Tag: कविता
फ़िज़ा में !!!
सोन्धी-सोन्धी ख़ुश्बू बिखर गई फ़िज़ा में.
कहीं बादल बरसा था या आँखें किसी की?
कहा था –
ना कुरेदो अतीत की यादों को.
माज़ी…..अतीत के ख़ाक में भी बड़ी आग होती है.
वन-वे राहें
आदतें भी बड़ी अजीब होतीं हैं.
इनमे भी नशा वाजिब होते है.
ना कोई वायदा, ना लौटने के इरादे.
ना जाने कौन सा अनजान सफ़र अौर राहें.
मालूम है, वे हैं वन-वे राहें.
मालूम है दरवाज़ा खड़का होगा हवा से,
मगर उम्र कट रही है इंतज़ार में.
तुमने हमारे साये में हमें हीं काट डाला!
दरख़्तों…पेड़ों को कटाते,
पसीने से तर-ब-तर पेशानी और चेहरा पोछते,
छाया खोजती निगाहे ऊपर उठीं,
था खुला आकाश और चिलचिलाती धूप !
कटे कराहते दरख़्तों और डालियों ने कहा,
अब तपिश से बचाने को हमारा साया….छाया नहीं.
करो इंतज़ार धूप ढलने का.
तुमने हमारे साये में हमें हीं काट डाला!
image- Aneesh
रूह से रूह तक
बिखरी पड़ी है तेरी रौशनी हर ओर।
हम ढूँढते रहते हैं मंदिरों-मस्जिदों-गिरजों में।
आवाज़ें देते रहते हैं माजरों-समाधियों पर।
सुनते नहीं लौट कर आती सदायें….गूँज अपने अंदर की.
क्यों भूल जातें हैं-
मेरा मुझमें कुछ नहीं, जो कुछ है सो तेरा है।
बस तेरी अमानतें हैं, जो लौटनीं है।
रूह से रूह तक प्रेम पहुँचाना है।
अतीत
ज़िन्दगी के रंग – 213
जो बनते रहें हैं अपने.
कहते हैं पहचान नहीं पाए तुम्हें !
आँखों पर गुमान की पट्टी ऐसी हीं होती है.
अच्छा है अगर लोंग पहले पहचान लें ख़ुद को।
ज़िंदगी के राहों में,
हम ने बख़ूबी पहचान लिया इन्हें!
मित्र
खोज रहें हैं, एक सुदामा सा कोई मिल जाए !
वैसे तो मीत बनाने को
ना जाने कब से ढूँढ रहें हैं कान्हा को भी.
अभी तक वो तो मिले नहीं.
कहते हैं, अहंकार सेकृष्ण को पाया नहीं जा सकता.
अब मीरा-राधा सा निश्छल हृदय कहाँ से लायें?
जो कृष्ण मिल जायें?
इसलिए खोज रहें हैं,
एक सुदामा सा तो कोई मित्र मिल जाए !
शुभ मित्रता दिवस !!!!
जान पहचान !
किसी को जानना काफ़ी नहीं होता हैं.
जानना है सचमुच में,
तब अच्छाइयों और कमियों के साथ जानो.
जीवन के मोड़ और ऊतार चढ़ाव में पहचानों.
उसके सुख-दुख जानो।
वरना आईना
भी जानता-पहचानता है.
रोते देख रोता है
हँसते देख हँसता है.
पर रहता है दूर, दीवार पर हीं है.
बातें, जो बीत गईं !!
कहते हैं जो बीत गई वो बात गई.
उन्हें जाने देना चाहिए !
पर सच तो है कि बहुत सी बीती बातें हीं
ठहर जातीं है बीत जाने पर भी,
जिद्द की तरह !!
बातों का क्या है – कही, अनकही,
कुछ अधूरी, कुछ पूरी. अटकी रहतीं हैं,
घर बना कर ज़ेहन के किसी कोने में.
ज़िन्दगी का हिस्सा बन.
जो बीत गई ,
वो बात रह गई ज़िंदगी का हिस्सा बन कर !!!


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