Every child
comes with the message,
that God is not yet
discouraged of man.
~~ Rabindranath Tagore
When you look for God,
God is in the look of your eyes.
In the thought of looking,
nearer to you than your self,
or things that have happened to you.
There’s no need to go outside.
Be melting snow.
Wash yourself of yourself.
A white flower grows in the quietness.
Let your tongue become that flower.
~ Beloved Rumi ~ ❤️❤️
Thousands of candles
can be lighted from a single candle,
and the life of the candle
will not be shortened.
Happiness never decreases
by being shared.
~~Buddha
Indeed,
we are one soul,
you and me.
In the show
and hide you in me,
I am in you.
Here is the deeper meaning
of my relationship with you,
Because there is nor I, nor you.
between you and me
Beloved Rumi ~ ❤️❤️
तारापीठ, साहपुर ग्राम पंचायत, मारग्राम पुलिस स्टेशन का एक छोटा सा गाँव है|तारापीठ बीरभूम जिले में है।यहाँ तारापीठ रेलवे स्टेशन है। रामपुर हाट निकटतम बड़ा रेलवे स्टेशन है जो यहाँ से लगभग 5-6 किमी दूर है। आसनसोल रेलवे स्टेशन भी यहाँ से करीब है। यहाँ रुकने के लिए अनेक होटल हैं। मंदिर मेँ दर्शन के दो मार्ग है। पहला सामान्य दर्शनार्थियों के लिए जो निःशुल्क है। दूसरा मार्ग उन विशिष्ट लोगों के लिए है जो 200/ रु का प्रवेश टिकिट लेते हैं। उन्हें आविलम्ब दर्शन की सुविधा प्राप्त होती ही। मंदिर दोपहर मेँ एक से दो बजे बंद कर दिया जाता है। इस समय माँ को भोग लगाया जाता है। यह हमलोगों के लिए एक यादगार यात्रा थी। तारापीठ के पहले हमलोगों ने वक्रेश्वर महादेव का दर्शन भी किया। शिव (वक्रेश्वर महादेव) और शक्ति (माँ तारा) का दर्शन सौभाग्य की बात है। वक्रेश्वर महादेव के मंदिर का स्थान गर्मपानी के नाम से भी जाना जाता है।
मंदिर और देवी का रूप – तारापीठ भारत भर में स्थित 51 पवित्र शक्ति पीठ में से एक है। पश्चिम बंगाल में द्वारका नदी के तट पर तारापीठ हरे-भरे धान के खेतों के बीच मैदानों में स्थित है। यह झोपड़ियों और तालाबों वाला एक ठेठ बंगाली गांव है। मंदिर लाल ईंटों की मोटी दीवारों से निर्मित है। इसमें कई मेहराब और एक शिखर है।
देवी गर्भगृह में स्थित है। गर्भगृह में माँ तारा की जिस मूर्ति को भक्त सामान्य रूप से देखतें है, वह वास्तव मेँ एक तीन फीट की धातु निर्मित मूर्ति है। जिसे वास्तविक पाषाण प्रतिमा पर सुशोभित किया जाता है। इसे देवी का राजवेश कहा जाता है।मान्यता है कि देवी शिला मुर्ति के रुप में सभी को दर्शन नही देना चाहती थीं। अतः उन्होंने एक अन्य आवरण या राजवेश भी उपलब्ध करवाया। यह राजवेश देवी का सौम्य रूप है। देवी के माथे पर लाल कुमकुम की बिंदी है। पुजारी इस कुमकुम / सिंदूर का एक तिलक माँ तारा के आशीर्वाद स्वरूप भक्तों के माथे पर लगाते हैं। माँ तारा की मौलिक मूर्ति देवी के रौद्र और क्रोधित रूप को दिखाता है। इसमें माँ तारा को बाल शिव को दूध पिलाते दर्शाया गया है। यह मूर्ति पत्थर की है। देवी के गले मेँ मुंडमाल है। मुख और जिव्हा रक्तरंजित है। चार हाथों मेँ विभिन्न हथियार सुशोभित है। जब 4:30 बजे सुबह मंदिर खुलता है तब केवल भाग्यशाली भक्तों को देवी के इस रूप के दर्शन का मौका मिलता है। मंदिर के परिसर में पवित्र “जीवित तालाब” निर्मित है।किवदंती है कि इस ताल में मृत को भी जीवित करने की शक्ति थी।
चढ़ावा या भोग – यहाँ भक्तगण समान्यतः नारियल, पेड़ा, सिंदूर, अगरू, चन्दन, गुलाबजल, आलता, फल, चुनरी, कमल, कनेर, नीला अपराजिता, जवा पुष्प या गेंदे की माला, बेलपत्र, नीली या लाल साड़ियां चढ़ते हैं। देवी को रुद्राक्षा माला भी प्रिय है क्योंकि मान्यता है कि रुद्राक्ष भगवान रुद्र (शिव का क्रोधी मुद्रा) के नेत्र के अश्रु बिन्दु से निर्मित हुए है।
कच्ची हल्दी का माला और नींबू की माला भी देवी को प्रिय है। गर्भगृह के ठीक बाहर माँ तारा के युगल चरण द्व्य हैं। जिस पर आलता डाला जाता है। तांत्रिक पद्धति के अनुसार कुछ भक्त आसव या मदिरा की बोतलें और अस्थि निर्मित माला का प्रयोग पूजा के लिए करते हैं। यहाँ छाग या खस्सी की बलि भी दी जाती है। मछली, खीर, दही, शहद मिश्रित चावल, शोल मछली, खस्सी का मांस आदि भी देवी को प्रिय है। वृहदनील तंत्र के दूसरे अध्याय में इसका निम्नलिखित वर्णन मिलता है-
मधुपर्कं विशेषेण देविप्रीतिकरं परम्।
सन्देश-मुष्णं दद्दाच्च लड्डू-कादि-समन्वितम् ॥२-८३॥
पायसं कृसरं दद्दाच्छर्करा-गुडसंयुक्तम्।
आज्यं दधि मधुन्मिश्रं तथान्नानि निवेदयेत् ॥२ -८४॥
शाल-मत्स्यं च पाठीनं गोधिका-मंस-मुत्तमम्।
अन्नं च मधुना मिश्रं यंत्राद् दद्दाच्च मंत्रवित् ॥२-८६॥
छाग-देवी माँसं तथा देवी रोहितं मतस्य-भर्जितम्।
योनिमुद्रां प्रदर्श्याथ आज्ञां प्राप्य यथाविधि ॥२-८७॥
महाश्मशान भूमि
