बातें

चेहरा

चेहरे पर ना जाओ,

चेहरे की मुस्कान पर ना जाओ।

यह कुछ बताती है,

पर बहुत कुछ है छुपाती।

बाँसुरी की मीठी तान

उसके अंदर के ख़ालीपन….

शून्यता और रिक्तता के दर्द से है बहती।

 

आँखों की हँसी पर ना जाओ।

शुष्क नदी देखी है कभी?

गौर से देखो तब नज़र आएगी नमी।

ऊपर से सूखी निर्झरिणी फल्गु के

रेत के नीचे भी है बहती एक नदी।

 

पूरे चाँद के रात की

बिखरी चाँदनी पर ना जाओ।

मिला है उसे यह ज्योत्सना,

चाँद के अमावस से पूनम तक के

अधूरे-पूरे होने के सफ़र से।

 

दमकते चेहरे पर ना जाओ।

रौशन आफ़ताब से पूछो

दमकने और उजाला फैलाने की तपिश।

हर चेहरे के पीछे छुपे होतें हैं,

हज़ारों चेहरे।

पढ़ सको तो पढ़ो।

 

काँपते-लरजते होंठों की मुस्कुराहट पर ना जाओ

कि………

रौशन रहते हैं समाधि और मज़ार भी चरागों से।

 

 

किवदन्तियाँ / पौराणिक कहानी- फल्गु नदी गया, बिहार में है। यह ऊपर से सूखी दिखती है। इसके रेत को हटाने से जल मिलता है। कहते है कि राम और सीता यहाँ राजा दशरथ का पिंडदान करने गए। राम समय पर नही आ सके। अतः ब्राह्मण के कहने पर सीता जी ने पिंडदान सम्पन्न कर दिया। राम के आने पर, उनके क्रोध से बचने के लिए फल्गु नदी ने झूठ कहा कि माता सीता ने पिंडदान नहीं किया है। माता सीता ने आक्रोशित होकर फल्गु नदी को अततः सलिला ( रेत के नीचे बहाने का) होने का श्राप दे दिया.

बेख़ुदी में

क़बूल भी नहीं कर सकते और इनकार भी नहीं कर सकते……

सचमुच देखा था तुम्हें क़रीब अपने.

हाथ भी बढ़ाया छूने के लिए.

तभी नींद खुल गईं और देखा बाहें शून्य में फैलीं हैं.

शायद सपने में घड़ी की सुईयों को पीछे घुमाते चले गए थे.

शायद बेख़ुदी में तुमको पुकारे चले गए थे.

 

Image- Aneesh

पड़ाव

जब भी कहीं डेरा डालना चाहा.

रुकना चाहा.

ज़िंदगी आ कर कानों में धीरे से कह गई-

यह भी बस एक पड़ाव है…

ठहराव है जीवन यात्रा का.

अभी आगे बढ़ना है,

चलते जाना है. बस चलते जाना है.

 

image courtesy – Aneesh

फासले भी मायने रखते हैं !!

हमेशा क़रीब होना हीं सही नही।

बहुत क़रीब से देखने पर पूरे दृश्य को नहीं देखा जा सकता है।

वे धुँधली हो जातीं हैं।

परिदृश्य या घटना का हिस्सा बन कर पूरी बातें नहीं समझी जा सकती हैं.

जैसे चित्र में रह कर चित्र देखा नहीं जा सकता.

थोङे फासले भी मायने रखते हैं।

तारीख़ों में छुपी कहानियाँ

तारीख़ों में छुपी हैं कितनी कहानियाँ.

किसी तारीख़ से जुड़ी होतीं हैं यादें,

किसी से दर्द, किसी से ख़ुशियाँ.

किसी से उम्मीद, आशाएँ और अरमान.

 और कुछ तारीख़ें कब आ कर चली जातीं हैं,

पता हीं नहीं चलता.

ग़ज़ल सी ज़िंदगी…..

सँवरी, ग़ज़ल सी ज़िंदगी जीने की हसरतें

 किसकी नहीं होती? अौर, जो मिला है वही ग़ज़ल है।

यह समझते समझते ज़िंदगी निकल जाती है.

सूरज तो निकलेगा !

टिमटिमाते तारे, जगमगाते जुगनू, दमकता चाँद , नन्हें दीपक की हवा से काँपती लौ, सभी अपनी पूरी ताक़त से रात के अंधेरे का सामना करते हैं. फिर हम क्यों नहीं कर सकते सामान ? सहर तो होगी हीं….सूरज तो निकलेगा हीं….

श्मशान-वैराग्य

एक अोर बहती कलकल गंगा,

तट पर विशाल अश्वत्थ तरु

अौर दूसरी अोर श्मशान काली की 

भव्य प्रतिमा, रक्त रंग

जवा पुष्प माला में । 

घाटों पर बाँसों का स्तुप।

राह किनारे बिकते रामनामी…….

गुजरते उस राह से मन वैराग से  

…..श्मशान-वैराग्य से भर उठता।

पर कितना विचित्र है यह मन?

संसार की नश्वरता का एहसास

वह क्षणिक वैराग्य

जो श्मशान में  संसार की असारता से उत्पन्न होता है,

संसार के मोह-माया में आते, क्षण में हीं

लुप्त भी हो जाता है। 

 

 

वैराग्य – संसार की असारता।

 श्मशान वैराग्य-श्मशान में जाकर  हुआ क्षणिक वैराग्य।

जिंदगी के रंग 14 – कविता

if you experience the love, you have to touch the spirit, not the body.
~ Rumi

 

            भूलने की कुछ आदत सी हो गई है………..

जिंदगी की जद्दोजहद में।

डर लगता है कभी,

अपने आप को हीं न भूल जाऊँ।

अगर कभी तुम्हें भूल गई तो,

शिकवे गिले न करना

               बस धीरे से याद दिला देना  !!!!!!!!!