जीवन की शाम हो चली थी,
थका-हारा सूरज झुका,
थोङा रुका
….गुफ्तगु के इरादे से या
शायद फिर से आने का
वायदा करना चाहता था धरा से।
पर तभी छा गये बीच में काले बादल।
अौर बिना रुके…..
बिना कुछ कहे सूरज ङूब गया,
कभी नहीं वापस आने को।
जीवन की शाम हो चली थी,
थका-हारा सूरज झुका,
थोङा रुका
….गुफ्तगु के इरादे से या
शायद फिर से आने का
वायदा करना चाहता था धरा से।
पर तभी छा गये बीच में काले बादल।
अौर बिना रुके…..
बिना कुछ कहे सूरज ङूब गया,
कभी नहीं वापस आने को।
सूरज ङूबने के बाद
क्षितिज़ के उत्तर में
दमकता है एक सितारा…..
शाम का सितारा,
राह दिखाता,
रौशन क़ुतबी सितारा
यह ध्रुव तारा….
अटल और दिव्यमान रहने के
संदेश के साथ .
पूनम का धृष्ट चाँद बिना पूछे,
बादलों के खुले वातायन से
अपनी चाँदनी को बड़े अधिकार से
सागर पर बिखेर गगन में मुस्कुरा पड़ा .
सागर की लहरों पर बिखर चाँदनी
सागर को अपने पास बुलाने लगी.
लहरें ऊँचाइयों को छूने की कोशिश में
ज्वार बन तट पर सर पटकने लगे .
पर हमेशा की तरह यह मिलन भी
अधूरा रह गया.
थका चाँद पीला पड़ गया .
चाँदनी लुप्त हो गई .
सागर शांत हो गया .
पूर्णिमा की रात बीत चुकी थी .
पूरब से सूरज झाँकने लगा था .
सूरज ङूबने वाला था,
ना जाने क्यों ठिठका ?
अपनी लालिमा के साथ कुछ पल बिता
पलट कर बोला – अँधेरे से ङरना मत ।
यह रौशनी-अधंकार कालचक्र है।
नया सवेरा लेकर
मैं कल फिर आऊँगा !!!!!
image by Rekha Sahay
बरसात की हलकी फुहार
के बाद सात रंगों की
खूबसूरती बिखेरता इंद्रधनुष निकल आया।
बादलों के पीछे से सूरज की किरणें झाँकतीं
कुछ खोजे लगी….. बोली….
खोज रहीं हूँ – कहाँ से इंद्रधनुष निकला है ?
इंद्रधनुष की सतरंगी आभा खिलखिला कर हँसी अौर
कह उठी – तुम अौर हम एक हीं हैं,
बस जीवन रुपी वर्षा की बुँदों से गुजरने से
मेरे अंदर छुपे सातों रंग दमकने लगे हैं।
सुबह का ऊगता सूरज,
नीलम से नीले आकाश में,
लगता है जैसे गहरे लाल रंग का माणिक…..रुबी…. हो,
अंगूठी में जङे नगीने की तरह।
दूसरे पहर में विषमकोण में कटे हीरे
की तरह आँखों को चौंधियाने लगता है ।
सफेद मोती से दमकते चाँद के आगमन की आगाज़ से
शाम, पश्चिम में अस्त होता रवि रंग बदल फिर
पोखराज – मूंगे के पीले-नारंगी आभा से
रंग देता है सारा आकाश।
रंग बदलते सूरज
की रंगीन रश्मियाँ धरा को चूमती
पन्ने सी हरियाली से
समृद्ध करती हैं…
image courtesy google.
समय के साथ भागते हुए लगा – घङी की टिक- टिक हूँ…
तभी
किसी ने कहा – जरुरी बातों पर फोकस करो,
तब लगा कैमरा हूँ क्या?
मोबाइल…लैपटॉप…टीवी……..क्या हूँ?
सबने कहा – इन छोटी चीजों से अपनी तुलना ना करो।
हम बहुत आगे बढ़ गये हैं
देखो विज्ञान कहा पहुँच गया है………
सब की बातों को सुन, समझ नहीं आया
आगे बढ़ गये हैं , या उलझ गये हैं ?
अहले सुबह, उगते सूरज के साथ देखा
लोग योग-ध्यान में लगे
पीछे छूटे शांती-चैन की खोज में।
कालरात्रि सा सघन अँधेरा ,
आता है जीवन में हर रोज़ .
पर
आकाश के एक एक कर
बूझते सितारे,
करते है सूरज
औ भोर की
किरणों का आगाज …..
बस याद रखना है –
हर रात की होती है
सुहानी भोर !!!
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