बंगाल वामाचार, तंत्र साधना और शक्ति उपासना का प्राचीन केंद्र है। तारापीठ मेँ भी तंत्र साधना प्राचीन कल से प्रचलित है। श्मशान भूमि शक्ति उपासना का अभिन्न अंग माना जाता है। श्मशान भूमि जंगल परिवेश के बीच, सामाजिक जीवन और व्यवस्था से दूर होता है। तारापीठ मेँ श्मशान भूमि शहर की सीमा के अंत में नदी किनारे पर स्थित है। इस श्मशान भूमि और मंदिर में बामखेपा अवधूत ने एक भिक्षुक के रूप में साधना किया था। उन्होंने माँ तारा की पूजा करने के लिए अपने पूरा जीवन समर्पित कर दिया। उनका आश्रम भी मंदिर के करीब स्थित है। मंदिर परिसर मेँ उनकी मूर्ति स्थापित है। अपने गुरु संत कैलाशपति के संरक्षण मेँ बामखेपा अवधूत ने योग का ज्ञान और तांत्रिक सिद्धियाँ प्राप्त की थीं।
तांत्रिक साधकों का मानना है कि माँ उग्र तारा का पसंदीदा स्थान श्मशान भूमि है। इसलिए बहुधा देवी तारा का मूर्तिरूप में चित्रण श्मशान भूमि के आस-पास किया जाता है। तारा,श्मशान भूमि, हड्डियों और कंकाल की ओर आकर्षित होती है, इस विश्वास के साथ तांत्रिक साधक यहाँ साधना करने के लिए आते है।
कई साधु स्थायी रूप से यहां रहते हैं। राख लिप्त साधु बरगद के पेड़ के नीचे या मिट्टी के झोपड़ियों मे रहते हैं। उनकी झोपड़ियों के दीवार तारायंत्र, लाल सिंदूर आरक्त खोपड़ी से अलंकृत होती हैं। प्रवेश द्वार पर गेंदा की माला और खोपड़ी से सजी माँ तारा की आकृति, त्रिशूल और जलती हुई धुनी आम दृश्य है। वे मानव के साथ-साथ गीदड़ों, गिद्धों की खोपड़ी और साँप की खाल / केंचुली से भी झोपड़ियों को सजाते है। पूजा और तांत्रिक उद्देश्यों के लिए इन वस्तुओं का इस्तेमाल होता हैं।
किंवदंतियां- मंदिर और देवी से संबंधित इस जगह की उत्पत्ति और महत्व पर कई किंवदंतियां हैं।
1) एक प्रसिद्ध कथा शक्तिपीठ से संबंधित है। ऐसी मान्यता है कि यहाँ सती की तीसरी आंख का तारा गिरा था जो शक्ति, विनाश और क्रोध का प्रतीक है। सती भगवान शिव की पहली पत्नी थी। सती के पिता ने विराट यज्ञ का आयोजन किया। पर यज्ञ के लिए शिव और सती को आमंत्रित नहीं किया था। फलतः सती ने अपमानित महसूस किया और सती ने पिता द्वारा आयोजित यज्ञ की आग में कूद कर अपनी जान दे दी। इस से व्यथित, विछिप्त शिव ने यज्ञ कुंड से सती के मृत शरीर को उठा लिया।
सती के मृत शरीर ले कर वे अशांत भटकने लगे। शिव सति के मृत देह को अपने कन्धे पर उठा ताण्डव नृत्य करने लगे। फ़लस्वरुप पृथ्वी विध्वंस होने लगी। समस्त देवता डर कर ब्रम्हा और विष्णु के पास गये और उनसे समस्त संसार के रक्षा प्रार्थन की। विष्णु ने शिव को शांत करने के उद्देश्य से अपने चक्र से सती के मृत शरीर के खंडित कर दिया। फलतः सती के शरीर के अंग भारत उपमहाद्वीप के विभिन्न स्थानों पर गिर पड़े। शरीर के अंग जहाँ भी गिरे उन स्थानों पर विभिन्न रूपों में देवी की पूजा के केंद्र बन गए और शक्तिपीठ कहलाए। ऐसे 51 पवित्र शक्तिपीठ हैं। तारापीठ उनमें से एक है। माना जाता है कि यहाँ सती के शक्तिशाली तृतीय नेत्र का तारा गिरा था। इसलिया यह तारापीठ कहलाया और शक्ति, विनाश और क्रोध का प्रतीक माना गया। अतः इसे साधना के लिए शक्तिशाली स्थल माना गया है।
२) दूसरी कहानी यहाँ स्थापित देवी के मौलिक मूर्ति से संबन्धित है। ब्रह्मांड को बचाने के लिए महासागरों के मंथन से निकला हलाहल यानि गरल पान शिव ने किया। जहर के प्रभाव से बचने के लिए शिव ने गरल को गले मेँ धारण कर लिया। जिससे उनका गला नीला पड़ गया और शिव नीलकंठ नाम से पुकारे जाने लगे।
इस कालकूट जहर को पीने से उन्हे गले में तीव्र जलन उत्पन्न हुई। तब तारा के रूप में सती ने जहर के प्रभाव से शिव को राहत देने के लिए अपना स्तनपान कराया। उन्होंने शिव को बालरूप में परिवर्तित कर, अपनी गोद में ले कर स्तनपान करवाया। जिससे शिव के गले की जलन शांत हुई। तारापीठ की मौलिक पाषाण प्रतिमा में यहीं रूप चित्रित किया गया है।
3) ऐसी मान्यता है कि महर्षि वशिष्ठ, देवी तारा की पूजा करने और हिंदुओं के बीच उसकी पूजा के महत्व का प्रसार करने वाले पहले व्यक्ति थे। सतयुग में महर्षि वशिष्ठ के पिता भगवान ब्रह्मा ने उन्हें सिद्धि प्राप्त करने के लिए देवी तारा की पूजा करने कहा। ब्रह्मा जी ने अपने पुत्र वशिष्ठ को तारा मन्त्र की दिक्षा दी और मन्त्र सिद्ध करने कहा।
पिता के आज्ञानुसार वशिष्ठ निलान्चल पर्वत पर गये और देवी माँ की साधना करने लगे। परन्तु सिद्धि नहीं प्राप्त हुई। तब वे अपने पिता ब्रह्मा के पास गये। ब्रह्मा जी ने उन्हें निलान्चल छोड नील-पर्वत पर तपस्या करने कहा। परन्तु उन्हें इस बार भी सफलता नहीं मिली। अतः उन्हें लगा कि इस मंत्र को सिद्ध नही किया जा सकता है। तभी आकाशवाणी हुई,वशिष्ठ तुम चीन देश जाओ और वहाँ भगवान बुद्ध से साधन का सही विधि और क्रम जान कर मेरी अराधना करो।
वशिष्ठ मुनि चीन पहुंचे। वहाँ मुनि ने देखा कि भगवान बुद्ध मदिरा, माँस, मतस्य, नृत्य करती हुई नृत्यागंनायों के साथ व्यस्त है। यह देख वे मायूस हो कर वहाँ से लौटने लगे। तब बुद्ध ने उन्हें रुकने कहा। जब वशिष्ठ मुनि ने पुनः बुद्ध की ओर देखा तो वो चकित रह गये।
