
सागर के इश्क़ में नदियाँ छोड़ आईं
पहाड़ों, हिम और हिमनदों को।
बहती नदियों को बस मालूम है इतना,
उनकी मंज़िल है,
साग़र के आग़ोश में।
क्या पता है इन्हें इनकी मंज़िल ….
…..सागर खारा मिलेगा?

सागर के इश्क़ में नदियाँ छोड़ आईं
पहाड़ों, हिम और हिमनदों को।
बहती नदियों को बस मालूम है इतना,
उनकी मंज़िल है,
साग़र के आग़ोश में।
क्या पता है इन्हें इनकी मंज़िल ….
…..सागर खारा मिलेगा?

मौन रह कर
माफ़ कर देना,
मौन रह कर
जीवन पथ पर बढ़ जाना
सबके बस की बात नहीं।
यह होता है तब
ऊपरवाले पर भरोसा हो जब।
अलफ़ाज़ बेमानी हो जाते हैं तब।

सूखते गुलाबों में भी अक्सर
जानी पहचानी ख़ुशबू मिलती है।
पुरानी किताबों में भी अक्सर
अजीब से ख़ुशबू मिलती है।
पुरानी किताबों में मिले सूखे गुलाब,
की मिलाजुली ख़ुशबू
ले जाती हैं यादों के भँवर में।
बीते दिनों के समुंदर में।
#TopicByYourQuote

कुछ लोग दिखतें हैं हमेशा ख़ुश।
ज़रूरी नहीं वो हों भी ख़ुश।
दरअसल वो सीख लेते है रहना ख़ुश।
वरना किसे ज़िंदगी रुलाती नहीं?
कुछ धोखे, कुछ अपने सताते नहीं?
जिये हँस कर या रो कर,
यह अपनी फ़ितरत है।
सुख-दुख के लम्हे आते हैं और
गुज़र जाते हैं।
तमाम उम्र यूँ हीं ख़ुशी की तलाश में
गुज़र जाती है।

सोंच विचार है ज़रूरी ।
क्यों बार-बार माफ़ करते हैं
दर्द देने वालों को?
खोने के डर से?
किसी को पाने की कोशिश में?
तब ज़िंदगी में दर्द और तकलीफ़ मिलेगी
और खोना होगा अपने आप को।
कठिन है लोगों को बदला।
आसान है आसपास के लोगों को बदलना।
Psychological fact – Human wants
bond for love and support. Sometimes
we bond with people who are mentally
and/or physically not good for us/ abuse us.
Trauma bond is bad for our mental health.

फिर याद आए वो,
तो ग़मगीन हो जाते हो।
चाह कर भी भूल ना पाए
तो ग़मगीन हो जाते हो।
कभी दुआओं में किसी को माँगते हो।
कभी उसे हीं भूलने की दुआएँ माँगतें हो।

चमक उठी सन् सत्तावन में वह तलवार पुरानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
ख़ूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।
सुभद्राकुमारी चौहान
Lakshmi Bai / Laxmi Bai, birth date
November 19, 1835, Kashi, India.
इश्क़ है जागती रातें, उनींदी आँखें, गुनगुनाते गीत।
मुहब्बत है ख़्वाब, सितारे, चिराग़, चाँद
अँधेरी रातें, अधूरा चाँद, अधूरे किस्से।
इस इश्क़ को हीं कहते हैं बंदगी।
हम तो जी रहे हैं यही ज़िन्दगी।
तुम एक बार में लगे टूटने?
हँस कर पूछा चाँद ने।


इक तन्हा चराग़, कमजोर पड़ते लौ से
निशा के गहरे अँधेरे से लड़ता थक सा गया।
रात के आख़री किनारे पर
टिमटिमाते चराग़ के कानों में,
सहर का सितारा बोल पड़ा –
हौसला रख, सुबह के दीप।
कुछ हीं पल में अँधेरा जाने वाला है।
रौशन जहाँ करने,
आफ़ताब आने हीं वाला है,
किसी से मिलते हीं
उसे ना नापो तौलो,
जज ना करो।
सभी किसी ना किसी रूप में पूर्ण हैं
और अपूर्ण भी।
इंसान रूप में ईश्वर ने अवतार लिया,
यही समझाने के लिए,
कि कोई परफ़ेक्ट नहीं।

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