
Eternal Shine !!

Eternal Shine !!
ना है चाँद-सितारे तोड़ लाने की फ़रमाइश।
ना हीरे-मोती, गहने, पाजेब चाहिेए।
नहीं चाहिये गुलाब, कमल, गेंदे या अमलतास।
वापस आ सकोगे क्या?
अकेले चाय पीते-पीते दिल उब सा गया है।
बस एक कप फीकी चाय का साथ चाहिए ।
यह कविता आदरणीय मनोरमा जी अौर अनिल जी को समर्पित है. जो किसी कारणवश दूसरे शहर में शिफ्ट हो रहे हैं.
This poem is dedicated to respected Anil ji and Manorama ji on their farewell.
अर्थ – क़तरा- बूँद ड्रॉप, कालकूट – ज़हर poison, कैफ़ियत- बहाना excuse, रूह – आत्मा soul, अल्फ़ाज़ -शब्द .
चले थे शिकायतों की पोटली ले ज़िंदगी के पास.
हँसी वह और बोली एहसान फ़रामोश ना बनो.
तुम्हारा अपना क्या है?
ज़िंदगी? तन? मन? धन? साँसे?
सब मिला है तुम्हें
दाता से उधार, ऋण में.
बस हिफ़ाज़त से रखो.
जाने से पहले सब वापस करना है.
और गौर से उन्हें भी देखो जिनके पास तुमसे कम है,
पर वे खुश तुमसे ज़्यादा है.
Image courtesy – Aneesh
यह खबर पढ़ कर सभी पक्षियों को बड़ी हैरानी हुई. इंसानों ने रवायत, नियमों को अपने आप पर लागू होते देख बोल पड़े खग – बड़े विचित्र हैं ये ! बिना हमारी कामना जाने हमें क़ैद में रख कर मन बहलाना तो इनका पुराना शग़ल था. पर ये नहीं मालूम था अपने यहाँ के रीत और कुरीति हम पर भी थोप रहें हैं. नर-नारी, नर-मादा के मूल्यों में भी श्रेष्ठता, उच्चता-निम्नता का खेल? इनसे ज़्यादा समझदार तो हम हैं. खुले आसमान में खुला और बंधनविहीन जीवन जीतें हैं.

टूट कर गिरे-बिखरे कुछ लम्हे थे,
नज़रों के सामने।
जैसे हवा के झोंके से धरा पर बिखर अाईं,
फूलों की पंखुड़ियों।
कुछ भूले-बिसरे नज़ारें और कुछ यादें ,
जैसे कल की बातें हो।
आज सारे पल,
अौर सारी बीतीं घड़ियाँ पुरानी अौर अनजानी लगीं।
ऐसा दस्तूर क्यों बनाया है ऊपर वाले ने?
राह के पत्थरों के ठोकरों ने सिखाया,
राह-ए-ज़िंदगी पर चलना।
बुतों का इबादत किया हर दम।
फिर क्यों फेंक दें इन पाषणों को? ,
सबक तो इन्हों ने भी दिये कई बार।
क्यों, किसी के ‘क्या हाल है?’ पूछते
दर्दे-ए-दिल का हर टांका उधड़ता चला जाता है?
कपड़े के थान सा दिल का हर दर्द,
तह दर तह, अनजाने खुलता चला जाता है।
यह सोचे बिना, इसे समेटेगा कौन?
ख़ता किसकी है?
पूछने वाले के अपनेपन की?
या पीड़ा भरे दिल की?
Image- Aneesh
You must be logged in to post a comment.