भगवान बुद्ध शान्त बैठे थे और ध्यान योग में थे। उसी तरह नृत्यागनाऐं भी आसन लगा कर बैठी थीं, मदिरा, माँस, मतस्य आदी सभी वस्तुये, पुजन सामाग्रियों में परिवर्तित हो गईं थीं। अन्तर्यामी बुद्ध ने वशिष्ठ मुनि को माँ तारा के वामाचार पूजन की विधि बताई । उन्होंने बताया कि बैधनाथ धाम के १० योजन पूर्व, वक्रेश्वर के ४ योजन ईशान, जहन्वी के ४ योजन पश्चिम, उत्तर वाहिनी द्वारीका नदी के पूर्व, देवी सति का उर्ध नयन तारा अर्थात ज्ञान रुपि तृतीय नेत्र गिरा है। वहाँ पन्च मुण्डी आसन बना कर साधना करो। पन्च मुण्डी का अर्थ है दुर्घटना या आकाल मृत्यु को प्राप्त मनुष्य, कृष्ण सर्प, लंगुर, हाथी और उल्लू की खोपडी से बना हुअ आसन। वहाँ देवी तारा माँ के चरण चिन्ह अंकित है। उस स्थान पर देवी माँ के मन्त्र का ३ लाख जप करो और पन्चमकार विधि अर्थात मदिरा, माँस, मतस्य, मुद्रा तथा मैथुन से पूजा करो। तब तुम्हें देवी माँ की कृपा प्राप्त होगी।
वशिष्ठ मुनि ने बुद्ध के बताए विधि से पन्च मुण्डी आसन का निर्माण किया। फिर देवी अराधना की। फ़लस्वरुप उन्हें देवी माँ ने एक अत्यंत उज्जवल ज्योति के रुप में दर्शन दिया और पूछा कि तुम किस रुप में मेरा साक्षात दर्शन करना चाहते हो। वशिष्ठ मुनि ने उन्हें जगत जननी के रुप में देखने की कामना की।
तब देवी माँ ने वशिष्ठ मुनि को भगवान शिव को बालक रुप में अपना स्तन पान करते हुये दर्शन दिया। देवी माँ ने वशिष्ठ मुनि से वर मांगने के लिये कहा। वशिष्ठ मुनि ने उत्तर दिया –” आपका दर्शन मेरे लिये सब कुछ है। आप अगर कुछ देना चाहती है तो यह वर दिजिये कि आज के बाद इस आसन पर कोई भी साधक, आप के मन्त्रों का ३ लाख जप कर सिद्धी प्राप्त कर सके।” देवी माँ ने वशिष्ठ को कामनानुसार वर प्रदन किया। माँ तारा ने अपने भगवान शिव को बालक रुप में स्तन पान कराते स्वरूप को शिला में परिवर्तित कर दिय तथा वहीं पर निवास करने लगीं।
4) यह किवदंती तारापीठ के आलौकिक मंदिर के स्थापना से संबन्धित है। लगभग १२०० साल पहले देवी माँ के स्थान की पहचान जय दत्त नाम के एक व्यापारी ने किया। जय दत्त अपने पुत्र और साथियों के साथ द्वारका नदी के जल पथ से व्यापार कर लौट रहा था। खाने-पीने का सामान लेने के लिए उन्होंने द्वारिका नदी किनारे, देवी माँ के निवास स्थान पर नाव रोका।
दुर्भाग्यवश वहाँ जय दत्त के पुत्र की सांप काटने से मृत्यु हो गई। दुखी जय दत्त पुत्र के शव नाव पर रख शोक में डूब गया। उसके विलाप को सुनकर देवी ने नाव की खिड़की से जय दत्त से पूछा -” क्यों रो रहे हो? इस नाव में क्या हैं?” पुत्र मृत्यु से शोकाकुल जय दत्त ने बेसुधी में कह दिया- नाव में भस्म भरा पड़ा हैं। तत्काल नाव का सारा सामान राख़ में बदल गया। इस दौरान एक अन्य चमत्कार भी हुआ। उसके साथी नाविकों ने भोजन के लिए पास के तालाब से शोल मछली पकड़ी। उन्होंने उसे काट कर धोने के लिए तालाब के जल में डुबाया। कटी हुई मच्छली अपने आप जुड कर जिवित हो कर तालाब में छलांग लगाकर भाग गई। नाविकों ने जय दत्त को यह अद्भुत घटना सुनाई। तब जय दत्त ने पुत्र के शव को उस तालाब में डाला। चमत्कारिक रूप से वह जीवित हो गया।
सब समझ गये कि इस स्थान पर अवश्य ही कोई आलौकिक शक्ति है। जय दत्त ने उस स्थान पर रह कर उस आलौकिक शक्ति को जानने का प्रण कर लिया। उसने अपने पुत्र सहित कर्मिको को घर लौटा दिया। जय दत्त भक्तिभाव से उस आलौकिक शक्ति को ढूँढने लगा। उसकी भक्ति और पागलपन देख भैरव शिव ने उन्हे दर्शन दिये और उस स्थान से सम्बन्धित समस्त गाथायें सुनाई और उन्हे देवी के मन्त्रों की दिक्षा दी। जय दत्त ने तालाब अर्थात जिवित कुण्ड के किनारे देवी माँ का भव्य मन्दिर बनवाया और शिला मुर्ति को उस मन्दिर में स्थपित कर दैनिक पूजा का प्रबंध किया।
मान्यता है कि देवी शिला मुर्ति के रुप में सभी को दर्शन नही देना चाहती थी। अतः उन्होने एक अन्य आवरण या राजवेश भी उपलब्ध करवाया। यह राजवेश देवी का सौम्य रूप है। माँ ने कहा कि शिला मुर्ति को प्रतिदिन से आवरण से ढक दिया जाये। जय दत्त ने देवी माँ के बताये अनुसार मन्दिर का निर्माण करवाया। जिस दिन मन्दिर महा पूजा के साथ सभी भक्तों के लिये खोला गया। जय दत्त ने देखा उस शिला मुर्ति के साथ एक अन्य, देवी माँ का भव्य स्वरुप या राजवेश वहाँ पर है। आज भी देवी माँ के बतये हुये क्रम और विधि के अनुसार पूजा अराधना और पशु बली होती है तथा देवी के निर्देशानुसार राजवेश को मूर्ति पर धारण कराया जाता है। माँ तारा के दर्शन के बाद मस्तक श्रद्धा से नत हो जाता है और मन में मंत्र गुंजने लगता है-
“सर्वमङ्गलमङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके।
शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते॥”
Source: तारापीठ ( यात्रा वृतांत और रोचक किंवदंतियां )
IMAGES courtesy –
http://www.templeadvisor.com/temples-in-india/hindu-temples/tarapith-shakti-peetha
Be with those who help your being.
