरी निकटता पर संशय कर सकते

किसी तीसरे का दृष्टिकोण प्रस्तुत कर सकते

अनुपात , क्षेत्रफल , वेग आदि गणितीय दूरी माप सकते

एक-दूजे की नजदीकियों पर प्रश्नचिन्ह लग सकते

पर सत्य बड़ा सात्विक सरल है !!

मेरे सम्मुख खड़ा सजीव व्यक्ति भी मुझसे कोसों दूर है

तन-मन , तम-ताप , उत्सव-उल्लास हर जगह तुम साथ , मेरे करीब हो

शायद इसीलिये तुम 

ब्रम्हाण्ड के दूसरे सिरे से भी साफ साफ नजर आ रही हो….

साफ साफ नजर आ रही हो….

 

Nimish (मेरी एक कविता आप दोनों के लिए)

दिनों की गिनती – लॉकङाउन का 50वाँ दिन

जिंदगी के पचास दिन बीत गये….कम हो गये।

बिना कुछ कहे-सुने, चुपके से एक शाम अौर ढल गई।

दिनों की गिनती शायद हीं कभी इतनी शिद्दत से की होगी।

यह भी एक यात्रा है।

मालूम नहीं कितनी लंबी।

कितने सबकों…पाठों के साथ।

 ना शिकवा है ना गिला है।

पर यात्रा जारी है।

आशा भरे  नये दिन, नई सुबह के इंतज़ार के साथ।

 

Image Courtesy- Chandni Sahay

A Fire Burns Without Touching Trees Or Grass

कुदरत  से देख बेरुख़ी  इंसानों  की ,
बदले मिजाज धधकते लौ की।
आदत अौर फितरत बदल ली है
 दरिया -ए-आग ने शराफत से ।

Spain – According to local news outlet Cope, it was captured at a park in Calahorra, and the white ‘film’ is actually seeds from the poplar tree covering the whole ground.  In the video, the fire burns away the poplar fluff to reveal green grass underneath. Remarkably enough, it doesn’t set any of the trees or the grass aflame. Even a bench in the park remains untouched by the fire.

खालीपन

अपने अंदर के खालीपन को भरने के लिये

हमने कागज़ पर उकेरे अपने शब्द अौर भाव।

पर धरा का खालीपन कौन भरेगा?

पेङों, घासोँ को काट कागद…कागज़ बनने के बाद?