ज़िंदगी के रंग – 178

अंधकार में डूबते

ढलते सूरज से कहा

इतनी जल्दी क्या है जाने की ?

उसने मायूसी से जवाब दिया –

आज उम्र….ज़िंदगी जी ली ,

ढलने का समय आ गया है.

ठंडी, बहती बयार ने कहा –

उम्र तो मात्र गिनती है और

ढलना भी शाश्वत सत्य है.

इनायत से ….नफ़ासत…..से

उम्र औ ज़िंदगी जी लो .

ढलने का ग़म क्या करना ?