Don’t sit with indifferent people, whose breath
comes cold out of their mouths.
~ Rumi ❤ ❤
Curvy Cupid smile of your lips
may straighten up many problems of your life……..
होठों पर छाई तीरछी
मुस्कान भरी रेखा
जीवन की ना जाने
कितनी कठिनाइयों – परेशानियों
को सुलझा कर
सीधा कर सकती हैं।
विनीता सहाय गौर से कटघरे मे खड़े राम नरेश को देख रही थीं। पर उन्हे याद नहीं आ रहा था, इसे कहा देखा है? साफ रंग, बाल खिचड़ी और भोले चेहरे पर उम्र की थकान थी। साथ ही चेहरे पर उदासी की लकीरे थीं।वह कटघरे मे अपराधी की हैसियत से खड़ा था।वह आत्मविश्वासविहीन था।
लग रहा था जैसे उसे दुनिया से कोई मतलब ही नहीं था। वह जैसे अपना बचाव करना ही नहीं चाहता था।कंधे झुके थे।शरीर कमजोर था। वह एक गरीब और निरीह व्यक्ति था। लगता था जैसे बिना सुने और समझे हर गुनाह कबूल कर रहा था। ऐसा अपराधी तो उन्होंने आज तक नहीं देखा था। उसकी पथराई आखों मे अजीब सा सूनापन था, जैसे वे निर्जीव हों।
लगता था वह जानबूझ कर मौत की ओर कदम बढ़ा रहा था। जज़ साहिबा को लग रहा था- यह इंसान इतना निरीह है। यह किसी का कातिल नहीं हो सकता है।क्या इसे किसी ने झूठे केस मे फँसा दिया है? या पैसों के लालच मे झूठी गवाही दे रहा है?नीचे के कोर्ट से उसे फांसी की सज़ा सुनाई गई थी।
विनीता सहाय ने जज़ बनने के समय मन ही मन निर्णय किया था कि कभी किसी निर्दोष और लाचार को सज़ा नहीं होने देंगी। झूठी गवाही से उन्हे सख़्त नफरत थी। अगर राम नरेश का व्यवहार ऐसा न होता तो शायद जज़ विनीता सहाय ने उसपर ध्यान भी न दिया होता।
दिन भर मे न-जाने कितने केस निपटाने होते है। ढेरों जजों, अपराधियों, गवाहों और वकीलों के भीड़ मे उनका समय कटता था। पर ऐसा दयनीय कातिल नहीं देखा था। कातिलों की आखों मे दिखनेवाला गिल्ट या आक्रोश कुछ भी तो नज़र नहीं आ रहा था। विनीता सहाय अतीत को टटोलने लगी। आखिर कौन है यह?कुछ याद नहीं आ रहा था।
विनीता सहाय शहर की जानी-मानी सम्माननीय हस्ती थीं।
गोरा रंग, छोटी पर सुडौल नासिका, ऊँचा कद, बड़ी-बड़ी आखेँ और आत्मविश्वास से भरे व्यक्तित्व वाली विनीता सहाय अपने सही और निर्भीक फैसलो के लिए जानी जाती थीं। उम्र के साथ सफ़ेद होते बालों ने उन्हें और प्रभावशाली बना दिया था। उनकी बुद्धिदीप्त,चमकदार आँखें एक नज़र में ही अपराधी को पहचान जाती थीं। उन्हे सुप्रींम कोर्ट की पहली महिला जज़ होने का भी गौरव प्राप्त था। उनके न्याय-प्रिय फैसलों की चर्चा होती रहती थी।
पुरुषो के एकछत्र कोर्ट मे अपना करियर बनाने मे उन्हें बहुत तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ा था। सबसे पहला युद्ध तो उन्हें अपने परिवार से लड़ना पड़ा था। वकालत करने की बात सुनकर घर मेँ तो जैसे भूचाल आ गया। माँ और बाबूजी से नाराजगी की तो उम्मीद थी, पर उन्हें अपने बड़े भाई की नाराजगी अजीब लगी। उन्हें पूरी आशा थी कि महिलाओं के हितों की बड़ी-बड़ी बातें करने वाले भैया तो उनका साथ जरूर देंगे। पर उन्हों ने ही सबसे ज्यादा हँगामा मचाया था।
तब विनी को सबसे हैरानी हुई, जब उम्र से लड़ती बूढ़ी दादी ने उसका साथ दिया। दादी उसे बड़े लाड़ से ‘नन्ही परी’ बुलाती थी। विनी रात मेँ दादी के पास ही सोती थी। अक्सर दादी कहानियां सुनाती थी। उस रात दादी ने कहानी तो नहीं सुनाई परगुरु मंत्र जरूर दिया। दादी ने रात के अंधेरे मे विनी के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा- मेरी नन्ही परी, तु शिवाजी की तरह गरम भोजन बीच थाल से खाने की कोशिश कर रही है। जब भोजन बहुत गरम हो तो किनारे से फूक-फूक कर खाना चाहिए।
तु सभी को पहले अपनी एल एल बी की पढाई के लिए राजी कर। न कि अपनी वकालत के लिए। ईश्वर ने चाहा तो तेरी कामना जरूर पूरी होगी। विनी ने लाड़ से दादी के गले मे बाँहे डाल दी। फिर उसने दादी से पूछा- दादी तुम इतना मॉडर्न कैसे हो गई? दादी रोज़ सोते समय अपने नकली दाँतो को पानी के कटोरे मे रख देती थी। तब उनके गाल बिलकुल पिचक जाते थे और चेहरा झुरियों से भर जाता था।
विनी ने देखा दादी की झुरियों भरे चेहरेपर विषाद की रेखाएँ उभर आईं और वे बोल पडी-बिटिया, औरतों के साथ बड़ा अन्याय होता है। तु उनके साथ न्याय करेगी यह मुझे पता है। जज बन कर तेरे हाथों मेँ परियों वाली जादू की छड़ी भी तो आ जाएगी न। अपनी अनपढ़ दादी की ज्ञान भरी बाते सुन कर विनी हैरान थी। दादी के दिये गुरु मंत्र पर अमल करते हुए विनी ने वकालत की पढ़ाई पूरी कर ली। तब उसे लगा – अब तो मंज़िल करीब है।
