राहें

कभी-कभी जिंदगी इतनी बदल जाती है कि लगता है, पुराना सब कुछ धुँध और धुएँ में खो गया।

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सब कहते हैं,

राहें बदल गईं हैं.

हमने अपनी पुरानी राहें छोड़ दीं हैं.

समझ नहीं आया ,

समझ नहीं आया कि

मेरी राहें बदल गईं हैं

या

राहें ….सड़कें ….बदल गईं हैं,

या उन सड़कों ने हमें छोड़ दिया ?

Image courtesy – Chandni Sahay

You Start Dying Slowly आप धीरे धीरे मरने लगते हैं

नोबेल पुरस्कार विजेता ब्राजीली कवियत्री मार्था मेरिडोस की “You Start Dying Slowly कविता के लिए नोबल पुरस्कार मिला था जिस का हिन्दी अनुवाद –

1) आप धीरे-धीरे मरने किधीरे-धीरे मरने लगते हैं, अगर आप:

– करते नहीं कोई यात्रा,

– पढ़ते नहीं कोई किताब,

– सुनते नहीं जीवन की ध्वनियाँ,

– करते नहीं किसी की तारीफ़।

2) आप धीरे-धीरे मरने लगते हैं, जब आप

– मार डालते हैं अपना स्वाभिमान,

– नहीं करने देते मदद अपनी और न ही करते हैं मदद दूसरों की।

3) आप धीरे-धीरे मरने लगते हैं, अगर आप:

– बन जाते हैं गुलाम अपनी आदतों के,

– चलते हैं रोज़ उन्हीं रोज़ वाले रास्तों पे,

– नहीं बदलते हैं अपना दैनिक नियम व्यवहार,

– नहीं पहनते हैं अलग-अलग रंग, या

– आप नहीं बात करते उनसे जो हैं अजनबी अनजान।

4) आप धीरे-धीरे मरने लगते हैं, अगर आप:

– नहीं महसूस करना चाहते आवेगों को, और उनसे जुड़ी अशांत भावनाओं को, वे जिनसे नम होती हों आपकी आँखें, और करती हों तेज़ आपकी धड़कनों को।

5) आप धीरे-धीरे मरने लगते हैं, अगर आप:

– नहीं बदल सकते हों अपनी ज़िन्दगी को, जब हों आप असंतुष्ट अपने काम और परिणाम से,

– अग़र आप अनिश्चित के लिए नहीं छोड़ सकते हों निश्चित को,

– अगर आप नहीं करते हों पीछा किसी स्वप्न का,

– अगर आप नहीं देते हों इजाज़त खुद को, अपने जीवन में कम से कम एक बार, किसी समझदार सलाह से दूर भाग जाने की..।

तब आप धीरे-धीरे मरने लगते हैं..!!

