कैद तारीखों का

दीवार पर लगे कैलेंडर पर
आज भी तारीख और साल वही है ।
ठहर गई है वह तारीख जिंदगी में भी ।
रिहा कर दो , बख्श दो तारीखों के कैद से ।
हाजिरी लगाना दर्द देता है इस मुकदमे में।

 

 

सोने का मुल्लमा

किताब-ए-ज़िंदगी

का पहला सबक़ सीखा,

रिश्तों को निभाने के लिए,

अपनों की गिलाओ पर ख़ामोशी के

सोने का मुल्लमा चढ़ना अच्छा है.

पर अनमोल सबक़ उसके बाद के

पन्नों पर मिला –

सोने के पानी चढ़ाने से पहले

देखो तो सही…

ज़र्फ़….सहनशीलता तुम्हारी,

कहीं तुम्हें हीं ग़लत इल्ज़ामों के

घेरे में ना खड़ा कर दे.

आँसुओं का बोझ

मुस्कुराने की कोशिश में

पलकों पर झलक आए,

आँसुओं का बोझ

बता रहे हैं…….

राहों पर हीं खो गए सारे रंग ज़िंदगी के.

गिला हीं बचा है शेष,

आख़री पड़ाव पर ….

मंज़िल-ए-ज़िंदगी के.