पर तभी न जाने कहा से एक नई मुसीबत सामने आ गई। बाबूजी के पुराने मित्र शरण काका ने आ कर खबर दी। उनके किसी रिश्तेदार का पुत्र शहर मे ऊँचे पद पर तबादला हो कर आया है। क्वाटर मिलने तक उनके पास ही रह रहा है। होनहार लड़का है। परिवार भी अच्छा है। विनी के विवाह के लिए बड़ा उपयुक्त वर है। उसने विनी को शरण काका के घर आते-जाते देखा है। बातों से लगता है कि विनी उसे पसंद है। उसके माता-पिता भी कुछ दिनों के लिए आनेवाले है।
शरण काका रोज़ सुबह,एक हाथ मे छड़ी और दूसरे हाथ मे धोती थाम कर टहलने निकलते थे। अक्सर टहलना पूरा कर उसके घर आ जाते थे। सुबह की चाय के समय उनका आना विनी को हमेशा बड़ा अच्छा लगता था। वे दुनियां भर की कहानियां सुनाते। बहुत सी समझदारी की बातें समझाते।
पर आज़ विनी को उनका आना अखर गया। पढ़ाई पूरी हुई नहीं कि शादी की बात छेड़ दी। विनी की आँखें भर आईं। तभी शरण काका ने उसे पुकारा- ‘बिटिया, मेरे साथ मेरे घर तक चल। जरा यह तिलकुट का पैकेट घर तक पहुचा दे। हाथों मेँ बड़ा दर्द रहता है। तेरी माँ का दिया यह पैकेट उठाना भी भारी लग रहाहै।
बरसो पहले भाईदूज के दिन माँ को उदास देख कर उन्हों ने बाबूजी से पूछा था। भाई न होने का गम माँ को ही नही, बल्कि नाना-नानी को भी था। विनी अक्सर सोचती थी कि क्या एक बेटा होना इतना ज़रूरी है? उस भाईदूज से ही शरण काका ने माँ को मुहबोली बहन बना लिया था। माँ भी बहन के रिश्ते को निभाती, हर तीज त्योहार मे उन्हेंकुछ न कुछ भेजती रहती थी।आज का तिलकुट मकर संक्रांति का एडवांस उपहार था। अक्सर काका कहते- विनी की शादी मे मामा का नेग तो मुझे ही निभाना है।
शरण काका और काकी मिनी दीदी की शादी के बाद जब भी अकेलापन महसूस करते , तब उसे बुला लेते थे। अक्सर वे अम्मा- बाबूजी से कहते- मिनी और विनी दोनों मेरी बेटियां हैं। देखो दोनों का नाम भी कितना मिलता-जुलता है।जैसे सगी बहनों के नाम हो। शरण काका भी अजीब है। लोग बेटी के नाम से घबराते है। और काका का दिल ऐसा है, दूसरे की बेटी को भी अपना मानते है।
मिनी दीदी के शादी के समय विनी अपने परीक्षा मे व्यस्त थी। काकी उसके परीक्षा विभाग को रोज़ कोसती रहती। दीदी के हल्दी के एक दिन पहले तक परीक्षा थी। काकी कहती रहती थी- विनी को फुर्सत होता तो मेरा सारा काम संभाल लेती। ये कालेज वालों परीक्षा ले-ले कर लड़की की जान ले लेंगे। शांत और मृदुभाषी विनी उनकी लाड़ली थी।
वे हमेशा कहती रहती- ईश्वर ने विनी बिटिया को सूरत और सीरत दोनों दिया है।
आखरी पेपर दे कर विनी जल्दी-जल्दी दीदी के पास जा पहुची। उसे देखते काकी की तो जैसे जान मे जान आ गई। दीदी के सभी कामों की ज़िम्मेवारी उसे सौप कर काकी को बड़ी राहत महसूस हो रही थी। उन्होंने विनी के घर फोन कर ऐलान कर दिया कि विनी अब मिनी के विदाई के बाद ही घर वापस जाएगी।
शाम मे विनी दीदी के साथ बैठ कर उनका बक्सा ठीक कर रही थी, तब उसे ध्यान आया कि दीदी ने कॉस्मेटिक्स तो ख़रीदा ही नहीं है। मेहँदी की भी व्यवस्था नहीं है। वह काकी से बता कर भागी भागी बाज़ार से सारी ख़रीदारी कर लाई। विनी ने रात मे देर तक बैठ कर दीदी को मेहँदी लगाई। मेहँदी लगा कर जब हाथ धोने उठी तो उसे अपनी चप्पलें मिली ही नहीं। शायद किसी और ने पहन लिया होगा।
शादी के घर मे तो यह सब होता ही रहता है। घर मेहमानों से भरा था। बरामदे मे उसे किसी की चप्पल नज़र आई। वह उसे ही पहन कर बाथरूम की ओर बढ़ गई। रात मे वह दीदी के बगल मे रज़ाई मे दुबक गई। न जाने कब बाते करते-करते उसे नींद आ गई।
सुबह, जब वह गहरी नींद मे थी। किसी उसकी चोटी खींच कर झकझोर दिया।कोई तेज़ आवाज़ मे बोल रहा था- अच्छा, मिनी दीदी, तुम ने मेरी चप्पलें गायब की थी। हैरान विनी ने चेहरे पर से रज़ाई हटा कर अपरिचित चेहरे को देखा। उसकी आँखें अभी भी नींद से भरी थीं।
तभी मिनी दीदी खिलखिलाती हुई पीछे से आ गई। अतुल, यह विनी है। सहाय काका की बेटी और विनी यह अतुल है। मेरे छोटे चाचा का बेटा। हर समय हवा के घोड़े पर सवार रहता है। छोटे चाचा की तबीयत ठीक नहीं है। इसलिए छोटे चाचा और चाची नहीं आ सके तो उन्हों ने अतुल को भेज दिया। अतुल उसे निहारता रहा, फिर झेंपता हुआ बोला- “मुझे लगा, दीदी, तुम सो रही हो। दरअसल, मैं रात से ही अपनी चप्पलें खोज रहा था।“
विनी का को बड़ा गुस्सा आया। उसने दीदी से कहा- मेरी भी तो चप्पलें खो गई हैं। उस समय मुझे जो चप्पल नज़र आई मैं ने पहन लिया। मैंने इनकी चप्पलें पहनी है,किसी का खून तो नहीं किया । सुबह-सुबह नींद खराब कर दी। इतने ज़ोरों से झकझोरा है। सारी पीठ दर्द हो रही है। गुस्से मेँ वह मुंह तक रज़ाई खींच कर सो गई। अतुल हैरानी से देखता रह गया। फिर धीरे से दीदी से कहा- बाप रे, यह तो वकीलों की तरह जिरह करती है।
काकी एक बड़ा सा पैकेट ले कर विनी के पास पहुचीं और पूछने लगी – बिटिया देख मेरी साड़ी कैसी है? पीली चुनरी साड़ी पर लाल पाड़ बड़ी खूबसूरत लग रही थी। विनी हुलस कर बोल पड़ी- बड़ी सुंदर साड़ी है। पर काकी इसमे फॉल तो लगा ही नहीं है। हद करती हो काकी। सारी तैयारी कर ली हो और तुम्हारी ही साड़ी तैयार नहीं है। दो मै जल्दी से फॉल लगा देती हूँ।