सुभद्रा कुमारी चौहान की पुन्यतिथि पर उनकी कविता

यह कदंब का पेड़ अगर माँ होता यमुना तीरे।

मैं भी उस पर बैठ कन्हैया बनता धीरे-धीरे।।

ले देतीं यदि मुझे बांसुरी तुम दो पैसे वाली।

किसी तरह नीची हो जाती यह कदंब की डाली।।

तुम्हें नहीं कुछ कहता पर मैं चुपके-चुपके आता।

उस नीची डाली से अम्मा ऊँचे पर चढ़ जाता।।

वहीं बैठ फिर बड़े मजे से मैं बांसुरी बजाता।

अम्मा-अम्मा कह वंशी के स्वर में तुम्हें बुलाता।।

सुन मेरी बंसी को माँ तुम इतनी खुश हो जाती।

मुझे देखने काम छोड़ कर तुम बाहर तक आती।।

तुमको आता देख बांसुरी रख मैं चुप हो जाता।

पत्तों में छिपकर धीरे से फिर बांसुरी बजाता।।

गुस्सा होकर मुझे डांटती, कहती “नीचे आजा”।

पर जब मैं ना उतरता, हंसकर कहती “मुन्ना राजा”।।

“नीचे उतरो मेरे भैया तुम्हें मिठाई दूंगी।

नए खिलौने, माखन-मिसरी, दूध मलाई दूंगी”।।

बहुत बुलाने पर भी माँ जब नहीं उतर कर आता।

माँ, तब माँ का हृदय तुम्हारा बहुत विकल हो जाता।।

तुम आँचल फैला कर अम्मां वहीं पेड़ के नीचे।

ईश्वर सेकुछ विनती करतीं बैठी आँखें मीचे।।

तुम्हें ध्यान में लगी देख मैं धीरे-धीरे आता।

और तुम्हारे फैले आँचल के नीचे छिप जाता।।

तुम घबरा कर आँख खोलतीं, पर माँ खुश हो जाती।

जब अपने मुन्ना राजा को गोदी में ही पातीं।।

इसी तरह कुछ खेला करते हम-तुम धीरे-धीरे।

यह कदंब का पेड़ अगर माँ होता यमुना तीरे।।

हौसला

तेल खत्म होते दिये की धीमी लौ की पलकें झपकने लगी,

हवा के झोंके से लौ लहराया

अौर फिर

पूरी ताकत से जलने की कोशिश में……

 धधका …..तेज़ जला…. अौर आँखें बंद कर ली।

बस रह गई धुँए की उठती लकीरें अौर पीछे की दीवार पर कालिख के दाग।

तभी पूरब से सूरज की पहली किरण झाँकीं।

शायद दीप के हौसले को सलाम करती सी।

ठोकर

वक्त ने गुजरते-गुजरते

पलट कर पूछा –

जब भी होते हो खुश या दुखी ,

कहते हो – यह वक्त गुजर जायेगा।

फिर मेरे गुजरने पर याद क्यों करते हो?

हमने कहा, क्योंकि

तुम्हारी ठोकरों ने  हमें तराशा है………………

कैक्टस Cactus

रेत पर, तपते  रेगिस्तान में

खिल आये कैक्टस

ने बिना ङरे

 चटक रंगों को बिखेरा।

किसी ख़ूबसूरत नज़्म या कविता की तरह ……

गर्म बयार अौर

आग उगलते सूरज

ने  नन्हे से कैक्टस के हौसले देख

नज़रें झुका  ली ।

 

मुकम्मल जहाँ

 

सपने, कविता ,ग़ज़ल, शायरी में तो जमीं आसमां अौ सारे जहाँ मिल जाते हैं..

पर उनसे बाहर निकलो , तब मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता ।

रंग-बिरंगी तितलियों से विचार

जेहन में उमङते-घुमङते विचार,

पन्नों पर शब्दों का जाल बना लिख ङालो,

तब

कविता बन जाती है………..

वरना,

ये उङ जाते हैं,

रंग-बिरंगी तितलियोँ की तरह।

शायद …. किसी अौर फूल पर !!!!

मैं एक लड़की ( कविता 1 )

मेरी पाँच कविताएँ / My 5 Poems Published in She The Shakti, Anthology– POEM 4

 

इस दुनिया मॆं मैने
आँखें खोली.
यह दुनिया तो
बड़ी हसीन
और रंगीन है.

मेरे लबों पर
मुस्कान छा गई.
तभी मेरी माँ ने मुझे
पहली बार देखा.
वितृष्णा से मुँह मोड़ लिया

और बोली -लड़की ?
तभी एक और आवाज़ आई
लड़की ? वो भी सांवली ?

Source: मैं एक लड़की ( कविता 1 )

फ़ीनिक्स या मायापंछी ? -कविता Phoenix-poetry

In Greek mythology, phoenix   is a long-lived bird that is cyclically regenerated or reborn. Associated with the Sun, a phoenix obtains new life by arising from the ashes . may symbolize renewal

फ़ीनिक्स एक बेहद रंगीन पक्षी  होता है । जिस की चर्चा प्राचीन मिथकों व दंतकथाओं में पाया जाता है।  माना जाता है कि  वह मर कर भी राख से पुनः जी उठता है।

phoenix  1.jpg

एक लड़की भीगी आंखों वाली।

उसकी भीगी आंखें जैसे,

अोस भरी भीगी रातें हो।

थोड़ी   जिद्दी, थोङी हैरान-परेशान,

माया पंछी की तरह मायावी।

लड़ती झगड़ती दुनिया की अनुचित बातों से,

फिनिक्स

की तरह हर बार फिर से उठ जाती

पता नहीं कहां से वह शक्ति लाती

कितनी बार  राख से पुनर्जन्म लेने की काबलियत है उसकी?

हर बार, हर बार………..पर  कितनी बार……..?

कौन जाने कितनी बार??????????

 

 

Images from internet.