कई बार जड़ा नाज़ुक आईने को ,
कभी चाँदी, कभी सोने,
कभी पन्नों, कभी माणिक में।
पर बदला नहीं इस ने कभी अक्स-ए-हकीकत।
हैरान हैं, इस गज़ब की ईमानदारी से।
ऐसे जमाने में.
जब बिकते हैं सख्त जां लोग भी लाचारी में।
ख़्वाब था, ख़्वाहिशें थीं या हक़ीक़त …. मालूम नहीं!
लगता था जैसे जागती अँधेरी रातों में,
नींद आते कोई आ बैठा पायताने, सहलाता तलवों को.
जहाँ उग आए थे फफोले, ज़िंदगी के दौड़ में भागते-दौड़ते .
दर्द देते, फूट गए थे कुछ छाले…. फफोले…… .
क्या जागती ज़िंदगी में भी कोई मलहम लगाने आएगा?
ज़िंदगी बुनती रहती है सपने
धागे के ताने-बाने से,
रेशम सी बनाती ।
तभी,जब सुहानी बयार
रुख बदल आँधी बन जाती है.
रेशम के ताने बाने तार-तार कर जाती है।
यादें हलकी हो भी जायें।
दर्द कहाँ कम होता है?
सोन्धी-सोन्धी ख़ुश्बू बिखर गई फ़िज़ा में.
कहीं बादल बरसा था या आँखें किसी की?
कहा था –
ना कुरेदो अतीत की यादों को.
माज़ी…..अतीत के ख़ाक में भी बड़ी आग होती है.
आदतें भी बड़ी अजीब होतीं हैं.
इनमे भी नशा वाजिब होते है.
ना कोई वायदा, ना लौटने के इरादे.
ना जाने कौन सा अनजान सफ़र अौर राहें.
मालूम है, वे हैं वन-वे राहें.
मालूम है दरवाज़ा खड़का होगा हवा से,
मगर उम्र कट रही है इंतज़ार में.
दरख़्तों…पेड़ों को कटाते,
पसीने से तर-ब-तर पेशानी और चेहरा पोछते,
छाया खोजती निगाहे ऊपर उठीं,
था खुला आकाश और चिलचिलाती धूप !
कटे कराहते दरख़्तों और डालियों ने कहा,
अब तपिश से बचाने को हमारा साया….छाया नहीं.
करो इंतज़ार धूप ढलने का.
तुमने हमारे साये में हमें हीं काट डाला!
image- Aneesh
बिखरी पड़ी है तेरी रौशनी हर ओर।
हम ढूँढते रहते हैं मंदिरों-मस्जिदों-गिरजों में।
आवाज़ें देते रहते हैं माजरों-समाधियों पर।
सुनते नहीं लौट कर आती सदायें….गूँज अपने अंदर की.
क्यों भूल जातें हैं-
मेरा मुझमें कुछ नहीं, जो कुछ है सो तेरा है।
बस तेरी अमानतें हैं, जो लौटनीं है।
रूह से रूह तक प्रेम पहुँचाना है।
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