विनी दीदी के पलंग पर बैठ कर फॉल लगाने मे मसगुल हो गई। काकी भी पलंग पर पैरों को ऊपर कर बैठ गई और अपने हाथों से अपने पैरों को दबाने लगी। विनी ने पूछा- काकी तुम्हारे पैर दबा दूँ क्या?वे बोलीं – बिटिया, एक साथ तू कितने काम करेगी? देख ना पूरे काम पड़े है और अभी से मैं थक गई हूँ। साँवली -सलोनी काकी के पैर उनकी गोल-मटोल काया को संभालते हुए थक जाए, यह स्वाभाविक ही है। छोटे कद की काकी के लालट पर बड़ी सी गोल लाल बिंदी विनी को बड़ी प्यारी लगती थी।विनी को काकी भी उसी बिंदी जैसी गोल-मटोल लगती थीं।
तभी मिनी दीदी की चुनरी मे गोटा और किरण लगा कर छोटी बुआ आ पहुचीं। देखो भाभी, बड़ी सुंदर बनी है चुनरी। फैला कर देखो ना- छोटीबुआ कहने लगी। पूरे पलंग पर सामान बिखरा था। काकी ने विनी की ओर इशारा करते हुई कहा- इसके ऊपर ही डाल कर दिखाओ छोटी मईयां।
सिर झुकाये फॉल लगाती विनी के ऊपर लाल चुनरी बुआ ने फैला दिया। चुनरी सचमुच बड़ी सुंदर बनी थी। काकी बोल पड़ी- देख तो विनी पर कितना खिल रहा है यह रंग।विनी की नज़रें अपने-आप ही सामने रखे ड्रेसिंग टेबल के शीशे मे दिख रहे अपने चेहरे पर पड़ी। उसका चेहरा गुलाबी पड़ गया। उसे अपना ही चेहरा बड़ा सलोना लगा।
तभी अचानक किसी ने उसके पीठ पर मुक्के जड़ दिये- “ तुम अभी से दुल्हन बन कर बैठ गई हो दीदी” अतुल की आवाज़ आई। वह सामने आ कर खड़ा हो गया। अपलक कुछ पल उसे देखता रह गया। विनी की आँखों मेँ आंसू आ गए थे। अचानक हुए मुक्केबाज़ी के हमले से सुई उसकी उंगली मे चुभ गई थी। उंगली के पोर पर खून की बूँद छलक आई थी।
अतुल बुरी तरह हड्बड़ा गया। बड़ी अम्मा, मैं पहचान नहीं पाया था। मुझे क्या मालूम था कि दीदी के बदले किसी और को दुल्हन बनने की जल्दी है। पर मुझ से गलती हो गई- वह काकी से बोल पड़ा। फिर विनी की ओर देख कर ना जाने कितनी बार सॉरी-सॉरी बोलता चला गया। तब तक मिनी दीदी भी आ गई थी।
विनी की आँखों मेँ आंसू देख कर सारा माजरा समझ कर, उसे बहलाते हुए बोली- “अतुल, तुम्हें इस बार सज़ा दी जाएगी।“ बता विनी इसे क्या सज़ा दी जाए? विनी ने पूछा- इनकी नज़रे कमजोर है क्या? अब इनसे कहो सभी के पैर दबाये। यह कह कर विनी साड़ी समेट कर, पैर पटकती हुई काकी के कमरे मे जा कर फॉल लगाने लगी।
अतुल सचमुच काकी के पैर दबाने लगा, और बोला- वाह! क्या बढ़िया फैसला है जज़ साहिबा का। बड़ी अम्मा, देखो मैं हुक्म का पालन कर रहा हूँ। “तू भी हर समय उसे क्यों परेशान करता रहता है अतुल?”-मिनी दीदी की आवाज़ विनी को सुनाई दी। दीदी, इस बार भी मेरी गलती नहीं थी- अतुल सफाई दे रहा था।
फॉल का काम पूरा कर विनी हल्दी के रस्म की तैयारी मेँ लगी थी। बड़े से थाल मे हल्दी मंडप मे रख रही थी। तभी मिनी दीदी ने उसे आवाज़ दी। विनी उनके कमरे मे पहुचीं। दीदी के हाथों मे बड़े सुंदर झुमके थे। दीदी ने झुमके दिखाते हुए पूछा- ये कैसे है विनी? मैं तेरे लिए लाई हूँ। आज पहन लेना। मैं ये सब नही पहनती दीदी- विनी झल्ला उठी। सभी को मालूम है कि विनी को गहनों से बिलकुल लगाव नहीं है। फिर दीदी क्यों परेशान कर रही है? पर दीदी और काकी तो पीछे ही पड़ गई।
दीदी ने जबर्दस्ती उसके हाथों मेँ झुमके पकड़ा दिये। गुस्से मे विनी ने झुमके ड्रेसिंग टेबल पर पटक दिये। फिसलता हुआ झुमका फर्श पर गिरा और दरवाज़े तक चला गया।तुनकते हुए विनी तेज़ी से पलट कर बाहर जाने लगी। उसने ध्यान ही नहीं दिया था कि दरवाजे पर खड़ा अतुल ये सारी बातें सुन रहा था। तेज़ी से बाहर निकालने की कोशिश मे वह सीधे अतुल से जा टकराई। उसके दोनों हाथों में लगी हल्दी के छाप अतुल के सफ़ेद टी-शर्ट पर उभर आए।
वह हल्दी के दाग को हथेलियों से साफ करने की कोशिश करने लगी। पर हल्दी के दाग और भी फैलने लगे। अतुल ने उसकी दोनों कलाइयां पकड़ ली और बोल पड़ा- यह हल्दी का रंग जाने वाला नहीं है। ऐसे तो यह और फ़ैल जाएगा। आप रहने दीजिये। विनी झेंपती हुई हाथ धोने चली गई।
बड़े धूम-धाम से दीदी की शादी हो गई। दीदी की विदाई होते ही विनी को अम्मा के साथ दिल्ली जाना पड़ा। कुछ दिनों से अम्मा की तबियत ठीक नहीं चल रही थी। डाक्टरों ने जल्दी से जल्दी दिल्ली ले जा कर हार्ट चेक-अप का सुझाव दिया था। मिनी दीदी के शादी के ठीक बाद दिल्ली जाने का प्लान बना था। दीदी की विदाई वाली शाम का टिकट मिल पाया था।
***
एक शाम अचानक शरण काका ने आ कर खबर दिया। विनी को देखने लड़केवाले अभी कुछ देर मे आना चाहते हैं। घर मे जैसे उत्साह की लहर दौड़ गई। पर विनी बड़ी परेशान थी। ना-जाने किसके गले बांध दिया जाएगा?
