अंधकार में डूबते
ढलते सूरज से कहा
इतनी जल्दी क्या है जाने की ?
उसने मायूसी से जवाब दिया –
आज उम्र….ज़िंदगी जी ली ,
ढलने का समय आ गया है.
ठंडी, बहती बयार ने कहा –
उम्र तो मात्र गिनती है और
ढलना भी शाश्वत सत्य है.
इनायत से ….नफ़ासत…..से
उम्र औ ज़िंदगी जी लो .
ढलने का ग़म क्या करना ?

इनायत से ….नफ़ासत…..से
उम्र औ ज़िंदगी जी लो .
ढलने का ग़म क्या करना ?
जीवन के हर क्षण हर पड़ाव का अपना मजा है।
किसी ने उसे जी लिया किसी ने दुख और शोक में हजार बार खुद को मार दिया। ये भी जिंदगी का एक रंग है ढलना। फिर इसमें खुद को रंग लेना ही जिंदगी हैं।
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आपने मेरी बातों को और भी ख़ूबसूरत ढंग से व्यक्त कर दिया .
सही लिखा आपने. हँस कर या रो कर जिए. ज़िंदगी को कैसे जीना है . यह अपनी पसंद है.
बहुत आभार मधुसूदन.
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