उसके भविष्य के सारे अरमान धरे के धरे रह जाएगे। अम्मा उसे तैयार होने कह कर किचेन मे चली गईं। तभी मालूम हुआ कि लड़का और उसके परिवारवाले आ गए है। बाबूजी, काका और काकी उन सब के साथ ड्राइंग रूम मेँ बातें कर रहे थे। अम्मा उसे तैयार न होते देख कर, आईने के सामने बैठा कर उसके बाल संवारे। अपने अलमारी से झुमके निकाल कर दिये। विनी झुंझलाई बैठी रही।
अम्मा ने जबर्दस्ती उसके हाथों मे झुमके पकड़ा दिये। गुस्से मे विनी ने झुमके पटक दिये। एक झुमका फिसलता हुआ ड्राइंग रूम के दरवाजे तक चला गया। ड्राइंग-रूम उसके कमरे से लगा हुआ था।
परेशान अम्मा उसे वैसे ही अपने साथ ले कर बाहर आ गईं। विनी अम्मा के साथ नज़रे नीची किए हुए ड्राइंग-रूम मेँ जा पहुची। वह सोंच मे डूबी थी कि कैसे इस शादी को टाला जाए। काकी ने उसे एक सोफ़े पर बैठा दिया। तभी बगल से किसी की ने धीरे से पूछा- आज किसका गुस्सा झुमके पर उतार रही थी? आश्चर्यचकित नज़रों से विनी ने ऊपर देखा। उसने फिर कहा- मैं ने कहा था न, हल्दी का रंग जाने वाला नहीं है। सामने अतुल बैठा था।
अतुल और उसके माता-पिता के जाने के बाद काका ने उसे बुलाया। बड़े बेमन से कुछ सोंचती हुई वह काका के साथ चलने लगी। गेट से बाहर निकलते ही काका ने उसके कंधे पर हाथ रखते हुए कहा- “विनी, मैं तेरी उदासी समझ रहा हूँ। बिटिया, अतुल बहुत समझदार लड़का है। मैंने अतुल को तेरे सपने के बारे मेँ बता दिया है। तू किसी तरह की चिंता मत कर। मुझ पर भरोसा कर बेटा।
काका ने ठीक कहा था। वह आज़ जहाँ पंहुची है। वह सिर्फ अतुल के सहयोग से ही संभव हो पाया था। अतुल आज़ भी अक्सर मज़ाक मेँ कहते हैं –“मैं तो पहली भेंट मेँ ही जज़ साहिबा की योग्यता पहचान गया था।“ उसकी शादी मेँ सचमुच शरण काका ने मामा होने का दायित्व पूरे ईमानदारी से निभाया था। पर वह उन्हें मामा नहीं, काका ही बुलाती थी। बचपन की आदत वह बादल नहीं पाई थी।
***
कोर्ट का कोलाहल विनीता सहाय को अतीत से बाहर खींच लाया। पर वे अभी भी सोच रही थीं – इसे कहाँ देखा है। दोनों पक्षों के वकीलों की बहस समाप्त हो चुकी थी। राम नरेश के गुनाह साबित हो चुके थे। वह एक भयानक कातिल था। उसने इकरारे जुर्म भी कर लिया था।
उसने बड़ी बेरहमी से हत्या की थी। एक सोची समझी साजिश के तहत उसने अपने दामाद की हत्या कर शव का चेहरा बुरी तरह कुचल दिया था और शरीर के टुकड़े-टुकड़े कर जंगल मे फेंक दिया था। वकील ने बताया कि राम नरेश का अपराधिक इतिहास है। वह एक क्रूर कातिल है।
पहले भी वह कत्ल का दोषी पाया गया था। पर सबूतों के आभाव मे छूट गया था। इसलिए इस बार उसे कड़ी से कड़ी सज़ा दी जानी चाहिए। वकील ने पुराने केस की फाइल उनकी ओर बढ़ाई। फ़ाइल खोलते ही उनके नज़रों के सामने सब कुछ साफ हो गया। सारी बातें चलचित्र की तरह आँखों के सामने घूमने लगी।
लगभग बाईस वर्ष पहले राम नरेश को कोर्ट लाया गया था। उसने अपनी दूध मुहीं बेटी की हत्या कर दी थी। तब विनीता सहाय वकील हुआ करती थी। ‘कन्या-भ्रूण-हत्या’ और ‘बालिका-हत्या’ जैसे मामले उन्हें आक्रोश से भर देते थे। माता-पिता और समाज द्वारा बेटे-बेटियों में किए जा रहे भेद-भाव उन्हें असह्य लगते थे।
तब विनीता सहाय ने रामनरेश के जुर्म को साबित करने के लिए एड़ी चोटी की ज़ोर लगा दी थी। उस गाँव मेँ अक्सर बेटियों को जन्म लेते ही मार डाला जाता था। इसलिए किसी ने राम नरेश के खिलाफ गवाही नहीं दी। लंबे समय तक केस चलने के बाद भी जुर्म साबित नहीं हुआ।
इस लिए कोर्ट ने राम नरेश को बरी कर दिया था। आज वही मुजरिम दूसरे खून के आरोप में लाया गया था। विनीता सहाय ने मन ही मन सोचा- ‘काश, तभी इसे सज़ा मिली होती। इतना सीधा- सरल दिखने वाला व्यक्ति दो-दो कत्ल कर सकता है? इस बार वे उसे कड़ी सज़ा देंगी।
जज साहिबा ने राम नरेश से पूछा- ‘क्या तुम्हें अपनी सफाई मे कुछ कहना है?’ राम नरेश के चेहरे पर व्यंग भरी मुस्कान खेलने लगी। कुछ पल चुप रहने के बाद उसने कहा – “हाँ हुज़ूर, मुझे आप से बहुत कुछ कहना है। मैं आप लोगों जैसा पढ़ा- लिखा और समझदार तो नहीं हूँ। पता नहीं आपलोग मेरी बात समझेगें या नहीं। पर आप मुझे यह बताइये कि अगर कोई मेरी परी बिटिया को जला कर मार डाले और कानून से भी अपने को बचा ले। तब क्या उसे मार डालना अपराध है?”
मेरी बेटी को उसके पति ने दहेज के लिए जला दिया था। मरने से पहले मेरी बेटी ने अपना आखरी बयान दिया था, कि कैसे मेरी फूल जैसी सुंदर बेटी को उसके पति ने जला दिया। पर वह पुलिस और कानून से बच निकला। इस लिए उसे मैंने अपने हाथों से सज़ा दिया। मेरे जैसा कमजोर पिता और कर ही क्या सकता है? मुझे अपने किए गुनाह का कोई अफसोस नहीं है।
उसका चेहरा मासूम लग रहा था। उसकी बूढ़ी आँखों मेँ आंसू चमक रहे थे, पर चेहरे पर संतोष झलक रहा था। वह जज साहिबा की ओर मुखातिब हुआ-“ हुज़ूर, क्या आपको याद है? आज़ से बाईस वर्ष पहले जब मैं ने अपनी बड़ी बेटी को जन्म लेते मार डाला था, तब आप मुझे सज़ा दिलवाना चाहती थीं।
आपने तब मुझे बहुत भला-बुरा कहा था। आपने कहा था- बेटियां अनमोल होती हैं। उसे मार कर मैंने जघन्य पाप किया है।“
आप की बातों ने मेरी रातो की नींद और दिन का चैन ख़त्म कर दिया था। इसलिए जब मेरी दूसरी बेटी का जन्म हुआ तब मुझे लगा कि ईश्वर ने मुझे भूल सुधारने के मौका दिया है। मैंने प्रयश्चित करना चाहा। उसका नाम मैंने परी रखा। बड़े जतन और लाड़ से मैंने उसे पाला।
अपनी हैसियत के अनुसार उसे पढ़ाया और लिखाया। वह मेरी जान थी। मैंने निश्चय किया कि उसे दुनिया की हर खुशी दूंगा। मै हर दिन मन ही मन आपको आशीष देता कि आपने मुझे ‘पुत्री-सुख’ से वंचित होने से बचा लिया। मेरी परी बड़ी प्यारी, सुंदर, होनहार और समझदार थी। मैंने उसकी शादी बड़े अरमानों से किया। अपनी सारी जमा-पूंजी लगा दी।
मित्रो और रिश्तेदारों से उधार ली। किसी तरह की कमी नहीं की। पर दुनिया ने उसके साथ वही किया जो मैंने बाईस साल पहले अपनी बड़ी बेटी के साथ किया था। उसे मार डाला। तब सिर्फ मैं दोषी क्यों हूँ? मुझे खुशी है कि मेरी बड़ी बेटी को इस क्रूर दुनिया के दुखों और भेद-भाव को सहना नहीं पड़ा। जबकि छोटी बेटी को समाज ने हर वह दुख दिया जो एक कमजोर पिता की पुत्री को झेलना पड़ता है। ऐसे मेँ सज़ा किसे मिलनी चाहिए? मुझे सज़ा मिलनी चाहिए या इस समाज को?
अब आप बताइये कि बेटियोंको पाल पोस कर बड़ा करने से क्या फायदा है? पल-पल तिल-तिल कर मरने से अच्छा नहीं है कि वे जन्म लेते ही इस दुनिया को छोड़ दे। कम से कम वे जिंदगी की तमाम तकलीफ़ों को झेलने से तों बच जाएगीं। मेरे जैसे कमजोर पिता की बेटियों का भविष्य ऐसा ही होता है।
उन्हे जिंदगी के हर कदम पर दुख-दर्द झेलने पड़ते है। काश मैंने अपनी छोटी बेटी को भी जन्म लेते मार दिया होता। आप मुझे बताइये, क्या कहीं ऐसी दुनिया हैं जहाँ जन्म लेने वाली ये नन्ही परियां बिना भेद-भाव के एक सुखद जीवन जी सकें? आप मुझे दोषी मानती हैं। पर मैं इस समाज को दोषी मानता हूँ। क्या कोई अपने बच्चे को इसलिए पालता है कि यह नतीजा देखने को मिले? या समाज हमेँ कमजोर होने की सज़ा दे रहा है? क्या सही है और क्या गलत, आप मुझे बताइये।
विनीता सहाय अवाक थी। मुक नज़रो से राम नरेश के लाचार –कमजोर चेहरे को देख रही थीं। उनके पास कोई जवाब नहीं था। पूरे कोर्ट मे सन्नाटा छा गया था। आज एक नया नज़रिया उनके सामने था? उन्होंने उसके फांसी की सज़ा को माफ करने की दया याचिका प्रेसिडेंट को भिजवा दिया।
अगले दिन अखबार मे विनीता सहाय के इस्तिफ़े की खबर छपी थी। उन्होंने वक्तव्य दिया था – इस असमान सामाजिक व्यवस्था को सुधारने की जरूरत है। जिससे समाज लड़कियों को समान अधिकार मिले। अन्यथा न्याय, अन्याय बन जाता है, क्योंकि हर सिक्के के दो पहलू होते हैं।गलत सामाजिक व्यवस्था और करप्शन न्याय को गुमराह करता है और लोगों का न्यायपालिका पर से भरोसा ख़त्म करता है। मैं इस गलत सामाजिक व्यवस्था के विरोध मेँ न्यायधिश पद से इस्तीफा देती हूँ।
Of all our basic virtues,
courage is the one that
helps us to live exactly the way we want
and provides the psychological fuel
we need to create,
take risks, help others, and face hard times…
Courageous action is humanity at its finest.
Robert Biswas-Diener
We are shaped by our thoughts;
we become what we think.
When the mind is pure,
joy follows like a shadow
that never leaves.
~~ Buddha
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